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शरीर में संक्रमण होने पर टेस्ट करवाने हड़बड़ी न करें - डॉ. गिरीश अग्रवाल

शरीर में संक्रमण होने पर टेस्ट करवाने हड़बड़ी न करें - डॉ. गिरीश अग्रवाल
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धमतरी । रामकृष्ण केयर हास्पिटल रायपुर के चेस्ट फिजिशियन गिरीश अग्रवाल ने कोविड- 19 से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां शेयर की है। जिसमें उन्होंने कोरोना के लक्षण, पूर्व के कोरोना से अभी के कोरोना में अंतर जांच, कब और क्या करानी चाहिए, आदि के संबंध में बताया है।
उन्होंने बताया कि यह वायरस पिछले वायरस से अलग है। इस बार मरीज को तेज बुखार आ रहा है जो दस से 12 दिनों तक रहता है। शरीर पूरा कमजोर हो जाता है। पसीना आने लगता है। इसके साथ दस्त के भी लक्षण देखे जा सकते हंै। सिर दर्द, आंखों में दर्द ये नए लक्षण है। पिछले साल के वायरस में बच्चे ज्यादा प्रभावित नहीं होते थे लेकिन इस बार बच्चे भी प्रभावित हो रहे हैं।
00 टेस्ट करवाने में जल्दबाजी न करें:-
खतरनाक बात यह है कि संक्रमण बच्चों से बड़ों में और बड़ों से बच्चों में फैल रहा है। लोगों में यह देखा गया है कि, यदि कोई कोरोना संक्रमित मरीज के करीब आये तो लोग तुरंत अपना आरटीपीसीआर करवा लेते हैं। वहां पर टेस्ट निगेटिव आया तो लोग निश्चिंत हो जाता है। जबकि यहां पर लोगों को इंतजार करना चाहिए। संक्रमित मरीज के संपर्क में आने के बाद संक्रमण होने में कम से कम 5 से 7 दिन लगता है। लक्षण आने के बाद तुरंत सिटी स्केन कराने पहुंचते हैं। यहां भी रिपोर्ट में कुछ भी नहीं आएगा। फिर लोग दिग्भ्रमित होना शुरू हो जाते हैं। इसलिए संक्रमित के संपर्क में आने के बाद पूरी तरह लक्षण आने के तक इंतजार करें।
00 कोई भी एलोपैथी दवा कोरोना से बचाव के लिए नहीं है:-
कोई भी दवा संक्रमण के बचाव के लिए नहीं तैयार हुआ है। चाहे वह डाक्सीसाइक्लिन, आईवरमेक्टिन, एजिथ्रोमाईसिन हो, चाहे फ्लेवीप्योर हो। पॉजिटिव आने के बाद तुरंत लोग ब्लड टेस्ट और अन्य टेस्ट कराते हैं। जबकि इन सब चीजों की जरूरत नहीं होती है। बुखार 10 से 12 दिन तक रहेगा ही। लोग बुखार कम नहीं हो रहा है यह सोचकर टेस्ट की ओर भोगते हैं। सिटी स्केन कराने पर निमोनिया दिखाएगा ही। अलग अलग स्कोर बताया जाता है। यह भर्ती होने के लिए मापदंड नहीं है।
00 मरीजों को इस समय भर्ती होना चाहिए:-
मरीज को तभी भर्ती होना चाहिए जब ऑक्सीजन का लेवल 90 से नीचे चला जाए। जो गंभीर बीमारी से पीडिघ्त है, गर्भवती, 60 वर्ष से अधिक लोगों के लिए आक्सीजन बेस लाईन 94 माना गया है। इससे नीचे जाने पर ही भर्ती हो। सिटी स्केन में कितना स्कोर आ रहा है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। इलाज मरीज का होता रिपोर्ट का नहीं।
00 रेमडीसिविर इंजेक्शन लगाने में हड़बड़ी न करें:-
मरीज जब भर्ती होता है तो उसके दिमाग में यह होता है कि रेमडीसिविर इंजेक्शन लगाया जाएगा और वह ठीक हो जाएगा। इसमें सच्चाई नहीं है। यदि यह सही होता तो कोरोना संक्रमण होते ही उसे भर्ती कर पहले दिन से ही 5 दिन तक इस इंजेक्शन को लगाकर उसे ठीक कर दिया जाता। लेकिन ऐसा नहीं है। इस इंजेक्शन के लगने के बावजूद व्यक्ति को खतरा हो सकता है। डल्ब्यूएचओ ने बताया कि रेमडीसिविर इंजेक्शन तभी लगायें जब आक्सीजन लेवल कम होने लगे। मरीजों से निवेदन है कि वे डाक्टर के ऊपर दवाब न डाले कि उसे रेमडीसिविर इंजेक्शन लगाए।
00 पहले हफ्ते में स्टेराईड लेना खतरनाक:-
बहुत सारे मरीज ऐसे आ रहे हैं जो स्टेराईड जैसे वाइसोलोन, डेक्सोना जैसी दवाई सुनकर खा लेते हैं। आपको पहले हफ्ते में स्टेराईड नहीं लेना है। यदि आप पहले हफ्ते में स्टेराईड खाते हैं तो वह वायरस के प्रसार के लिए सुविधाजनक हो जाता है और वायरस तेजी से बढने लग जाता है। पहले हफ्ते में स्टेराईड का कोई रोल नहीं है। ऐसे मरीज जिनका इलाज घर पर चल रहा है वो खून पतला करने वाली दवाई न खाएं। जो व्यक्ति पहले से ही स्टेराईड या खून पतला करने की दवाई खा रहे हैं वह नियमित लेते रहें।
वैक्सीन के दोनो डोज लेने के बाद भी व्यक्ति संक्रमित हो सकता है। कई लोगों का दोनो डोज के बाद भी पर्याप्त एंटीबॉडी नहीं बनता है। वेक्सीन जरूर लगवाये, दो गज की दूरी बनाये रखें, मास्क जरूर लगाएं। कोविड के मरीज न डरे, हिम्मत से काम लें। मनोवैज्ञानिक रूप से कमजोर न हो। कोविड के पहले डरें, कोविड होने के बाद न घबराए। अपने आप को डाॅक्टर को समर्पित कर दें।
 



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