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कल मनाया जाएगा विश्व प्रेस आजादी दिवस, जानिए क्या है खास

कल मनाया जाएगा विश्व प्रेस आजादी दिवस, जानिए क्या है खास

भारत प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर अकसर हमने चर्चा को होते देखा है. फिलहाल दुनियाभर में हर साल तीन मई को विश्व प्रेस आजादी दिवस  मनाया जाता है. भारत के साथ ही दुनियाभर में मीडिया की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है. लोकतंत्र को और भी ज्यादा मजबूत करने के लिए ही हर साल वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे सेलिब्रेट किया जाता है. आइए जानते हैं यह पहली बार कब मनाया और क्यों मनाया गया.
पहली बार इस दिन मनाया गया
प्रेस की आजादी के लिए पहली बार साल 1991 में अफ्रीका के पत्रकारों ने मुहिम छेड़ी थी. इन पत्रकारों ने तीन मई को प्रेस की आजादी के सिद्धांतों को लेकर बयान जारी किया था जिसे डिक्लेरेशन ऑफ विंडहोक के नाम से भी जानते हैं. इसके ठीक दो साल बाद यानी साल 1993 में संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने पहली बार विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाने का फैसला किया था. उस दिन से लेकर आज तक हर साल तीन मई को विश्व प्रेस आजादी दिवस मनाया जाता है.
क्यों मनाया जाता है?
दुनियाभर से आए दिन पत्रकारों पर हुए उत्पीड़न की खबरें आती रहती हैं. पत्रकारिता एक जोखिमभरा काम भी है. पत्रकारिता के दौरान पत्रकारों पर कई बार हमले भी कर दिए जाते हैं. फिर चाहे सऊदी अरब के जमाल खगोशी हों या फिर भारत की गौरी लंकेश. समय-समय पर पत्रकारों पर हमले या फिर उनकी हत्या की खबर सामने आ ही जाती है. ऐसे में पत्रकारों पर हो रहे उत्पीड़न और उनकी आवाज को अलग-अलग ताकतों द्वारा दबाया नहीं जाए इसीलिए भी विश्व प्रेस आजादी दिवस मनाया जाता है.
ऐसे मनाया जाता है ये खास दिन
सन 1997 से हर साल तीन मई यानी विश्व प्रेस आजादी दिवस पर यूनेस्को गिलेरमो कानो वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम प्राइज देता है. ये उस संस्थान या फिर व्यक्ति को दिया जाता है, जिसने प्रेस की आजादी के लिए कुछ बड़ा काम किया होता है. साथ ही इस दिन स्कूल-कॉलेज में इस पर चर्चा और वाद-विवाद किया जाता है. इसके अलावा इस खास दिन के बारे में लोगों को जागरुक करने के लिए सेमीनार आयोजित किए जाते हैं.
 

"भाजपा मतलब भगवा नहीं है", अपने नेताओं के सेल्फ गोल से परेशान है भाजपा

"भाजपा मतलब भगवा नहीं है", अपने नेताओं के सेल्फ गोल से परेशान है भाजपा

इन दिनों देश में बुलडोजर की चर्चा खूब हो रही है। टीवी पर,सड़क पर,चौक चौराहे, पान की दुकान, चाय की गुमटियों में लोग बहस करते पाए जा रहे हैं कि गुनाहगारों के घरों पर बुलडोजर का चलना सही है या नहीं। हालांकि ऐसी बहस बेनतीजा ही खत्म हो रही है।
वही बुलडोजर के बहाने केंद्र व राज्य की भाजपा सरकारों को पूर्णता मुस्लिम विरोधी साबित करने का कोई भी मौका उनके विरोधी नहीं छोड़ रहे । जबकि घटनाक्रमों को बिना पूर्वाग्रह के नज़र डालें तो कार्रवाई बिना धर्म देखें सिर्फ अपराधियों पर हुई है। लेकिन अतिउत्साही भाजपाई सीना ठोक कर कहते दिख रहे है कि मुसलमानों पर हमारी सरकार का बुलडोजर चला है। पर उन्हें कौन कहे कि ऐसा कहकर वे अपनी ही पार्टी की राह में कांटे बिछा रहे है।

बुलडोजर के विशेष उपयोग की शुरुआत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने की। उन्हें समझ आया कि अपराधियों, माफियाओं और दंगाईयों को जेल में बिठाकर खाना खिलाने से वे सुधरने वाले नहीं हैं।इसलिए उन्होंने ऐसे लोगों की आर्थिक रीढ़ तोड़ने का तरीका आजमाया और बुलडोजर लेकर निकल पड़े। बाबा ने जाति और धर्म देखे बगैर देश व समाज के लिए खतरा बनने वाले लोगो की अवैध संपत्तियों को अपने बुलडोजर के नीचे रौंदा। बाबा के कहर से ना माफिया मुख्तार अंसारी बच पाए और ना ही खूंखार अपराधी विकास दुबे। आत्मसमर्पण के बाद विकास दुबे की मौत भी गाड़ी पलटने से हुई थी। लोग इसे साधारण घटना नही अपितु समाज देश के लिए खतरा बन चुके अपराधी को बाबा की सजा के रूप में ही देखते है।

योगी आदित्यनाथ ने सीएए- एनआरसी आंदोलन के दौरान भी राज्य संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले पत्थरबाजों दंगाइयों पर भी इसी तरह की कड़ी कार्रवाई की थी। बाबा योगी आदित्यनाथ की देखा देखी मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार भी इसी तरह की कार्रवाई करते हुए अपराधियों के ठिकानों पर बुलडोजर चला रही है।

अब बात करते हैं नए घटनाक्रमों की। रामनवमी के अवसर पर निकली विभिन्न शोभायात्रा में कर्नाटक, मध्य प्रदेश के खरगोन और दिल्ली के जांहगीररपुरी में मुसलमानों ने पथराव किया। इस वजह से वहां दंगों सा माहौल बना। जिसके बाद हरकत में आए प्रशासन ने योगी फार्मूले के तहत अपराधियों की धरपकड़ की और दोषियों के अवैध ठिकानों पर बुलडोजर चलाया।
परंतु जब दिल्ली एमसीडी ने जांहगीरपुरी बुलडोजर की कार्रवाई शुरू हुई तो कथित सेकुलर गिरोह के कांग्रेस नेता व सुप्रीम कोर्ट के वकील कपिल सिब्बल ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। जस्टिस एल नागेश्वर राव और पीआर गंवई के समक्ष इस तरह कार्रवाई को मुस्लिम विरोधी बताते हुए देश भर में रोक लगाने की मांग की।

इस मुद्दे पर दिल्ली एमसीडी की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि सरकार मुस्लिमों के ऊपर ही कार्रवाई कर रही है यह कहना गलत है। उन्होंने खरगोन हिंसा का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां 26 मुस्लिमों और 88 हिंदुओं के अवैध मकानों पर सरकारी बुलडोजर चढ़े है। दिल्ली में भी कार्रवाई अतिक्रमण को लेकर है न किसी धर्म निशाने पर है। हालांकि अदालत ने देश भर में चल रही कार्रवाईयों पर सुनवाई न करते हुए सिंर्फ जहांगीरपुरी मैं हो रही कार्रवाई को 15 दिनों के लिए टालने के आदेश दिए।

बुलडोजर की कार्रवाई कानून के दायरे में ही है। परंतु इन मामलों में भाजपा सरकार की मंशा पर जो सवाल खड़े किए जा रहे हैं उसका सीधा जवाब भाजपा के नेता ही नहीं दे रहे हैं।उल्टे कुछ तो सीधे हा मुसलमानों पर करवाई हम कर रहे है ऐसा कहते दिखे।

शायद इसीलिए भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को आकर कहना पड़ा कि भगवा यानी भाजपा नहीं है। भाजपा का मतलब सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास है। नड्डा जी के इस बयान का साफ मतलब है कि संगठन के नेता वही कहे जो संगठन की लाइन है। लाइन से बाहर जाकर नमक मिर्च लगाकर बातों को प्रस्तुत करना अनुचित है। इससे पार्टी को नुकसान होगा और जनता में गलतफहमियां बढ़ेंगी।
(देवेंद्र गुप्ता - 9039010330)

 

आलेख: विपक्ष से अलग केजरीवाल की राह

आलेख: विपक्ष से अलग केजरीवाल की राह

आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल विपक्ष के नेताओं से अलग रास्ते पर चलते हैं। भाजपा के खिलाफ उनको भी लडऩा है लेकिन वे भाजपा की रणनीति और भाजपा के सिद्धांतों से ही उससे लड़ते हैं। इस मामले में उनकी राह बाकी विपक्षी नेताओं से अलग है। उन्होंने भड़काऊ भाषण और विभाजनकारी राजनीति को लेकर एक भी बयान नहीं दिया है। अभी देश में रामनवमी के मौके पर कई जगह सांप्रदायिक दंगे हुए। मस्जिदों के ऊपर भगवा फहराए गए। मस्जिदों में अजान के समय उसके बाहर हनुमान चालीसा के पाठ की योजनाएं बन रही हैं और भाजपा के एक नेता लाउडस्पीकर मुफ्त बांट रहे हैं। हिजाब और हलाल मीट का विवाद अलग चल रहा है।
सांप्रदायिक और भड़काऊ भाषणों और विभाजनकारी राजनीति को लेकर विपक्ष की सभी पार्टियों ने बयान दिया है। शरद पवार ने सीधे भाजपा को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा कर उस पर निशाना साधा। सोनिया गांधी ने अंग्रेजी अखबार 'इंडियन एक्सप्रेसÓ में लेख लिख कर इस राजनीति की निंदा की है। राहुल गांधी और ममता बनर्जी से लेकर एमके स्टालिन और के चंद्रशेखर राव तक सबने इस पर सवाल उठाया है और चिंता जताई है। लेकिन अरविंद केजरीवाल की ओर से इस पर कोई बयान नहीं दिया गया है। वे हर बार हिंदुत्व के मसले पर इसी तरह से चुप्पी साध लेते हैं और भाजपा के एजेंडे का समर्थन करते हैं। उनको लगता है कि इससे बहुसंख्यक हिंदू समाज उनको भी भाजपा की तरह अपनाएगा। वैसे भी अभी जिन दो राज्यों- हिमाचल प्रदेश और गुजरात में चुनाव होने हैं वहां उनको हिंदू वोटों की ही राजनीति करनी है। इसलिए भी वे चुप्पी साधे हुए हैं। 

आलेख: विधायको को सिर्फ एक पेंशन का ऐतिहासिक कदम!

आलेख: विधायको को सिर्फ एक पेंशन का ऐतिहासिक कदम!

देश की जनता लंबे समय से यह मांग करती रही है कि विधायको व सांसदों की पेंशन या तो पूरी तरह से बंद हो या फिर उन्हें सिर्फ एक ही पेंशन मिले ,लेकिन आमजन की इस मांग को अनसुना कर जितनी बार भी सांसद या विधायक रहे उतनी ही पेंशन लेकर देश पर आर्थिक बोझ जारी है।इस बोझ को पहली बार पंजाब में हाल ही में बनी आम आदमी पार्टी की सरकार ने समझा है।इस सरकार ने हर कार्यकाल के लिए पूर्व विधायकों की पेंशन की प्रथा खत्म करते हुए, अब सिर्फ एक कार्यकाल के लिए पेंशन जारी रखने का ऐलान किया है। पूर्व विधायकों को पंजाब में 75 हजार रुपये पेंशन मिलेगी।पंजाब सरकार ने विधायकों की पेंशन को लेकर यह बड़ा फैसला लिया है। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने घोषणा की है कि पूर्व विधायकों को केवल एक कार्यकाल के लिए पेंशन मिलेगी। पंजाब ही नही देशभर में अभी तक प्रत्येक कार्यकाल के लिए पेंशन मिलती रही है। पंजाब सरकार के अधिकारियों को 'एक विधायक-एक पेंशनÓ योजना को लागू करने का निर्देश दिया गया है।अभी तक कई बार चुने गए विधायकों को पेंशन के रूप में कई बार की ही पेंशन के रूप में लाखों रुपये मिल रहे थे। उनमें से कुछ जो सांसद भी रहे हैं, उन्हें केंद्र और राज्य दोनों तरह की पेंशन मिल रही है। इस फैसले से राज्य सरकार के करीब 80 करोड़ रुपये बचेंगे।भगवंत मान ने कहा कि, लोगों की सेवा के वादे के साथ वोट मांगने वाले विधायकों को 3.5 लाख रुपये, 4.5 लाख रुपये और यहां तक कि 5.25 लाख रुपये मासिक पेंशन मिल रही थी। नए फैसले के साथ सरकार की योजना पांच साल में 80 करोड़ रुपये बचाने की है।बचाए गए धन का उपयोग कल्याणकारी योजनाओं के लिए किया जाएगा।उदाहरण के तौर पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राजिंदर कौर भट्टल, लाल सिंह और पूर्व अकाली दल नेता सरवन सिंह फिल्लौर को 3.25 लाख रुपये जबकि रवि इंदर सिंह और बलविंदर सिंह भिंडर को हर महीने 2.75 लाख रुपये पेंशन के रूप में मिलते हैं।पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने सरकार को पत्र लिखा था कि वह सरकार से किसी भी तरह की पेंशन का दावा नहीं करेंगे और न ही उन्हें कोई पेंशन दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा था कि पैसे का इस्तेमाल लोक कल्याण की योजनाओं के लिए किया जाना चाहिए।हरियाणा सरकार ने कुछ साल पहले पूर्व विधायकों के लिए एक साथ कई पेंशन खत्म कर दी थी। पंजाब में अमरिंदर सिंह की सरकार ने उस वक्त पड़ोसी राज्य से संकेत लेते हुए पेंशन नीति को बदलने पर चर्चा की थी। लेकिन कभी कोई निर्णय उनके द्वारा नहीं लिया गया।
पंजाब सरकार के नियमों के अनुसार विधायक को पहले कार्यकाल के लिए 75 हजार रुपये और उसके बाद हर अन्य कार्यकाल के लिए 50 हजार रुपये पेंशन दिए जाने का प्रावधान है।पंजाब में इस समय र 275 पूर्व विधायक अपने अलग-अलग कार्यकाल के लिए पेंशन ले रहे हैं। इसमें राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों समेत एक दर्जन पूर्व विधायक शामिल हैं जिन्हें कार्यकाल के हिसाब से 5-6 पेंशन तक एक साथ मिल रहीं हैं।पंजाब में मुख्यमंत्री का मासिक वेतन (भत्तों समेत) डेढ़ लाख रुपये बनता है। पूर्व विधायकों में पांच बार मु्ख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल इस समय 11 पेंशन के हकदार हैं और उन्हें पेंशन की कुल राशि 5,76,150 रुपये मिलती थी। हालांकि उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर पेंशन न लेने की घोषणा की है। पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री राजिंदर कौर भ_ल, पूर्व मंत्री मनप्रीत सिंह बादल, लाल सिंह और परमिंदर सिंह ढींढसा समेत पंजाब के कई पूर्व विधायक ऐसे हैं जिन्हें उनके कार्यकाल के हिसाब से 5-6 पेंशन मिलती हैं। इसकी कुल रकम 2,75,550 रुपये से 3,25,650 रुपये बनती है।पंजाब राज्य विधान मंडल सदस्य (पेंशन व मेडिकल सुविधा) एक्ट 1977 और पंजाब राज्य विधान मंडल सदस्य (पेंशन व मेडिकल सुविधा) एक्ट 1984 में संशोधन के साथ पंजाब एक्ट नंबर 30 ऑफ 2016 के तहत नोटिफिकेशन जारी करके ऐसा प्रावधान कर दिया गया कि पूर्व विधायक को उनके पहले कार्यकाल के लिए पेंशन के रूप में 15000 रुपये और अगली प्रत्येक टर्म के लिए 1०० रुपये से आगाज होगा। इस रकम में पहले 50 फीसदी डीए मर्ज होगा और उसके बाद बनने वाली कुल रकम में फिर से 234 फीसदी महंगाई भत्ता जुड़ जाएगा। इस तरह पूर्व विधायकों को जबरदस्त लाभ हुआ, क्योंकि 15000 + 7500 (50 फीसदी डीए)= 22500 रुपये रकम बनी। 22500+52650 (234 फीसदी डीए) रुपये यानी कुल 75150 रुपये पेंशन बनती हैं। सूबे के 275 पूर्व विधायकों को वर्ष 2017 से हर साल 37 करोड़ और पांच वर्ष में 186 करोड़ रुपये पेंशन के तौर पर दिए जा रहे थे लेकिन जिस एक्ट के आधार पर यह पेंशन तय की गई, ऐसा कोई प्रावधान किसी भी एक्ट में था ही नहीं। पंजाब की अकाली-भाजपा सरकार ने अक्तूबर 2016 में पूर्व विधायकों की पेंशन को पहले कार्यकाल में 15000 रुपये और बाद के कार्यकाल के लिए 10-10 हजार रुपये का प्रावधान करते हुए साफ कर दिया था कि इस राशि में महंगाई भत्ता अन्य सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले महंगाई भत्ते के अनुसार ही जुड़ेगा। अगर इस तरीके से पेंशन तैयार होती तो 15000 रुपये और 28 फीसदी डीए को मिलाकर 19200 रुपये ही पूर्व विधायको को मिल पाते। लेकिन शासन स्तर की गई इस त्रुटि का नतीजा यह हुआ कि पूर्व विधायकों को 19200 रुपये की जगह 75150 रुपये पेंशन मिलती रही। इस तरह पांच साल के दौरान सरकारी खजाने से लगभग 192 करोड़ रुपये अधिक निकाल लिए गए। जिससे पंजाब सरकार पर आर्थिक बोझ बढ़ता चला गया।
- डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
नोट: उपरोक्त लेख में वर्णित बाते लेखक की व्यक्तिगत विचार है ।
 

गोरखनाथ मंदिर के संत से सत्ताधीश तक, कैसे यूपी की राजनीति के शिखर तक पहुंचे योगी आदित्यनाथ

गोरखनाथ मंदिर के संत से सत्ताधीश तक, कैसे यूपी की राजनीति के शिखर तक पहुंचे योगी आदित्यनाथ

साल 2017 के विधानसभा चुनाव के नतीजे जब आए तो बीजेपी ने 300 प्लस सीटों के साथ जीत हासिल की. हालांकि शुरुआत में मनोज सिन्हा का सामने सीएम की रेस में आया था लेकिन बीजेपी ने अप्रत्याशित फैसला लेते हुए योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद सौंप दिया. उस वक्त योगी आदित्यनाथ की छवि हिंदुत्व के 'पोस्टर बॉय', भगवा वस्त्र पहनने वाले और तेज-तर्रार नेता के तौर पर थी. उनका ये स्टाइल आज भी कायम है.
योगी आदित्यनाथ के आलोचक मानते हैं कि देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य को संभालने के दौरान उनकी फायर ब्रांड छवि में थोड़ा संतुलन भले आया हो लेकिन उनमें बहुत ज्यादा बदलाव आया हो, ऐसा नहीं है.
पौड़ी में जन्म, सात भाई-बहन और फिर बने संन्यासी
तारीख थी 5 जून 1972 और जगह थी उत्तराखंड का पौड़ी गढ़वाल जिले के यमकेश्वर तहसील का पंचुर गांव. आनंद सिंह बिष्ट के घर एक लड़के का जन्म हुआ. नाम रखा गया अजय सिंह बिष्ट. माता-पिता के सात बच्चों में सबसे तेज-तर्रार. जानकारों का कहना है कि ग्रेजुएशन की पढ़ाई करते हुए योगी आदित्यनाथ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी से जुड़ गए और 1992 में उन्होंथने हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल यूनिवर्सिटी से बीएससी की.
राम मंदिर आंदोलन के दौर में उनका रुझान आंदोलन की ओर हुआ और इसी बीच वह गुरु गोरखनाथ पर रिसर्च करने के लिए साल 1993 में गोरखपुर आए. गोरखपुर में वह महंत और राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण आंदोलन के अगुवा महंत अवैद्यनाथ के संपर्क में आए और 1994 में योगी पूर्ण रूप से संन्यासी हो गए.
महंत अवैद्यनाथ के बने उत्तराधिकारी
योगी को महंत अवैद्यनाथ ने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और दीक्षा लेने के बाद अजय सिंह बिष्ट योगी आदित्यनाथ हो गए. 12 सितंबर 2014 को महंत अवैद्यनाथ के ब्रह्मलीन होने के बाद योगी गोरक्षपीठ के महंत घोषित किए गए. उस वक्त वह बीजेपी से टकराव के भी गुरेज नहीं रखते थे और उन्होंने हिंदू युवा वाहिनी नामक स्वयंसेवकों के अपने एक संगठन की स्थापना भी की थी.
राजनीति में योगी गोरक्षपीठ की तीसरी पीढ़ी
योगी का राजनीतिक सफर उपलब्धियों से भरा है. राजनीति में योगी गोरक्षपीठ की तीसरी पीढ़ी हैं. ब्रह्मलीन महंत दिग्विजय नाथ भी गोरखपुर से विधायक और सांसद रहे. इसके बाद महंत अवैद्यनाथ ने भी विधानसभा और लोकसभा दोनों में प्रतिनिधित्व किया.
योगी आदित्यनाथ गोरक्षपीठ की विरासत को आगे बढ़ाते हुए 1998 में महज 26 वर्ष की उम्र में पहली बार गोरखपुर से बीजेपी के सांसद बने और लगातार पांच बार उनकी जीत का सिलसिला बना रहा. योगी आदित्यनाथ ने इस बार भी करीब ढाई दशक के अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार गोरखपुर से ही विधानसभा का चुनाव लड़ा.
जब चुने गए थे विधायक दल के नेता
मार्च 2017 में लखनऊ में बीजेपी विधायक दल की बैठक में योगी को विधायक दल का नेता चुना गया था. इसके बाद योगी ने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और विधान परिषद के सदस्य बने और 19 मार्च 2017 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
ये फैसले रहे चर्चित
- अपने कार्यकाल की शुरुआत में उन्होंने अवैध बूचड़खानों पर बैन लगा दिया.
- पुलिस ने गोहत्या पर नकेल कस दी.
- उनकी सरकार बाद में जबरन या धोखे से धर्मांतरण के खिलाफ पहले अध्यादेश और फिर विधेयक लेकर आई.
37 साल बाद बना कीर्तिमान
यूपी में करीब 37 वर्ष बाद बीजेपी लगातार दोबारा पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर कीर्तिमान बनाती नजर आ रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इससे योगी आदित्यनाथ का कद और बढ़ा है. इसके पहले साल 1985 में लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत से कांग्रेस पार्टी ने सरकार बनाई थी.
माना जाता है कि योगी ने मौजूदा विधानसभा चुनाव में 80 बनाम 20 प्रतिशत का नारा देकर वोटों के ध्रुवीकरण की पहल की. विश्लेषकों ने 20 प्रतिशत को मुस्लिम आबादी और 80 प्रतिशत को हिंदू आबादी के रूप में देखा. इसके योगी ने माफिया और अपराधियों के खिलाफ की गई कार्रवाई को भी पूरे चुनाव में मुद्दा बनाया.
बीजेपी के शीर्ष नेताओं के चुनाव प्रचार में 'योगी का बुलडोजर' छाया रहा. सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी अक्सर अपनी सभाओं में बुलडोजर और बुल (सांड) का नाम लेकर योगी पर तंज कसते थे. यादव ने चुनाव में छुट्टा पशुओं पर नियंत्रण न लगा पाने को मुद्दा बनाया था.

 

चुनाव खत्म होते ही आ जायेंगे एग्जिटपोल के नतीजे! आखिर क्या है एग्जिट पोल ...

चुनाव खत्म होते ही आ जायेंगे एग्जिटपोल के नतीजे! आखिर क्या है एग्जिट पोल ...

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में किसकी सरकार बनेगी? इस सवाल का सही जवाब तो 10 मार्च 2022 को मिलेगा। भारत का निर्वाचन आयोग (ECI) 10 मार्च को उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर विधानसभा चुनाव के परिणाम घोषित करेगा। यूपी में 7 मार्च को आखिरी चरण का मतदान है। मतदान खत्म होते ही एग्जिट पोल के आंकड़े आ जाएंगे।
सबसे पहले एग्जिट पोल को समझ लीजिए
मतदान कर पोलिंग बूथ से निकल रहे वोटर्स से पूछकर कि उन्होंने किसको वोट दिया है, एग्जिट पोल तैयार किए जाते हैं। चूंकि वोटर्स से सवाल पोलिंग स्टे‍शन से बाहर निकलते समय होता है इसलिए ऐसे सर्वे Exit Poll कहलाते हैं।
एग्जिट पोल से क्या पता चलता है?
एग्जिट पोल के पीछे यह धारणा होती है कि फौरन वोट डालकर निकले वोटर के सच बताने की संभावना ज्यादा है। सभी जवाबों को एक जगह इकट्ठा करके चुनाव के नतीजों का अनुमान लगाया जाता है।
एग्जिट पोल/ओपिनियन पोल कौन कराता है?
वोटर्स को ध्यान रखने वाली सबसे जरूरी बात यह है कि कोई सरकारी एजेंसी एग्जिट पोल/ओपिनियन पोल नहीं कराती। आमतौर पर न्यूज मीडिया संस्थान और निजी सर्वे फर्म मिलकर एग्जिट पोल/ओपिनियन पोल कराते हैं।
क्या एग्जिट पोल के आंकड़े ही नतीजों में बदलते हैं?
बिल्कुल नहीं। एग्जिट पोल नतीजों का अनुमान लगाते हैं। चुनाव के नतीजे आधिकारिक रूप से भारत का निर्वाचन आयोग जारी करता है, वहीं इकलौते और अंतिम परिणाम होते हैं।
 

शिव साधना का महान पर्व महाशिवरात्रि!

शिव साधना का महान पर्व महाशिवरात्रि!

शिवरात्रि का पावन पर्व शिव साधना से परमात्मा शिव को खुश करके उनकी कृपा प्राप्त कर अपनी मनोकामना की पूर्ति करना है। यह वह दिन है जब सभी साधक भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए पूजा अर्चना करते हैं। इस साल महाशिवरात्रि 1 मार्च को मनाई जा रही है। शिवरात्रि के दिन लोग मंदिर जाते हैं और वहाँ जाकर शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। इसी के साथ सभी साधक अपने-अपने तरीकों से भगवान शिव को साधना का प्रयास करते हैं। शिव की पूजा के समय खास रंग के कपड़े पहनने से सारी मनोकामनाएं पूरी होती है। इस शिवरात्रि कौन से रंग के कपड़े आपकी पूजा को सफल बना सकते हैं।
भगवान शिव की आराधना के समय हरे रंग के कपड़े धारण करना शुभ माना जाता है। इसी के साथ अगर आप हरे रंग के साथ सफ़ेद रंग के वस्त्र भी धारण करते हैं तो यह अधिक लाभदायक होगा। जी दरअसल ऐसी मान्यता है कि भोले बाबा को सफ़ेद और हरा रंग बहुत प्रिये होता है इसलिए शिवरात्रि के दिन शिव जी को चढ़ाये हुए फूल और बेल-धतूरा सफ़ेद और हरे रंग के ही होते हैं।
इसी के साथ शिवरात्रि के दिन हरे रंग को धारण करना बहुत शुभ मन जाता है। वहीं अगर आपके पास हरे या सफ़ेद रंग के वस्त्र नहीं हैं तो आप लाल, केसरिया, पीला, नारंगी तथा गुलाबी रंग के वस्त्र धारण कर के भोले बाबा की आराधना कर सकते हैं। ध्यान रहे भगवान शिव को काला रंग बिलकुल भी प्रिये नहीं होता। दरअसल काला रंग अंधकार और भसम का प्रतीक होता है इसलिए कभी भी शिवरात्रि के दिन काले रंग के वस्त्र न धारण करें। आपको बता दें कि काले वस्त्रों के साथ काला दुपट्टा, बिंदी, चूडिय़ां भी नहीं पहनना चाहिए। वहीं अगर आप भगवान शिव को अपनी श्रद्धा और आराधना से प्रसन्न करना चाहते हैं तो शिवरात्रि के दिन काले रंग का त्याग कर दें।
महाशिवरात्रि पर्व शिव और शक्ति के मिलन का पर्व माना जाता है। वैसे तो प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को ये पर्व मनाया जाता है। लेकिन फाल्गुन महीने में आने वाली मासिक शिवरात्रि सबसे खास होती है जिसे महा शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। शिव भक्तों के लिए ये दिन काफी खास होता है। इस साल ये पर्व 1 मार्च को मनाया जा रहा है।महाशिवरात्रि 1 मार्च को सुबह 3 बजकर 16 मिनट से शुरू होकर 2 मार्च को सुबह 10 तक रहेगी।
पहला प्रहर का मुहूर्त-:1 मार्च शाम 6 बजकर 21 मिनट से रात्रि 9 बजकर 27 मिनट तक है।
दूसरे प्रहर का मुहूर्त-: 1 मार्च रात्रि 9 बजकर 27 मिनट से 12 बजकर 33 मिनट तक है।
तीसरे प्रहर का मुहूर्त-: 1 मार्च रात्रि 12 बजकर 33 मिनट से सुबह 3 बजकर 39 मिनट तक है।
चौथे प्रहर का मुहूर्त-: 2 मार्च सुबह 3 बजकर 39 मिनट से 6 बजकर 45 मिनट तक है।
पारण समय-: 2 मार्च को सुबह 6 बजकर 45 मिनट के बाद है।सनातन धर्म के अनुसार शिवलिंग स्नान के लिये रात्रि के प्रथम प्रहर में दूध, दूसरे में दही, तीसरे में घृत और चौथे प्रहर में मधु, यानी शहद से स्नान कराने का विधान है. इतना ही नहीं चारों प्रहर में शिवलिंग स्नान के लिये मंत्र भी अलग हैं।
प्रथम प्रहर में- 'ह्रीं ईशानाय नम:Ó
दूसरे प्रहर में- 'ह्रीं अघोराय नम:Ó
तीसरे प्रहर में- 'ह्रीं वामदेवाय नम:Ó
चौथे प्रहर में- 'ह्रीं सद्योजाताय नम:Ó।। मंत्र का जाप करना चाहिए।एक साल में कुल 12 शिवरात्रि आती हैं, लेकिन फाल्गुन मास की महाशिवरात्रि का विशेष महत्व है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन भगवान शिव और शक्ति का मिलन हुआ था। वहीं ईशान संहिता के अनुसार फाल्गुन मास की चतुर्दशी तिथि को भोलेनाथ दिव्य ज्योर्तिलिंग के रूप में प्रकट हुए थे। शिवपुराण में उल्लेखित एक कथा के अनुसार इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था और भोलेनाथ ने वैराग्य जीवन त्याग कर गृहस्थ जीवन अपनाया था। इस दिन विधिवत आदिदेव महादेव की पूजा अर्चना करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है व कष्टों का निवारण होता है।अमावस्या से एक दिन पूर्व, हर चंद्र माह के चौदहवें दिन को शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। एक कैलेंडर वर्ष में आने वाली सभी शिवरात्रियों के अलावा फरवरी-मार्च माह में महाशिवरात्रि मनाई जाती है। इन सभी में से महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व सबसे ज्यादा है। इस रात, ग्रह का उत्तरी गोलार्द्ध कुछ ऐसी स्थिति में होता है कि मनुष्य में ऊर्जा सहज ही ऊपर की ओर बढ़ती है। इस दिन प्रकृति मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने में सहायता करती है। इस अवसर का लाभ उठाने के लिए ही, इस परंपरा में हमने इस पूरी रात चलने वाले उत्सव की स्थापना की। इस उत्सव का एक सबसे मुख्य पहलू ये पक्का करना है कि प्राकृतिक ऊर्जाओं के प्रवाह को अपनी दिशा मिल सके। इसलिए आप अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रखते हुए जागते रहते हैं।आध्यात्मिक पथ पर चलने वालों के लिए महाशिवरात्रि का पर्व बहुत महत्वपूर्ण है। पारिवारिक परिस्थितियों में जी रहे लोगों तथा महत्वाकांक्षियों के लिए भी यह उत्सव बहुत महत्व रखता है। जो लोग परिवार के बीच गृहस्थ हैं, वे महाशिवरात्रि को शिव के विवाह के उत्सव के रूप में मनाते हैं। सांसारिक महत्वाकांक्षाओं से घिरे लोगों को यह दिन इसलिए महत्वपूर्ण लगता है क्योंकि शिव ने अपने सभी शत्रुओं पर विजय पा ली थी।
साधुओं के लिए यह दिन इसलिए महत्व रखता है क्योंकि वे इस दिन कैलाश पर्वत के साथ एकाकार हो गए थे। वे एक पर्वत की तरह बिल्कुल स्थिर हो गए थे। यौगिक परंपरा में शिव को एक देव के रूप में नहीं पूजा जाता,, वे आदि गुरु माने जाते हैं जिन्होंने ज्ञान का शुभारंभ किया। ध्यान की अनेक सहस्राब्दियों के बाद, एक दिन वे पूरी तरह से स्थिर हो गए। वही दिन महाशिवरात्रि था। उनके भीतर की प्रत्येक हलचल शांत हो गई और यही वजह है कि साधु इस रात को स्थिरता से भरी रात के रूप में देखते हैं।
यौगिक परंपरा के अनुसार इस दिन और रात का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इस दिन आध्यात्मिक जिज्ञासु के सामने असीम संभावनाएँ प्रस्तुत होती हैं। आधुनिक विज्ञान अनेक चरणों से गुजऱते हुए, उस बिंदु पर आ गया है, जहाँ वे ये प्रमाणित कर रहे हैं – कि आप जिसे जीवन के रूप में जानते हैं, जिसे आप पदार्थ और अस्तित्व के तौर पर जानते हैं, जिसे ब्रह्माण्ड और आकाशगंगाओं के रूप में जानते हैं, वह केवल एक ऊर्जा है जो अलग-अलग तरह से प्रकट हो रही है।
यह वैज्ञानिक तथ्य ही प्रत्येक योगी का भीतरी अनुभव होता है। योगी शब्द का अर्थ है, ऐसा व्यक्ति जिसने अस्तित्व की एकात्मकता का एहसास पा लिया हो। जब मैं 'योगÓ शब्द का प्रयोग करता हूँ तो मैं किसी एक अभ्यास या तंत्र की बात नहीं कर रहा। उस असीमित को जानने की हर प्रकार की तड़प, अस्तित्व के उस एकत्व को जानने की इच्छा – योग है। महाशिवरात्रि की वह रात, उस अनुभव को पाने का अवसर भेंट करती है।हम सत्यम,शिवम,सुंदरम को आत्मसात कर स्वयं को आत्म बोध में स्थापित कर परमात्मा से अपनी लौ लगाये।यह लौ हमारे अंदर के विकारों से हमे मुक्त कर हमारे कल्याण का माध्यम बनती है।युग परिवर्तन के लिए भी परमात्मा शिव हमे संगम युग मे ईश्वरीय ज्ञान प्राप्ति कराकर कलियुग से सतयुग में लाने के लिए यज्ञ रचते है।जिसमे स्त्री शक्ति का पोषण कर उन्हें युग परिवर्तन के निमित्त बनाया जाता है।वस्तुत:विश्व रचियता परमात्मा एक है जिसे कुछ लोग भगवान,कुछ लोग अल्लाह,कुछ लोग गोड ,कुछ लोग ओम, कुछ लोग ओमेन ,कुछ लोग सतनाम कहकर पुकारते है। यानि जो परम ऐश्वर्यवान हो,जिसे लोग भजते हो अर्थात जिसका स्मरण करते हो एक रचता के रूप में ,एक परमशक्ति के रूप में एक परमपिता के रूप में वही ईश्वर है और वही
शिव है। एक मात्र वह शिव जो ब्रहमा,विष्णु और शकंर के भी रचियता है। जीवन मरण से परे है। ज्योति बिन्दू स्वरूप है। वास्तव में शिव एक ऐसा शब्द है जिसके उच्चारण मात्र से परमात्मा की सुखद अनुभूति होने लगती है। शिव को कल्याणकारी तो सभी मानते है, साथ ही शिव ही सत्य है
शिव ही सुन्दर है यह भी सभी स्वीकारते है। परन्तु यदि मनुष्य को शिव का बोध हो जाए तो उसे जीवन मुक्ति का लक्ष्य प्राप्त हो सकता है।
गीता में कहा गया है कि जब जब भी धर्म के मार्ग से लोग विचलित हो जाते है,समाज में अनाचार,पापाचार
,अत्याचार,शोषण,क्रोध,वैमनस्य,आलस्य,लोभ,अहंकार,का प्रकोप बढ़ जाता है।माया मोह बढ जाता है तब परमात्मा को स्वयं आकर राह भटके लोगो को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा का
कार्य करना पडता है। ऐसा हर पाचं हजार साल में पुनरावृत
होता है। पहले सतयुग,फिर द्वापर,फिर त्रेता और फिर कलियुग तक
की यात्रा इन पांच हजार वर्षो में होती है। हांलाकि
सतयुग में हर कोई पवित्र,सस्ंकारवान,चिन्तामुक्त और सुखमय
होता है।परन्तु जैसे जैसे सतयुग से द्वापर और द्वापर से त्रेता
तथा त्रेता से कलियुग तक का कालचक्र धूमता है। वैसे वैसे
व्यक्ति रूप में मौजूद आत्मायें भी शान्त,पवित्र और
सुखमय से अशान्त,दुषित और दुखमय हो जाती है। कलियुग
को तो कहा ही गया है दुखों का काल। लेकिन जब कलियुग
के अन्त और सतयुग के आगमन की धडी आती है तो उसके
मध्य के काल को सगंम युग कहा जाता है यही वह समय जब
परमात्मा स्वंय सतयुग की दुनिया बनाने के लिए आत्माओं
को पवित्र और पावन करने के लिए उन्हे स्वंय ज्ञान देते है
औरउन्हे सतयुग के काबिल बनाते है। समस्त देवी देवताओ में मात्र शिव ही ऐसे देव है
जो देव के देव यानि महादेव है जिन्हे त्रिकालदर्शी भी
कहा जाता है। परमात्मा शिव ही निराकारी और ज्योति स्वरूप
है जिसे ज्योति बिन्दू रूप में स्वीकारा गया है। परमात्मा
सर्व आत्माओं से न्यारा और प्यारा है जो देह से परे है
जिसका जन्म मरण नही होता और जो परमधाम का वासी है
और जो समस्त संसार का पोषक है। दुनियाभर में
ज्योतिर्लिगं के रूप में परमात्मा शिव की पूजा अर्चना और
साधना की जाती है। शिवलिंग को ही ज्योतिर्लिंग के रूप
में परमात्मा का स्मृति स्वरूप माना गया है।धार्मिक दृष्टि में विचार मथंन करे तो भगवान शिव ही एक मात्र ऐसे परमात्मा है जिनकी देवचिन्ह के रूप में शिवलिगं की स्थापना कर पूजा की जाती है। लिगं शब्द का साधारण अर्थ चिन्ह अथवा लक्षण है। चूंकि भगवान शिव ध्यानमूर्ति के रूप में विराजमान ज्यादा होते है इसलिए प्रतीक रूप में अर्थात ध्यानमूर्ति के रूप शिवलिगं की पूजा की जाती है। पुराणों में लयनाल्तिमुच्चते अर्थात लय या प्रलय से लिगं की उत्पत्ति होना बताया गया है। जिनके प्रणेता भगवान शिव है। यही कारण है कि भगवान शिव को प्राय शिवलिगं के रूप अन्य सभी देवी देवताओं को मूर्ति रूप पूजा की जाती है।
शिव स्तुति एक साधारण प्रक्रिया है। ओम नम: शिवाय का साधारण उच्चारण उसे आत्मसात कर लेने का नाम ही शिव अराधना है।
- डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट


 

विश्व रेडियो दिवस: रेडियो संवाद का सशक्त माध्यम : मुख्यमंत्री श्री बघेल

विश्व रेडियो दिवस: रेडियो संवाद का सशक्त माध्यम : मुख्यमंत्री श्री बघेल

मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस के अवसर पर जारी अपने संदेश में कहा है कि रेडियो सदियों पुराना विश्वसनीय संचार माध्यम है। यह दूर-दराज स्थानों तक सूचना प्रवाह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा है कि लोकतंत्र में संवाद होना एवं संवाद के लिए सक्षम माध्यमों का होना अति महत्वपूर्ण है। ‘‘रेडियो‘‘ संवाद का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। आज विश्व रेडियो दिवस के अवसर पर हम रेडियो के योगदान को सलाम करते है। श्री बघेल ने कहा है कि आमजन से रू-ब-रू होने के लिए चलाए जा रहे ‘‘लोकवाणी‘‘ जैसे कार्यक्रम रेडियो के कारण ही संभव हो सके है। 

बसंत पंचमी पर विशेष: प्रकृति परिवर्तन का पर्व बसंत पंचमी!

बसंत पंचमी पर विशेष: प्रकृति परिवर्तन का पर्व बसंत पंचमी!

बसंत पंचमी का पावन पर्व माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है।इस दिन मां सरस्वती की पूजा अर्चना करने का विधान है। बसंत पंचमी 5 फरवरी को सिद्ध साध्य और रवि योग के त्रिवेणी योग में मनायी जाएगी। अबूझ मुहूर्त के कारण सभी इस घड़ी को विवाह योग के रूप में उपयोग कर सकते है। मंदिर में मां सरस्वती का विशेष श्रृंगार और पूजा की जाएगी। इस बार बसंत पंचमी 5 फरवरी, के दिन मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यता है कि मां सरस्वती की पूजा करने से व्यक्ति को करियर और परीक्षा में सफलता मिलती है। खासतौर पर नौकरी-पेशा, स्कूल-कॉलेज, संस्थान और कला के क्षेत्र से जुड़े लोग इस दिन मां सरस्वती की पूजा करते हैं। आज ही के दिन पृथ्वी की अग्नि, सृजन की तरफ अपनी दिशा करती है। जिसके कारण पृथ्वी पर समस्त पेड़ पौधे फूल मनुष्य आदि गत शरद ऋतु में मंद पड़े अपने आंतरिक अग्नि को प्रज्जवलित कर नये सृजन का मार्ग प्रशस्त करते हैं। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि स्वयं के स्वभाव प्रकृति एवं उद्देश्य के अनुरूप प्रत्येक चराचर अपने सृजन क्षमता का पूर्ण उपयोग करते हुए, जहां संपूर्ण पृथ्वी को हरी चादर में लपेटने का प्रयास करता है, वहीं पौधे रंग—बिरंगे सृजन के मार्ग को अपनाकर संपूर्णता में प्रकृति को वास्तविक स्वरूप प्रदान करते हैं। इस रमणीय, कमनीय एवं रति आदर्श ऋतु में पूर्ण वर्ष शांत रहने वाली कोयल भी अपने मधुर कंठ से प्रकृति का गुणगान करने लगती है। एवं महान संगीतज्ञ बसंत रस के स्वर को प्रकट कर सृजन को प्रोत्साहित करते हैं। प्रकृति में प्रत्येक सौंदर्य एवं भोग तथा सृजन के मूल माने जाने वाले भगवान शुक्र देव अपने मित्र के घर की यात्रा के लिए बेचैन होकर इस उद्देश्य से चलना प्रारंभ करते हैं कि उत्तरायण के इस देव काल में वह अपनी उच्च की कक्षा में पहुंच कर संपूर्ण जगत को जीवन जीने की आस व साहस दे सकें।
शास्त्रों के अनुसार बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती के मंत्रों का जाप और सरस्वती वंदना अवश्य करनी चाहिए।इसके बाद मां सरस्वती की आरती करना बिल्कुल न भूलें।तभी सरस्वती की पूजा संपन्न मानी जाती है और पूजा का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
कहते है,सृष्टि के आरम्भ में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों की रचना की थी। जिनमे मनुष्य का भी उदभव हुआ।लेकिन अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे, उन्हें लगा कि कुछ कमी रह गई है, जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहा।तब भगवान विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से पृथ्वी पर जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कम्पंन होने लगा। तभी एक चतुर्भुजी स्त्री के रूप में अदभुत शक्ति का प्राकट्य हुआ, जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला प्रतिष्ठित थीं।
ब्रह्मा जी ने प्रकट हुई देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुर नाद किया, संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल हो गया व हवा चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्माजी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती नाम दिया। मां सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादिनी और बाग्देवी आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। यह देवी विद्या और बुद्धि की प्रदाता हैं, संगीत की उत्पत्ति करने के कारण यह संगीत की देवी भी कहलाती हैं।वही वसंत पंचमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने मां सरस्वती को वरदान दिया था कि उनकी प्रत्येक ब्रह्मांड में माघ शुक्ल पंचमी के दिन विद्या आरम्भ के शुभ अवसर पर पूजा होगी। श्रीकृष्ण के वर प्रभाव से प्रलयपर्यन्त तक प्रत्येक कल्प में मनुष्य, मनुगण, देवता, मोक्षकामी, वसु, योगी, सिद्ध, नाग, गन्धर्व और राक्षस आदि सभी बड़ी भक्ति के साथ सरस्वती की पूजा करते है। पूजा के अवसर पर विद्वानो द्वारा सम्यक् प्रकार से मां सरस्वती का स्तुति-पाठ होता है। भगवान श्री कृष्ण ने सर्वप्रथम देवी सरस्वती की पूजा की थी, तत्पश्चात ब्रह्मा, विष्णु , शिव और इंद्र आदि देवताओं ने मां सरस्वती की आराधना की। तब से मां सरस्वती सम्पूर्ण प्राणियों द्वारा सदा पूजित हो रही है। बसंत पंचमी पर मां सरस्वती को पीले रंग का फूल और फूल अर्पण किए जाते हैं। शुभ मुहूर्त में कई गई पूजा और साधना का भी महत्व है। यह दिन बसंत ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है। इसलिए श्रद्धालु गंगा मां के साथ-साथ अन्य पवित्र नदियों में डुबकी लगाने के साथ आराधना भी करते है। वहीं इस समय फूलों पर बाहर आ जाती है, खेतों में सरसों के फूल चमकने लगते हैं, गेहूं की बालियां भी खिलखिला उठती हैं। इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनने के साथ पतंग और स्वादिष्ट चावल बनाए जाते हैं। पीला रंग बसंत का प्रतीक है।संगीत के क्षेत्र से जुड़े लोग इस दिन का सालभर से इंतजार करते हैं। बसंत पंचमी के अवसर पर इस साल दो उत्तम योग बन रहे हैं, जिसके कारण पूरे जिन शुभ कार्य किए जा सकते हैं। इस दिन लोग पीले वस्त्र पहनकर सुबह सवेरे मां सरस्वती की अराधना करते हैं।
बसंत पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठना चाहिए। कोशिश करनी चाहिए कि सूर्योदय से कम से कम दो घंटे पहले बिस्तर छोड़ देने चाहिए।बसंत पंचमी के दिन स्नान करके साफ कपड़े पहनने चाहिए।
बसंत पंचमी के दिन मंदिर की सफाई करनी चाहिए। मां सरस्वती को पूजा के दौरान पीली वस्तुएं अर्पित करनी चाहिए। जैसे पीले चावल, बेसन का लड्डू आदि।सरस्वती पूजा में पेन, किताब, पेसिंल आदि को जरूर शामिल करना चाहिए और इनकी पूजा करनी चाहिए।बसंत पंचमी के दिन लहसुन, प्याज से बनी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए। महाकवि कालिदास ने ऋतुसंहार नामक काव्य में इसे ''सर्वप्रिये चारुतर वसंते'' कहकर अलंकृत किया है। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने ''ऋतूनां कुसुमाकरा:'' अर्थात मैं ऋतुओं में वसंत हूं, कहकर वसंत को अपना स्वरुप बताया है। वसंत पंचमी के दिन ही कामदेव और रति ने पहली बार मानव ह्रदय में प्रेम और आकर्षण का संचार किया था। इस दिन कामदेव और रति के पूजन का उद्देश्य दांपत्त्य जीवन को सुखमय बनाना है, जबकि सरस्वती पूजन का उद्देश्य जीवन में अज्ञानरूपी अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश उत्त्पन्न करना है।वसंत पंचमी के दिन यथाशक्ति ''? ऐं सरस्वत्यै नम: '' का जाप करें। माँ सरस्वती का बीजमंत्र '' ऐं '' है, जिसके उच्चारण मात्र से ही बुद्धि विकसित होती है। इस दिन से ही बच्चों को विद्या अध्ययन प्रारम्भ करवाना चाहिए। ऐसा करने से बुद्धि कुशाग्र होती है और माँ सरस्वती की कृपा बच्चों के जीवन में सदैव बनी रहती है।इस बार पंचमी तिथि 5 फरवरी को प्रात: 3.47 बजे से अगले दिन छठे दिन प्रात: 3.46 बजे तक रहेगी। इस अवसर पर अगले दिन शाम 4 बजे से शाम 7.11 बजे से शाम 5.42 बजे तक सिद्धयोग रहेगा। 5.43 बजे से दिन तक साध्य योग रहेगा। इसके अलावा रवि योग का संयोग भी बना रहा। ये संयोग दिन को शुभ बना रहे हैं। इससे पहले गुप्त नवरात्रि 2 फरवरी से शुरू हो जाएगी।बसंत पंचमी 5 फरवरी शनिवार के दिन मनाई जाएगी। इस विशेष अवसर पर सिद्ध, साध्य और रवि योग के त्रिवेणी योग में ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा की जाएगी। जो कार्य में शुभता और सिद्धि प्रदान करती है। अबूझ मुहूर्त के चलते शहर भर में एक हजार से अधिक विवाह कार्यक्रम होंगे। इसके साथ ही विद्यारंभ समारोह होगा और मंदिरों में मां सरस्वती का विशेष श्रृंगार और पूजा की जाएगी। माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 5 फरवरी को प्रात: 3.47 बजे से अगले दिन छठे दिन प्रात: 3.46 बजे तक रहेगी। इस अवसर पर अगले दिन शाम 4 बजे से शाम 7.11 बजे से शाम 5.42 बजे तक सिद्धयोग रहेगा। 5.43 बजे से दिन तक साध्य योग रहेगा। इसके अलावा रवि योग का संयोग भी बना रहा। ये संयोग दिन को शुभ बना रहे हैं। इससे पहले गुप्त नवरात्रि 2 फरवरी से शुरू होगी।
बसंत पंचमी का दिन दोषमुक्त दिन माना जाता है। इसी वजह से इसे सेल्फ साइडिंग और अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है। इसी वजह से इस दिन बड़ी संख्या में शादियां होती हैं। विवाह के अलावा मुंडन समारोह, यज्ञोपवीत, गृह प्रवेश, वाहन खरीदना आदि शुभ कार्य भी किए जाते हैं। इस दिन को बागेश्वरी जयंती और श्री पंचमी के नाम से भी जाना जाता है।
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

 

शहादत दिवस पर विशेष: विचारधारा मे हमेशा जीवित रहेंगे महात्मा गांधी !

शहादत दिवस पर विशेष: विचारधारा मे हमेशा जीवित रहेंगे महात्मा गांधी !

देश और दुनिया के लिए महात्मा गांधी उन महान व्यक्तित्वों में से एक थें जो अपने विश्वास पर हिमालय की तरह अटल और द्रढ रहते थे ससांर का प्रत्येक व्यक्ति सोचता है कि गांधी जी एक उत्तम व्यक्ति थें तो उन्हे क्यों मार डाला गया यह सवाल अनेक लोगों ने उठाया लेकिन इसका जवाब है कि कुछ लोग नही चाहते कि देश दुनिया में भले लोगो का वजूद कायम रहे इसी कारण कुछ सिरफिरे ऐसे महानतम लोगो के भी दुश्मन बन जाते है। महात्मा गांधी की यह भी विषेशता थी कि वह चाहे कही भी रहे और चाहे जिस तरह के काम व्यस्त हो लेकिन हर रोज सुबह सबसे पहले प्रार्थना जरूर करते थे। अपने देश के लोगों में भी महात्मा गांधी शीर्ष स्तर पर छाये रहे। वास्तव में यदि कोई सार रूप में भारत का प्रतिनिधित्व करने में योग्य था तो वह सिर्फ और सिर्फ महात्मा गांधी थे। बहुत सी बातों में लोगों का गांधी जी से मतभेद हो सकता है और बहुत से लोग उनसे अधिक विद्वान हो सकते है परन्तु उनमें चरित्र व राष्ट्रभक्ति की जो महतता है उसके कारण वह सब लोगों के आदर्श बन गये थे। गांधी जी निसंदेह उस धातु के बने हुए है जिस धातु से शुरमा और बलिदानी लोगों का निर्माण होता हैं आत्मिक शक्ति के बल पर महात्मा गांधी विश्व भर में छाये रहे।लेकिन दुर्भाग्य है कि देश को आजाद कराने का प्रबल आधार स्तभ बने महात्मा गांधी के प्रति कृज्ञता अभिव्यक्त करने के बजाए कुछ लोग उनके हत्यारे को महिमा मंडित करने का निदंनीय प्रयास कर रहे है। ऐसे लोगो को देश कभी माफ नही करेगा।
विचारधारा की भिन्नता के कारण ही सिरफिरे नाथूराम गोड़से ने दुनिया को अहिंसा का संदेश देने वाले उस मोहनदास कर्मचन्द गांधी को मार डाला था,जिससे भारत ही नही पूरी दुनिया प्रभावित थी और आज भी जिसका प्रभाव बरकरार है।एक ऐसा गांधी जिसने कभी अपने बारे में नही सोचा।एक ऐसा गांधी जिसने कभी अपने परिवार के बारे में नही सोचा, एक ऐसा गांधी जिसने कभी किसी पद या कुर्सी की चाहत नही की।जिसे पूरी दुनिया आज भी 'बापू' के रूप में सम्मान दे रही है,उस महान शख्सियत की गोलियों से भून कर हत्या हो जाना ,यह प्रमाणित जरूर करता है कि उस समय भी और आज भी हिंसा ने अहिंसा को बर्दाश्त नही किया है।ये दो धारायें आज भी एक दूसरे से समय समय पर टकराती है तो गांधी याद आते है।
'गांधी जी एक ऐसे महान व्यक्ति थे, जिन्हें मानवता की समझ थी। उनकी जिंदगी ने मुझे बचपन से ही प्रेरित किया है। ' दलाई लामा के ये शब्द आज भी गांधी के प्रेरक व्यक्तित्व का दर्पण है। अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति बराकओबामा के शब्दों में,' अपनी जिंदगी में प्रेरणा के लिए मैं हमेशा गांधी की तरफ देखता हूं क्योंकि वह बताते हैं कि खुद में बदलाव कर साधारण व्यक्ति भी असाधारण काम कर सकता है।' वही रबिंद्रनाथ टैगोर का विचार रहा कि महात्मा गांधी लाखों बेसहारा लोगों के दरवाजे पर पहुंच जाते हैं, उनसे उन्हीं की भाषा में बात करते हैं। आखिर और कौन है, जो इतनी सहजता से इस बड़े वर्ग को अपना रहा है। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की सोच रही कि इस देश में जो लौ महात्मा गांधी के रूप में रोशन हुई, वह साधारण नहीं थी। यह लौ आने वाले हजारों सालों तक भी राह दिखाती रहेगी। लॉर्ड माउंटबेटन कहते थे कि इतिहास में महात्मा गांधी को गौतम बुद्ध और ईसा मसीह के बराबर देखा जाएगा।वही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दो में,दो अक्तूबर को पोरबंदर में एक व्यक्ति ने जन्म नहीं लिया था बल्कि एक युग की शुरुआत हुई थी। मुझे इस बात पर पूरा विश्वास है कि वह आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने अपने समय में थे। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कहती है ,'महात्मा गांधी ने दुनिया को अहिंसा,सत्यता,राष्ट्रभक्ति की राह दिखाई,सचमुच वे एक महान आत्मा थे।'आजादी के आंदोलन में महात्मा गांधी की गिनती नरम नेता के रूप में होती थी।लेकिन उक्त आन्दोलन के गरम दल के नेता भी उनका उतना ही सम्मान करते थे जितना नरम दल के लोग उनका आदर भाव करते थे।
गरम दल के नेता के रूप में चर्चित रहे नेताजी सुभाष चन्द्र बोश भी उन्हे अपना नेता मानते थे। यही गांधी जी की अहिंसा की सबसे बडी कामयाबी थी। बैरिस्टर सम्मानजनक व्यवसाय को छोडकर देश के लिए वे आजादी के आन्दोलन में कूद पडे थे। उनका एक ही नारा था कि जैसे भी हो हम हथियार नही उठायेगे और बिना हथियार ही भारत मां को आजादी दिलायेगें। इसके लिए उन्होने स्वयं भी अंगे्रजो की लाठिया खायी और उन्हे बहुत सी यातना भी सहन करनी पडी। लेकिन देश की खातिर उन्होने कभी पीछे मुड़कर कर नही देखा।
अहिंसा के पुजारी मोहन दास कर्मचन्द गांधी जिन्हे सम्मान से बापू या फिर महात्मा गांधी कहते है,का दुनियाभर में आज भी उनकी विचारधारा रूप में नाम है और हमेशा रहेगा।' देदी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल' पंक्तिया चरितार्थ कर दिखाने वाले बापू के प्रति दुनियाभर के लोगों ने भरपूर सम्मान प्रकट किया है।
करोडों देशवासी उन्हे महान सन्त मानते थे। लक्ष्य साधन में उनकी सच्चाई और निष्ठा पर उंगली नहीें उठाई जा सकती थी। महात्मा गांधी के जीवित रहने से सारा संसार सम्पन्न था और उनके निधन से दुनिया भर को लगा कि पूरा संसार ही विपन्न हो गया है। गांधी के परामर्श देश के लिए सदा सहायक सिद्ध हुए।जिनके बल पर देश को आजादी प्राप्त हुई।
महात्मा गांधी एक ऐसे योद्धा थे जिन्होंने बल प्रयोग का सदा विरोध किया। वे बुद्धिमान नम्र, द्रढसंकल्पी और निश्चय के धनी थे।सच तो यह है कि आधुनिक इतिहास में किसी भी एक व्यक्ति ने अपनी चरित्र की वैयक्तिक शक्ति, ध्येय की पावनता और अंगीकृत उद्देश्य के प्रति निस्वार्थ निष्ठा से लोगों के दिमागों पर इतना असर नहीं डाला, जितना महात्मा गांधी का असर दुनिया पर हुआ था।
गांधी के जीवन, धर्म, राजनीति, चिंतन में, स्वतंत्रता संघर्ष में या कह लें कहीं भी, उनका हर क्षण धर्म से प्रच्छन्न था. उसी से प्रेरित-निर्देशित था. उनके पास धर्मविहीन या धर्म से परे कुछ भी नहीं था. गांधी का यह धर्म, उनके व्यक्तिगत जीवन में असंदिग्ध रूप से हिंदू था और अन्य दूसरे धर्मों के प्रति पूरी तरह सहिष्णु और विनीत था. इस धर्म का 'ईश्वर', इसकी 'आध्यात्मिकता', 'आत्मा' और 'नैतिकता' उनकी अपनी गढ़ी हुई या चुनी गई परिभाषाओं से तय होती थी. उनकी व्यक्तिगत जीवन शैली और आचरण से परिभाषित होती थी.
गांधी के जीवन के संस्कार अस्तेय, सत्य, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य से बने थे. गांधी कमोबेश इन्हें अपने जीवन में, अपने कर्म और दर्शन में हमेशा उतारने की कोशिश करते रहे. गांधी ने जब सन 1920 में अपनी पहली बड़ी राजनैतिक लड़ाई शुरू की, तब तक वे देश के पारंपरिक और कट्टर हिंदुओं के लिए भी, राष्ट्रीयता, स्वतंत्रता संघर्ष और अंग्रेजों के शासन से मुक्ति की आकांक्षा के साथ-साथ, उनकी हिंदू आस्था के रक्षक और हिंदू धर्म के पुनरुद्धार का प्रतीक भी बन चुके थे। गांधी ने खुद भी, 12 अक्तूबर, सन1921 के यंग इंडिया में घोषणा की थी: ''मैं अपने को सनातनी हिंदू कहता हूं क्योंकि मैं वेदों, उपनिषदों, पुराणों और समस्त हिंदू शास्त्रों में विश्वास करता हूं और इसीलिए अवतारों और पुनर्जन्मों में भी मेरा विश्वास है। मैं वर्णाश्रम धर्म में विश्वास करता हूं। इसे मैं उन अर्थों में मानता हूं जो पूरी तरह वेद सम्मत हैं लेकिन उसके वर्तमान प्रचलित और भोंडे रूप को नहीं मानता।
मैं प्रचलित अर्थों से कहीं अधिक व्यापक अर्थ में गाय की रक्षा में विश्वास करता हूं। मूर्तिपूजा में मेरा विश्वास नहीं है।बावजूद इस सबके, गांधी का यह हिंदू धर्म या उनका हिंदुत्व, देश के तत्कालीन प्रमुख हिंदू संगठनों, 'हिंदू महासभा' और 'राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ' के हिंदुत्व से पूरी तरह अलग था।महात्मा गांधी की प्रार्थना सभाओं में कुरआन का पाठ होता था। बाइबल और गीता उनके लिए बराबर का महत्व रखती थीं। गांधी का भारत वह भारत था, जिसमें समस्त स्तरों पर समानता के साथ, देश के समस्त धर्मों, जीवन पद्धतियों, उपासना पद्धतियों, रीति-रिवाजों का समावेश हो।उसी की आवश्यकता आज भी है। आने वाली पीढिय़ों को इस बात पर विश्वास करना मुश्किल होगा कि गांधी जैसा कोई व्यक्ति इस धरती पर चला करता था। अल्बर्ट आइंस्टीन के ये शब्द भावी पीढ़ी के मन मे गांधी की अहमियत का प्रमाण है।
डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने भी कहा था कि अगर मानवता को आगे बढ़ाना है तो गांधी बहुत ही जरूरी हैं। दुनिया में शांति और सद्भाव के लिए ही वह जीते, सोचते और काम करते हैं। हम अपने जोखिम पर ही उन्हें नजरअंदाज कर सकते हैं। बड़ी संख्या में आज भी ऐसे
लोग है जो गांधी विचारधारा अपनाकर शांति,सदभाव, प्रेम,विश्वास और सौहार्द के साथ रहना चाहते है।गोड़से एक हत्यारा तो है लेकिन कभी जननायक नही कहलाया जबकि गांधी मरकर भी आमजन के मन मे महानायक है ,अहिंसा के पुजारी है,शांति और सदभाव के पैगम्बर है।जो हमेशा अमर रहेंगे।
डा0श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

 

एक दिलचस्प किस्सा: नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पत्नी एमिली शेंकल !

एक दिलचस्प किस्सा: नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पत्नी एमिली शेंकल !

तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा आजादी मन्त्र के महानायक सुभाष चंद्र बोस के बारे में बहुत कम लोग जानते है नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने एमिली शेंकल से सन 1937 में विवाह किया था।एमिली शेंकल ने एक ऐसे देश भारत को ससुराल के रूप में चुना जहां कभी वह "बहू" के रूप में आई ही नही, तभी तो न बहू के आगमन पर मंगल गीत गाये गये, न उनकी बेटी अनीता बोस के पैदा होने पर कोई खुशियां ही मनाई गई।
उन्हें सात साल के अपने वैवाहिक जीवन में पति सुभाष चन्द्र बोस के साथ मात्र तीन वर्ष रहने का अवसर मिला, इसके बाद नेताजी अपनी पत्नी और नन्हीं सी बेटी को छोड़कर देश को आजाद कराने के लिए संघर्ष करने चले गये।जाते समय नेताजी अपनी पत्नी से यह वायदा करके गये कि, पहले देश आजाद करा लूँ ,फिर हम साथ-साथ रहेंगे, पर अफसोस कि ऐसा नहीं हुआ क्योंकि कथित विमान दुर्घटना में नेता जी हमेशा हमेशा के लिए लापता हो गए। उस समय उनकी पत्नी एमिली शेंकल युवा थीं वह चाहती तो युरोपीय संस्कृति के अनुसार दूसरी शादी कर लेती, परन्तु उन्होंने ऐसा नही किया और बेहद कठिन दौर में अपना जीवन गुजारा।उन्होंने एक तारघर में मामूली क्लर्क की नौकरी और बेहद कम वेतन के साथ वह अपनी बेटी को पालती रही. उनका बहुत मन था भारत आने का, कि एक बार अपने पति के वतन की मिट्टी को हाथ से छू कर उसमे नेताजी को महसूस कर सकू ,लेकिन भारत को आजादी मिलने के बाद भी ऐसा हो न सका । नेताजी की पत्नी का बड़प्पन देखिये कि उन्होंने इसकी कभी किसी से शिकायत भी नहीं की और गुमनामी में ही मार्च 1996 में अपना जीवन को अलविदा कह दिया।
सुभाष चंद्र बोस ने एमिली शेंकल से प्रेम-विवाह किया था। सन 1934 में सुभाष चंद्र बोस अपना इलाज कराने के लिए ऑस्ट्रिया गए थे ,इसी दौरान उन्हें अपनी जीवनी लिखने का विचार आया, जिसके लिए उन्हें एक टाइपिस्ट की आवश्यकता महसूस हुई ।
तब ऑस्ट्रिया के एक मित्र ने उनकी मुलाकात एमिली शेंकल से करवाई, जो धीरे-धीरे पहले उनकी मित्र बनीं और बाद में प्रेमिका और फिर पत्नी। दोनों ने सन 1937 में शादी कर ली। 29 नवंबर सन1942 को विएना में एमिली ने एक बेटी को जन्म दिया। सुभाष चन्द्र बोस ने अपनी बेटी का नाम अनीता बोस रखा था।
शेंकल ने कभी भी बोस की पत्नी होने की पहचान उजागर नहीं की और वह अपनी बेटी को लेकर आस्ट्रिया में रहती थीं औऱ आजीविका के लिए एक तारघर में काम करती थीं। सुभाष की बेटी अनीता बोस ने काफी समय बाद मीडिया से कहा था कि उनकी मां को भी उनके पिता की मौत की खबर अन्य लोगों की तरह रेडियो समाचार से मिली थी।
एक दिलचस्प बात यह है कि उनकी शादी हिंदू परंपरा से हुई थी।लेकिन बोस और एमिली की शादी का पंजीयन नहीं हो सका था, क्योंकि जर्मन सरकार ने यह आपत्ति कर दी थी कि दोनों ने चूंकि हिंदू परंपरा से शादी की है,इसलिए इनका पंजीयन नही हो सकता। बोस की पत्नी के अतीत में झांके तो पता चलता है कि एमिली अपने परिवार के लिए कमाने वाली एक मात्र सदस्य थीं। वह एक जिम्मेदार बेटी भी थीं, इसीलिए शादी के बाद बूढ़ी मां को छोड़कर भारत आने को राजी नहीं हुईं। एक बार विएना में सुभाष चंद्र बोस के भाई सरत चंद्र बोस, उनकी पत्नी और बच्चों से वह मिली थीं और भावुक हो गई थीं। बोस और एमिली की शादीशुदा जिदंगी 9 साल रही। इसमें से दोनों केवल 3 साल ही साथ रहे। 18 अगस्त 1945 को ताईवान में विमान दुर्घटना में बोस का निधन हो गया था। मार्च 1996 में 85 वर्ष की उम्र में एमिली का भी निधन हो गया।
उनकी बेटी अनिता बोस एक जर्मन अर्थशास्त्री हैं। वे ऑग्सबर्ग यूनीवर्सिटी में प्रोफेसर रही और इस समय अपने पति प्रो. मार्टिन फाफ के साथ उनकी जर्मन सोशल डिमोक्रेटिक पार्टी में सक्रिय रहती हैं।
डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)
नोट: उपरोक्त लेख लेखक के अपने निजी विचार और just36news उपरोक्त लेख की पुष्टि नही करता है.
 

आलेख: एनडीए का बजट मंत्र: सुधार, परिवर्तन, प्रदर्शन- अनिल पद्मनाभन

आलेख: एनडीए का बजट मंत्र: सुधार, परिवर्तन, प्रदर्शन- अनिल पद्मनाभन

अब से कुछ सप्ताह के बाद, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का 10 वां केंद्रीय बजट पेश करेंगी। बजट-पूर्व परिदृश्य से पता चलता है कि केंद्रीय बजट, यह देखते हुए कि कोविड-19 का खतरा वापस आ गया है, जीवन बनाम आजीविका के संतुलन पर अपने ध्यान को केंद्रित रखना जारी रखेगा। सतत विकास पर नजर रखते हुए उद्यमिता की भावनाओं को और अधिक अवसर देने तथा उन्हें प्रेरित करने के साथ ही विभिन्न नई योजनाओं के अनावरण किए जाने की भी उम्मीद है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा केंद्रीय बजट पर उद्यम पूंजीदाताओं और निजी इच्टिी निवेशकों के एक समूह के साथ आयोजित पहली गोलमेज बैठक में इस आशय का संकेत मिलता है। खासतौर पर तब, जब प्रधानमंत्री ने वैश्विक पूंजी की सर्वाधिक प्रमुख हस्तियों से 'कारोबार करने में आसानीÓ को और बेहतर बनाने के लिए आवश्यक अभिनव विचारों के बारे में जानकारी ली थी।
जाहिर है, इसमें एक योजना मौजूद है। वास्तव में, यह मोदीनॉमिक्स का प्रमुख संकेत रहा है। लेकिन कभी-कभी अप्रत्याशित घटनाक्रम सुचारु रूप से चल रही कार्यप्रणाली में कई बाधाएं खड़ी कर देते हैं, तथापि एनडीए को योजना ही न होने के लिए दोष नहीं दिया जा सकता है।
सरसरी तौर पर नजर डालने से पता चलता है कि शासन और विकास दोनों के लिए एक नई वास्तुकला विकसित की जा रही है और इसके लिए प्रत्येक बजट क्रमिक रूप से निर्माण-कार्य को पूरा कर रहा है। वैश्विक आर्थिक व्यवधानों या हाल ही में कोविड-19 महामारी से हुए नुकसान को कम से कम करने के उपायों के साथ-साथ उक्त सभी कार्यों को अंतिम रूप दिया जा रहा है।
एनडीए कार्यकाल के शुरुआती बजटों में भ्रष्टाचार विरोधी और गरीबी उन्मूलन उपायों पर जोर दिया गया था, जबकि नियम-आधारित शासन स्थापित करने की दिशा में छोटे कदम उठाए गए, जो अपवाद-आधारित शासन में संचालित सात दशकों के परंपरागत तरीकों के विपरीत थे। ये परंपरागत तरीके कोयला खदानों और स्पेक्ट्रम की नीलामी आदि के जरिये एक ऐसा इकोसिस्टम बनाते थे, जो भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता था।
अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए उठाए गए कदमों में 2016 में किए गए उच्च मूल्य की मुद्राओं के विमुद्रीकरण एवं आधार को आयकर पैन से जोडऩे और सार्वजनिक सामानों एवं सेवाओं की लक्षित आपूर्ति शुरू करने सहित अवैध धन के खिलाफ कार्रवाई शामिल है। सार्वजनिक सामानों एवं सेवाओं की लक्षित आपूर्ति के लक्ष्य को जाम (जनधन, आधार और मोबाइल) के संक्षिप्त नाम वाले एक डिजिटल ढांचे का लाभ उठाते हुए हासिल किया गया था।
बदले में, इसका दोहरा फायदा हुआ। पहला, जाम की तिकड़ी ने प्रत्येक लाभार्थी के लिए एक आर्थिक जीपीएस को संभव बनाया जिसने सब्सिडी वाली रसोई गैस, ग्रामीण रोजगार सुरक्षा जाल, किसानों को आय सहायता और कोविड-19 संबंधी राहत सहित कई सामाजिक सुरक्षा भुगतानों की लक्षित आपूर्ति सुनिश्चित की। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण के परिणामस्वरूप मार्च 2020 के अंत में राजकोष में कुल 1.7 ट्रिलियन रुपये की बचत हुई।
दूसरा, इसने स्वदेशी प्रौद्योगिकियों के एक युग्म के केंद्र के रूप में 'आधारÓ, जोकि देश के सभी निवासियों को जारी की गई 12-अंकों वाली विशिष्ट पहचान है, के साथ भारत में डिजिटल तरीकों के एक नए सेट का शुभारंभ भी किया।
यह ठीक वही चीज थी, जिसने भुगतान का आधार बनी यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस या यूपीआई को इस कैलेंडर वर्ष में एक ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के लेन-देन का रिकॉर्ड दर्ज करने में सक्षम बनाया। सिर्फ यूपीआई ने ही फिनटेक क्रांति को बढ़ावा नहीं दिया है, बल्कि अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क, जोकि छोटे और मध्यम उद्यमों के नकदी प्रवाह डेटा को जमानत-मुक्त ऋण तक पहुंचने में मदद देगा, के निर्माण के उद्देश्य से अंतर्निहित प्रौद्योगिकियों के युग्म का लाभ उठाने वाले नवाचार वित्तीय समावेशन में अभूतपूर्व गति से तेजी ला रहे हैं।
इन नए डिजिटल तरीकों का एक महत्वपूर्ण पहलू भारतीय अर्थव्यवस्था को औपचारिक रूप देने पर जोर देना है। फिलहाल तीन-चौथाई से अधिक भारतीयों के पास बैंक खाता है, जोकि औपचारिक होने की दिशा में एक आवश्यक कदम है।
औपचारिक होने की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा कदम वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की शुरुआत थी, जिसने पहली बार देश को आर्थिक रूप से एकीकृत किया। रातोंरात, भारत जटिल अप्रत्यक्ष करों के चक्रव्यूह से निकलकर 'एक देश, एक करÓ की ओर बढ़ गया। तथ्य यह है कि राज्यों और केंद्र सरकार द्वारा अपनी संप्रभुता को सहेजने की प्रक्रिया ने एक नई संघीय राजनीति-सहकारी संघवाद- की नींव भी रखी।
साथ ही हाल के वर्षों में केंद्रीय बजट का उपयोग भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप एकदम नए सिरे से तय करने के बारे में संकेत देने के लिए किया गया है, जिसमें निजी उद्यमों की अब समान हिस्सेदारी है। जहां तक निजी उद्यमों का सवाल है, इनमें न केवल भारतीय कॉरपोरेट जगत, बल्कि तेजी से विकसित हो रहे स्टार्ट-अप्स और छोटे उद्यम भी शामिल हैं।
कारोबार करने में और आसानीÓ सुनिश्चित करने के अलावा महामारी का प्रकोप शुरू होने के बाद पेश किए गए पहले बजट में एक अभूतपूर्व और साहसिक निर्णय लिया गया जिसके तहत यह घोषणा की गई कि सार्वजनिक क्षेत्र अब अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र नहीं रह गया है। बजट में फिर एक कदम और आगे बढ़कर यह घोषणा की गई कि सार्वजनिक उपक्रमों (पीएसयू) की परिसंपत्तियों का मुद्रीकरण किया जाएगा, ताकि बुनियादी ढांचागत सुविधाओं या अवसंरचना में नए निवेश हेतु आवश्यक धनराशि का इंतजाम करने के लिए दुर्लभ पूंजी को जारी किया जा सके। उल्लेखनीय है कि देश में अपेक्षा के अनुरूप अवसंरचना न होने के कारण वस्तुओं एवं सेवाओं की आपूर्ति में बड़ी बाधा उत्पन्न होती रही है जिस वजह से अर्थव्यवस्था के विकास की गति निरंतर तेज नहीं हो पा रही है।
दरअसल, वित्त वर्ष 2021-22 के केंद्रीय बजट ने न केवल पिछले चार दशकों की राजकोषीय खामियों को ठीक करके केंद्र सरकार के बही-खातों को बिल्कुल दुरुस्त कर दिया है, बल्कि इसके साथ ही खर्च करने के स्वरूप को भी बदल दिया है जो राजस्व व्यय के बजाय अब पूंजीगत व्यय हो गया है।
अंतिम विश्लेषण में यह स्पष्ट हो गया है कि नए सिरे से मौलिक बदलाव लाने वाले इन समस्त बजटीय उपायों का एक ही उद्देश्य है: सतत विकास।
(लेखक एक पत्रकार हैं जो कैपिटलकैलकुलस ट्वीट करते हैं)

 

आलेख: कोरोना की दहाड़ और चुनावी हुंकार- प्रदीप कुमार दीक्षित

आलेख: कोरोना की दहाड़ और चुनावी हुंकार- प्रदीप कुमार दीक्षित

त्योहारों के लिए प्रसिद्ध इस देश में एक नया त्योहार जुड़ा है, वह है चुनाव। आये दिन कहीं न कहीं, किसी न किसी स्तर के चुनाव होते रहते हैं। देश में फिर चुनाव का माहौल बन रहा है। हर मुद्दे पर एक-दूसरे की टांग-खिंचाई करने वाले और कभी एक-दूसरे से सहमत नहीं होने वाले दल कुछ राज्यों में चुनाव करवाने पर सहमत हो गए हैं। किसी निर्दलीय ने भी कोरोना के जोखिम में चुनाव करवाने पर असहमति दर्ज नहीं करवाई है। चुनाव आयोग ने मतदान की तिथियों की घोषणा कर दी है और चुनाव का बिगुल बज गया है। चुनाव आयोग ने महामारी से बचने के लिए कुछ दिशा-निर्देश दिए हैं। उनका उल्लंघन करने के लिए विभिन्न दल उतावले हो रहे हैं। महामारी की दहाड़ के बीच चुनाव की हुंकार भरी जा रही है।
कैसा भी मौसम हो, कैसी भी विपदा आई हो, किसी भी वायरस का खतरा सिर पर खड़ा हो, इन्हें तो चुनाव लडऩा है। सत्तारूढ़ दल किसी भी तरह सत्ता में टिका रहना चाहता है। कुर्सी में उसकी आत्मा है। सत्ता में रहते हुए उसे हरा ही हरा दिखाई देता है। विपक्षी दल किसी भी तरह सत्ता में आना चाहता है। इसके लिए वह भरपूर दांव-पेच आजमाता रहता है। उसे सत्ता की हरियाली सपने में भी लुभाती रहती है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर विभिन्न मुद्दों पर शब्दों से कुश्ती लडऩे वाले बांके इस मुद्दे पर 'शीत निष्क्रियता’ की स्थिति में हैं। वाद-विवाद और बयानबाजी के बाद भाषणबाजी का दौर शुरू हो चुका है। दोनों पक्षों की ओर से बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं। मास्क लगाने वाले और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने वाले अल्पसंख्यक रह गये हैं। कोरोना के ओमीक्रोन वेरिएंट के मामले तेजी से बढऩे के बीच चुनावी नारे हवा में गूंजने लगे हैं।
महामारी तो देर-सवेर काबू में आ जाएगी। इसकी कौन परवाह करता है। सत्ता के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। भले ही नेता स्वयं चपेट में आ जाएं, वे वोटर और अपनी जान को जोखिम में डाल कर भी सत्ता का सुख लेना चाहते हैं। और वोटर... उसकी कौन चिंता करता है। सत्य बात तो यह है कि वोटर को स्वयं अपनी चिंता नहीं है, उसे तो बस इस-उस नेता का जय-जयकार करना है। वह मोहरा भर है।
(ये लेख लेखक के निजी विचार है)
 

आलेख: स्वामी विवेकानंद की विचारधारा युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत

आलेख: स्वामी विवेकानंद की विचारधारा युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत

आज की प्रौद्योगिकी संचालित दुनिया में, युवा एक लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं, इसलिए स्वामी विवेकानंद जी के दर्शन को समझने की आवश्यकता है । सन् 1984 में भारत सरकार ने 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जयंती के रूप मनाने की घोषणा की थी। तब से हम इस दिन को पूरी ईमानदारी के साथ मना रहे हैं और अपने देश के युवाओं के बीच स्वामी विवेकानंद की विचारधारा को प्रेषित करने का प्रयास कर रहे हैं ।
12 जनवरी 1863 को नरेंद्र नाथ दत्त का जन्म हिन्दू परिवार में हुआ । जिन्हे बाद में स्वामी विवेकानंद के नाम से दुनिया भर में जाना गया । युवाओं के प्रति उनकी सोंच के कारण भारत में हर साल 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। युवाओं के लिए प्रेरणा के अपार स्रोत रहे स्वामी विवेकानंद की कही एक-एक बात युवाओं को ऊर्जा से भर देती है। अपने छोटे से जीवन काल में ही उन्होंने पूरे दुनिया पर भारत और हिंदुत्व की गहरी छाप छोड़ी ।
11 सितंबर 1893 को शिकागो में हुए विश्व धर्म सम्मेलन में एक बेहद चर्चित भाषण दिया था, जो आज भी युवाओं को गर्व से भर देता है। युवाओं को प्रेरित करने वाले उनके विचार कुछ इस प्रकार है-
उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये।
उठो मेरे शेरो, इस भ्रम को मिटा दो कि तुम निर्बल हो । तुम एक अमर आत्मा हो, स्वच्छंद जीव हो, धन्य हो, सनातन हो, तुम तत्व नहीं हो, ना ही शरीर हो, तत्व तुम्हारा सेवक है तुम तत्व के सेवक नहीं हो।
विवेकानंद युवाओं से कहते हैं कि जिस तरह से विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न धाराएं अपना जल समुद्र में मिला देती हैं, उसी प्रकार मनुष्य द्वारा चुना हर मार्ग, चाहे अच्छा हो या बुरा भगवान तक जाता है। हमारा कर्तव्य है कि हम हर किसी को उसका उच्चतम आदर्श जीवन जीने के संघर्ष में प्रोत्साहन करें, और साथ ही साथ उस आदर्श को सत्य के जितना निकट हो सके लाने का प्रयास करें। युवा हमेशा सही रास्ते पर चलने का प्रयास करें तब जाके वो अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं ।
स्वामी कहते हैं कि तुम्हे अन्दर से बाहर की तरफ विकसित होना है। कोई तुम्हे पढ़ा नहीं सकता, कोई तुम्हे आध्यात्मिक नहीं बना सकता। तुम्हारी आत्मा के अलावा कोई और गुरु नहीं है।' यदि आप अपने जीवन में उत्कृष्ट बनना चाहते हैं आप को अपने अन्तर मन की बात सुननी पड़ेगी।
उनके अनुसार जीवन में 'एक विचार लो, उस विचार को अपना जीवन बना लो – उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो, उस विचार को जियो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो, और बाकी सभी विचार को किनारे रख दो। यही सफल होने का तरीका है।उनका यह भी मानना था जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते हैं । सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर सत्य एक ही होगा।
21वीं सदी में, जब भारत के युवा नई समस्याओं का सामना कर रहे हैं, और बेहतर भविष्य की आकांक्षा कर रहे हैं, तब इस दौर में स्वामी विवेकानंद के विचार अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। सार्थक जीवन जीने के लिए उनके चार मन्त्रों द्वारा उनके विचारों को समझा जा सकता है – शारीरिक: शारीरिक खोज से उनका मतलब था, मानव शरीर की देखभाल करना और शारीरिक कष्टों को कम करने के लिए गतिविधियाँ करना। विवेकानंद का विचार था कि युवा तभी सफल जीवन जी सकते हैं जब वे शारीरिक रूप से स्वस्थ हों। सामाजिक मंत्र में विवेकानंद चाहते थे कि युवा न केवल समाज की बेहतरी के लिए बल्कि अपने व्यक्तिगत विकास और सामाजिक विकास के लिए भी गतिविधियां करें। उन्होंने युवाओं को मनुष्य में भगवान की सेवा करने की सलाह दी। विवेकानंद ने अध्यात्म को समाज सेवा से जोड़ा ।
बौद्धिक मंत्र में उन्होंने बौद्धिक खोज यानी स्कूल, कॉलेज चलाने और जागरूकता और अधिकारिता कार्यक्रम चलाने की ऊपर जोर दिया और अपने बौद्धिक स्तर को ऊपर उठाना, ज्ञान प्राप्त करना और इसे समाज के साथ फैलाना है। उन्होंने सुझाव दिया कि भारतीय समाज के पुनर्निर्माण के लिए शिक्षा लोगों को सशक्त बनाने का प्राथमिक साधन है और सबके लिए शिक्षा पर जोर दिया। आध्यात्मिक खोज पर उन्होंने सुझाव दिया कि युवा पश्चिम से बहुत कुछ सीख सकते हैं लेकिन हमें अपनी आध्यात्मिक विरासत में विश्वास रखना चाहिए। आज, जब हमारे युवा भौतिक सफलता के बावजूद बढ़ते अलगाव, उद्देश्यहीनता, अवसाद और खुद को जकड़े हुए पाते हैं, तो उन्हें आध्यात्मिक खोज के लिए जाना चाहिए और अधिक से अधिक लक्ष्य प्राप्त करना चाहिए।
स्वामी जी ने कहा, जीवन छोटा है, लेकिन आत्मा अमर और शाश्वत है, और एक बात निश्चित है, मृत्यु..., आइए हम एक महान आदर्श को अपनाएं और अपना पूरा जीवन इसके लिए त्याग दें। विवेकानंद ने युवाओं के लिए एक आदर्श और लक्ष्य के रूप में इन चार खोजों की सलाह दी। इन मन्त्रों का उद्देश्य समग्र रूप से व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चेतना को जगाना था। इसलिए उन्होंने युवाओं का आह्वान किया कि वे अपनी सामूहिक ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण की ओर लगाएं। स्वामी विवेकानंद ने भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुडऩे के लिए हमारे देश के अन्य महान विचारकों द्वारा किए गए प्रयासों को आगे बढ़ाया। यही कारण है कि उन्हें दुनिया भर में स्वीकार्य है और उन्हें सनातन धर्म के प्रवक्ता के रूप में स्थापित करता है, जो हिंदुस्तान और हिंदुस्तानी संस्कृति का प्रतीक है।
- प्रो. सुरेश चंद्र नायक
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

 

आलेख: कोरोना कहर के बीच चुनावी लहर- राजकुमार सिंह

आलेख: कोरोना कहर के बीच चुनावी लहर- राजकुमार सिंह

मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा की लखनऊ में टिप्पणी कि सभी राजनीतिक दल समय पर चुनाव चाहते हैं, सत्ता-राजनीति की संवेदनहीनता का एक और उदाहरण है। चंद महीनों की आंशिक राहत के बाद देश एक बार फिर से कोरोना की लहर में फंसता दिख रहा है। लगभग सात माह के अंतराल के बाद नये कोरोना मामलों का दैनिक आंकड़ा एक लाख पार कर गया है। बेशक कोरोना के इस कहर के बीच सरकारों ने आम जन जीवन पर पाबंदियां भी बढ़ायी हैं। कहीं रात्रि कर्फ्यू है तो कहीं वीकेंड कर्फ्यू भी है। सरकारी-गैर सरकारी दफ्तरों में हाजिरी 50 प्रतिशत तक सीमित कर दी गयी है। शिक्षण संस्थानों पर एक बार फिर से ताले लग गये हैं तो बाजार भी शाम से ही बंद होने लगे हैं। बिना वैक्सीनेशन आवागमन आसान नहीं रह गया है तो कहीं-कहीं उसके बिना वेतन पर भी रोक है, लेकिन दिनोंदिन बढ़ती इन पाबंदियों के बीच भी एक चीज पूरी तरह खुली है—और वह है राजनीति, खासकर फरवरी-मार्च में आसन्न विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में। समाचार माध्यमों में दिखाये जाने वाले फोटो-वीडियो साक्षी हैं कि हमारे ज्यादातर राजनेता जीवन रक्षक बताया जाने वाला मास्क पहनने से ज्यादा जरूरी अपना चेहरा दिखाना समझते हैं। मास्क न पहनने वालों के चालान काटने से हुई कमाई का आंकड़ा बता कर अपनी पीठ थपथपाने में शायद ही कोई राज्य सरकार पीछे रही हो, लेकिन यह किसी ने नहीं बताया कि सत्ता का चाबुक क्या किसी सफेदपोश पर भी चला!
जब ज्यादातर नेताओं का यह आलम है तो फिर कार्यकर्ताओं से आप क्या उम्मीद करेंगे? बेशक नये कोरोना मामलों का दैनिक आंकड़ा एक दिन पहले ही एक लाख पार गया है, लेकिन नये ओमीक्रोन वेरिएंट की दिसंबर में आहट के साथ ही तमाम जानकारों ने आगाह कर दिया था कि तीसरी लहर, दूसरी लहर से ज्यादा प्रबल साबित होगी। उसके बाद भी पंजाब से लेकर गोवा तक राजनीतिक दलों-नेताओं की सत्ता लिप्सा पर कहीं कोई लगाम नजर नहीं आती। यह स्थिति तब है, जब बेकाबू दूसरी लहर और बदहाल स्वास्थ्य तंत्र के चलते अस्पतालों से श्मशान तक के हृदय विदारक दृश्य लोग भुला भी नहीं पाये हैं। किसी मारक महामारी से निपटने में हमारा स्वास्थ्य तंत्र खुद कितना बीमार नजर आता है, पूरी दुनिया देख चुकी है। जान बचाना तो दूर, हमारी सरकारें मृतकों का सही आंकड़ा तक नहीं बता पायीं। पहली लहर के हालात से सबक लेकर स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के बड़े-बड़े दावों की पोल दूसरी लहर में खुल चुकी है। कौन दावा कर सकता है कि दूसरी लहर के वक्त किये गये वैसे ही दावों की पोल तीसरी लहर में नहीं खुल जायेगी, क्योंकि घटती समस्या के मद्देनजर उससे मुंह मोड़ लेने की हमारे तंत्र की फितरत तो बहुत पुरानी है। हमारी ज्यादातर समस्याओं के मूल में आग लगने पर कुआं खोदने वाली यह मानसिकता ही है। पर मानसिकता तो तब बदले, जब मन बदले, लेकिन मन तो सत्ता-सुंदरी में इस कदर रमा है कि कुछ और नजर ही नहीं आता। हमारी राजनीति इस कदर चुनावजीवी हो गयी है कि एक चुनाव समाप्त होता है तो दूसरे की बिसात बिछाने में जुट जाती है। ऐसे में सुशासन तो बहुत दूर की बात है, शासन के लिए भी समय मुश्किल से ही मिल पाता है।
मुख्य चुनाव आयुक्त की टिप्पणी से पहले से ही देश में बहस चल रही है कि जब जान और जहान, दोनों खतरे में हैं, तब अतीत से सबक लेकर आसन्न चुनाव स्थगित क्यों न कर दिये जायें। दरअसल मुख्य चुनाव आयुक्त की वह टिप्पणी भी इसी बहस और इससे उपजे सवाल के जवाब में ही आयी। उस टिप्पणी के बाद भी बहस जारी है कि दूसरी लहर में गयीं अनगिनत इनसानी जानों से सबक लेकर तीसरी लहर में मानवीय क्षति से बचने के लिए पांच राज्यों के आसन्न विधानसभा चुनाव स्थगित करने की पहल और फैसला किसे करना चाहिए या कौन कर सकता है? याद रहे कि पिछले साल दूसरी कोरोना लहर के आसपास हुए विधानसभा चुनाव से संक्रमण को मिली घातक रफ्तार और उससे हुई जनहानि के लिए मद्रास उच्च न्यायालय ने सीधे-सीधे चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया था। उच्च न्यायालय की टिप्पणियों से तिलमिलाया चुनाव आयोग उनके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में भी गया था, लेकिन यह कभी नहीं बताया कि अगर वह नहीं, तो चुनाव प्रचार के दौरान तेज रफ्तार कोरोना संक्रमण के लिए कौन जिम्मेदार था? माना कि हमारा दंतविहीन चुनाव आयोग चुनाव स्थगित करने जैसा फैसला नहीं ले सकता, पर चुनाव प्रचार के लिए ऐसे प्रावधान तो कर सकता है, जो संक्रमण की रफ्तार रोकने में मददगार हों। पिछले साल के चुनावों में अगर बड़ी रैलियों-सभाओं पर पाबंदियों समेत वैसे प्रावधान किये गये होते तो शायद दूसरी लहर का कहर उतना मारक नहीं हुआ होता। विडंबना यह है कि उससे सबक लेकर चुनाव आयोग ने अभी तक आसन्न चुनावों के लिए भी वैसा कोई कदम नहीं उठाया है। जब कोरोना का प्रकोप कम था, तब निर्धारित समय से पहले भी तो यह चुनाव करवाये जा सकते थे?
हमारे संविधान में चुनाव स्थगन सिर्फ आपातकाल में ही संभव है, पर क्या एक संक्रामक महामारी के चलते लाखों नागरिकों की अकाल मौत और वैसी ही आशंका फिर गहराना आपातकाल नहीं है? आदर्श स्थिति होगी कि हमारे राजनीतिक दल-नेता सत्ता लिप्सा से उबर कर तकनीकी-कानूनी बहस में फंसने के बजाय व्यापक राष्ट्रहित में कुछ माह के लिए चुनाव स्थगन पर सहमति तलाशें, जो संविधान संशोधन के माध्यम से संभव भी है। बेशक जानकारों के मुताबिक, अक्सर संकटमोचक की भूमिका निभाने वाला सर्वोच्च न्यायालय भी जन जीवन की रक्षा में ऐसी पहल कर सकता है, पर सवाल वही है कि जीवंत लोकतंत्र के स्वयंभू ठेकेदार राजनीतिक दल और नेता भी कभी किसी राष्ट्र हित-जन हित की कसौटी पर खरा उतरेंगे? नहीं भूलना चाहिए कि पिछले साल कोरोना के कहर के चलते दुनिया के अनेक देशों में चुनाव स्थगित कर विलंब से करवाये गये थे। अगर हमारी सत्ताजीवी राजनीतिक व्यवस्था राष्ट्र हित-जन हित में ऐसा फैसला नहीं ले पाती, तब कम से कम उसे चुनाव प्रचार के सुरक्षित तौर-तरीके तो अवश्य ही अपनाने चाहिए, जिनके लिए चुनाव आयोग के निर्देशों की प्रतीक्षा भी जरूरी नहीं। याद रखें : जनता के लिए सत्ता होती है, सत्ता के लिए जनता नहीं।
हम कई साल से डिजिटल इंडिया का शोर सुन रहे हैं। अगर आबादी के साधन विहीन अशिक्षित बड़े वर्ग पर डिजिटल जिंदगी थोपी जा सकती है तो हमारे सर्व साधन संपन्न राजनीतिक दल और नेता अपनी राजनीति भी डिजिटल क्यों नहीं करते? बिहार और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान वर्चुअल रैलियों का प्रयोग किया भी गया था। वैसे भी हमारे ज्यादातर नेता आजकल सोशल मीडिया के जरिये ही मीडिया और जनता से संवाद करते हैं। तब चुनाव प्रचार भी मीडिया के विभिन्न अवतारों के जरिये क्यों नहीं किया जा सकता? आकाशवाणी और दूरदर्शन पर राजनीतिक दलों को उनकी हैसियत के अनुसार समय आवंटित किया जा सकता है, तो वे समाचार पत्रों-निजी टीवी चैनलों पर भी अपने चुनाव व्यय से स्थान-समय खरीद सकते हैं। बड़ी रैलियों और रोड शो की राजनीति हमारे देश में ज्यादा पुरानी नहीं है। हमारे राजनीतिक दल और नेता छोटी सभाओं और घर-घर संपर्क की पुरानी शैली फिर अपना सकते हैं। अगर आप हमेशा जनता के बीच रहते हैं तो जाहिर है, आप जनता को और जनता आपको बखूबी जानती भी होगी ही। ये पब्लिक है, सब जानती है! तब बड़ी रैलियां, रोड शो और लोक लुभावन घोषणाएं बहुत तार्किक, सार्थक नहीं लगतीं। ऐसे में कोरोना संकट एक अवसर भी है हमारी खर्चीली-दिखावटी चुनाव प्रचार शैली को वापस जनता और जमीन से जोडऩे का। अगर नेता संयम और अनुशासन अपनायेंगे, तो उनके कार्यकर्ता भी ऐसा करने को बाध्य होंगे और जनता अनुसरण को प्रेरित, वरना आत्मघाती लापरवाही की हद तो हम पर्यटन स्थलों से लेकर बाजारों तक देख ही रहे हैं।
 

विशेष लेख : चलो ऐसा उपाय अपनाएं कि लॉकडाउन लौट के न आए...

विशेष लेख : चलो ऐसा उपाय अपनाएं कि लॉकडाउन लौट के न आए...

रायपुर,जब हम हताश और निराश हो जाते हैं तो हमें जिदंगी का एक-एक पल चुनौतियों से भरा और बोझ सा लगने लगता है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि उम्मीद पर ही दुनियां टिकी है। जीवन मे आशा और निराशा दोनों होते हैं और हर इंसान के भीतर आशा और निराशा के बीच द्वंद चलता रहता है, इस दौरान हमारी सकारात्मक सोच ही होती है जो हमें उलझनों के बीच आशाओं की नई किरण दिखाती है। हमारी उम्मीदें हमें मुश्किल परिस्थितियों से उबार देती है। हम जानते हैं कि कोरोना महामारी की पहली और दूसरी लहर ने हमारा बहुत कुछ छीन लिया। किसी का बेटा, किसी का पति, भाई-बहन, किसी की मां, पिता और किसी के माता-पिता दोनों...यह एक ऐसी महामारी थी, जिसने बहुतों की जिंदगी असमय ही निगल ली और लाखों लोगों की जिंदगी को पटरी पर दौड़ानें वाली उससे जुड़े जीवनयापन के साधनों को तहस-नहस कर दिया। दहशत के साये में बीते दिनों को याद कर हर कोई सिहर उठता है। खैर समय के साथ एक बार फिर से पटरी पर लौट चुकी जिंदगी अब अच्छा दिन देखना चाहती है, लेकिन नये साल के आगाज के साथ कोरोना की तीसरी लहर और बढ़ती सख्ंया एक बार फिर सबकों सोचनें पर मजबूर कर रहा है। बीते सालों में लॉकडाउन के बीच कटी तनावपूर्ण जिंदगी जैसी परिस्थितियां फिर कोई नहीं चाहता है।
हम जानते हैं कि कोरोना की पहली लहर जब आई तो सिर्फ इस बीमारी के नाम ने ही सभी को दहशत में डाल दिया था। दूसरी लहर में पीडितों की मौतों से सभी सिहर उठे थे। अब तीसरी लहर आने की बात कही जा रही है। खैर डेल्टा वैरियंट के बाद ओमिक्रॉन वैरियंट बहुत तेजी से एक-दूसरे तक फैलने की बात कही जा रही है। अभी तक की स्थिति में संख्या बढ़ने के साथ भयावह रूप और जानलेवा होने की जानकारी नहीं है। फिर भी हम सभी को चाहिए कि तीसरी लहर से बचने का इंतजाम अपने स्तर पर भी कर लेना चाहिए। क्यांेकि कोई बीमारी या महामारी कब जानलेवा बन जाये कहा नहीं जा सकता। हमें इसलिए भी खुद को भाग्यशाली मानना चाहिए कि हम पहली और दूसरी लहर में कोरोना का शिकार होने से बच गए हैं। कोरोना की तीसरी लहर को हमें अपनी हार न मानकर एक चुनौती और सीख के रूप में देखना चाहिए क्योंकि पहली और दूसरी लहर ने हमें मौका भी तो दिया है कि हम कैसे किसी बीमारी से बचने के लिए उपाय करें ? हम कैसे लॉकडाउन में रहे ? हम कैसे दूरियों को मेंटेन करे और स्वच्छता को अपनाते हुए शरीर को फिट रखने का उपाय करें ?
हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हम ही वे लोग है, जो कोरोना को अपनी लापरवाही की वजह से एक-दूसरे तक फैलाते रहे। हम ही वे लोग है, जो शासन-प्रशासन को लॉकडाउन के लिए मजबूर कर देते हैं और अपनी लापरवाही से ही बहुत से उन लोगों का भी रोजी-रोटी छीन लेते हैं जो रोज कमाते खाते हैं। हम सभी जानते हैं कि लॉकडाउन सभी के लिए एक बड़ी मुसीबत के समान है। पटरी पर दौड़ती अर्थव्यस्था को चरमराने से लेकर विकास में बड़ा बाधक भी है। हमारे सामान्य जनजीवन से देश और राज्य की अर्थव्यवस्था जुड़ी हुई है। दुकान से सामान खरीदने से लेकर, होटल में रूकने, खाने और बस-रेल की यात्राओं, सिनेमा आदि में हम सरकार को जीएसटी के रूप में टैक्स देते हैं। यह सभी राशि देश के विकास में खर्च होती है। विगत दो साल में कोरोना की वजह से हुई लॉकडाउन ने आर्थिक गतिविधियों को बहुत नुकसान पहुचाया। छोटेे-छोटे अनेक उद्योग धंधे बंद हो गए। व्यापार शून्य होने से लाखों लोग बेरोजगार भी हुए। लॉकडाउन से सभी को कुछ न कुछ नुकसान जरूर उठाना पड़ा।
अब जबकि तीसरी लहर का खतरा मंडराया हुआ है। सभी के भीतर लॉकडाउन को लेकर चर्चाएं होने लगी है। शासन-प्रशासन भी हर पहलुओं पर नजर बनाए हुए हैं। युद्धस्तर पर कोविड अस्पताल और वार्ड और बेड की अतिरिक्त व्यवस्था सुनिश्चित की जा रही है। उनकी कोशिश है कि सभी कोरोना गाइडलाइन का पालन कर कोरोना को फैलने से रोकने में सहयोग करें। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने लॉकडाउन को अंतिम विकल्प के रूप में माना है। उन्होंने बैठक लेकर समीक्षा लेना भी प्रारंभ कर दिया है और कोरोना से डरने की बजाय सभी को सतर्क रहने कहा है।
हम सभी को भी चाहिए कि मुख्यमंत्री की बातों पर गौर करें और कोरोना प्रोटोकॉल का पालन कर अपने शहर या राज्य में लॉकडाउन जैसी समस्या को उत्पन्न न करें। हम जानते हैं कि पहली और दूसरी लहर में लॉकडाउन के बीच कोरोना का जब खौफ था, तब हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री ने अप्रवासी मजदूरों को लाने और अन्य राज्य के मजदूरों को उनके प्रदेश भेजने में कोई चूक या देरी नहीं की थी। भीषण धूप और गर्मी में राज्य के सीमावर्ती जिलों में छांव, खान-पान से लेकर नंगे पांवों में चप्पलें, मजदूरों से लेकर छात्रों के लिए रेल और बसों की व्यवस्था, ऑक्सीजन सिलेण्डरों के साथ प्रत्येक जिलों में भोजन वितरण तथा राशन दुकानों से खाद्यान की अतिरिक्त व्यवस्था सुनिश्चित की। गांव-गांव मनरेगा के माध्यम से मजदूरों को काम देकर, वनवासियों से वनोपज खरीदकर और राजीवगांधी किसान न्याय योजना, गोधन न्याय योजना के माध्यम से किसानों के जेब में पैसे डाले। इन सभी से छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था पर ज्यादा असर नहीं पड़ा। सामुदायिक, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से लेकर जिला अस्पतालों में सुविधाएं बेहतर करने के साथ राज्य सरकार ने स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने तथा अन्य सुविधाओं के लिए बजट राशि भी बढ़ाई। कोरोना प्रबंधन की दिशा में छत्तीसगढ़ सरकार का प्रयास अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर ही था।
अतः हम समझ सकते हैं कि बुरे वक्त में सरकार हमारे साथ है। हमें भी चाहिए कि कोरोना से निपटने के लिए हम भी सरकार का सहयोग करे। जहां तक संभव है और आसान है वहां हम अपनी जिम्मेदारी का परिचय देते हुए जीवन के लिए जरूरी उपायों को अपनाएं। हम नियमित रूप से मास्क पहने। एक-दूसरे से 6 फीट की दूरी को अपनाते हुए भीड़ का हिस्सा न बनें। अनावश्यक घर से बाहर न निकले। सेनेटाइजर का इस्तेमाल करे और नियमित रूप से हाथ धोते रहें। कहीं भी इधर-उधर न थूके। टीका यदि नहीं लग पाया है तो दोनों डोज जरूर लगवा लें। सर्दी, खासी, बुखार या दर्द जैसी कोई लक्षण दिखे तो नजदीक के स्वास्थ्य केंद्र में अपना उपचार कराएं। कोरोना का लक्षण सामने आने पर चिकित्सकों के अनुसार दवाइयां लें और एक जिम्मेदार नागरिक बनकर होम आइसोलेशन में या अस्पताल में रहकर पूरी तरह ठीक होने तक किसी के सम्पर्क में न आये। शादी, जन्मदिन, रैली, सभा जैसे कार्यक्रमों में भीड़ न जुटाए। जीवन अनमोल है। खुशियां मनाने के और भी बहुत मौके आएंगे। आपकी सावधानी और समझदारी न सिर्फ आपकों और आपके परिवार को कोरोना होने से बचायेगी। सजग होकर व्यापारिक गतिविधियों का संचालन, परिवहन, निर्माण सहित विकास कार्यों में भी अपना योगदान सुनिश्चित कर सकते हैं। इससे देश के अर्थव्यवस्था पर न तो असर होगा और किसी की रोजी-रोटी छीनने या रोजगार जाने का खतरा भी उत्पन्न नहीं होगा। हम अपने राज्य और देश के विकास में अपनी भागीदारी तो सुनिश्चित कर पायेंगे ही, लॉकडाउन जैसी समस्या जो हमें डरा रही है उससे भी छुटकारा पा सकते हैं।
-कमलज्योति, सहायक जनसम्पर्क अधिकारी

 

आलेख: छत्तीसगढ़ के छत्तीस माह: कांटों की राह में विकास की चाह

आलेख: छत्तीसगढ़ के छत्तीस माह: कांटों की राह में विकास की चाह

अविभाजित मध्यप्रदेश के समय धान का कटोरा कहलाने वाला हमारा छत्तीसगढ़ जब से अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आया है, विकास की नित नई सीढियां चढ़ रहा है। विकास के इस उतार चढ़ाव में छत्तीसगढ़ के किसान, गरीब और मजदूर राज्य बनने के वर्षों बाद भी जहाँ जैसे थे वही क्यों रह गए? शायद इन सवालों का जवाब किसान और मजदूर ही दे पाएंगे।
सभी मानते हैं कि विकास हुए। सड़कें बनीं, भवन बने, लेकिन क्या हम सबका सपना यही था कि राज्य बनने के बाद हमारा छत्तीसगढ़ महानगरों की तरह विकसित हो ? जी नहीं.. दरअसल छत्तीसगढ़ राज्य बनने और बनाने के पीछे यहाँ की माटी से जुड़े सभी लोगों का सपना था कि वे अपने स्वाभिमान और आत्मसम्मान के साथ अपने राज्य में रह सकें। यहाँ रहने वाले किसानों का सपना था कि उन्हें उनकी मेहनत का सही दाम मिले। मजदूर हो या गरीब सबके मन में छत्तीसगढ़ राज्य के साथ एक अटूट विश्वास भी था कि सत्ता सम्हालने वाली सरकारें उनके साथ भेदभाव न करें और उन्हें आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने में मदद करते हुए सुख-दुख की साथी बनें। यहाँ रहने वाले अनुसूचित जनजातियों, अनुसूचित जातियों और पिछड़ा वर्ग सहित सभी समाज के लोगों को साथ लेकर चले।
सैकड़ों सपनों के साथ बने छत्तीसगढ़ राज्य में छत्तीसगढिय़ों ने नई सरकार को सत्ता पर बिठाया। 17 दिसंबर 2018 को जब नई सरकार ने शपथ ली तो श्री भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने। एक किसान और जमीन से जुड़े ऐसे जुझारू नेता के मुख्यमंत्री पद पर आसीन होने से उनकी किसानी छवि से ज्यादा उनका आक्रामक स्वभाव हमेशा विरोधियों के लिये एक कांटे के जैसा बना रहा। वे छत्तीसगढिय़ों के भीतर मौजूद ठेठ छत्तीसगढिय़ा का वह भाव और छत्तीसगढ़ की परम्परा, संस्कृति, जो आधुनिक विकास और समय की चकाचौंध में कही गुम हो गयी थी, उन्हें पुनर्जीवित करना चाहते थे। वे जानते थे कि छत्तीसगढ़ का विकास बिना यहां के गरीबों, किसानों और मजदूरों को ऊपर उठाए बिना संभव ही नहीं है। वे जानते थे कि हमारे राज्य के किसान वर्षों से कर्ज में डूबे हुए हैं। धान का बेहतहाशा उत्पादन करने के बाद भी उत्पादन का सही मूल्य उन्हें नहीं मिल पा रहा है। राज्य के किसान खेती किसानी में हो रहे नुकसान की वजह से खेत बेचने में लगे हैं। वे किसानी छोड़ मजदूर बनते जा रहे हैं। गांव से परिवार बिखर रहा है। बाहर के प्रदेश जाकर किसान मजदूर बनते जा रहे हैं और राज्य की परम्परा, संस्कृति भी बिखर रही है। श्री भूपेश बघेल के मन में यह सभी बातें रही होंगी। शायद यहीं वजह है कि छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने किसानों के मर्म को समझा और किसी तरह का दबाव नहीं होने के बावजूद भी कुर्सी पर बैठते ही 18 लाख से अधिक किसानों का 9 हजार करोड़ रुपए ऋण माफी का, दूसरा 2500 रुपये धान खरीदी का फिर लोहंडीगुड़ा में आदिवासियों की जमीन वापसी का फैसला लिया। उन्होंने सिंचाई कर माफ करते हुए बिजली बिल भी आधा कर सभी वर्गों को बड़ी राहत पहुचाई।
किसान हित में लिया गया यह छत्तीसगढ़ सरकार का बड़ा नीतिगत निर्णय था, लेकिन इस निर्णय के विरूद्ध कुछ ऐसे कांटों की राह बिछा दी गई कि जिस पर चलना यानी छत्तीसगढ़ को एक बड़ा नुकसान उठाना था। यह एक चुनौती जैसी थी, फिर भी मुख्यमंत्री श्री बघेल ने संयम और सूझबूझ दिखाते हुए किसानों के हित में आगे कदम बढ़ाया। वे चाहते तो किसानों को लाभान्वित करने की बजाय केंद्र के नियमों का हवाला देकर कई हजार करोड़ रूपये बचा लेते, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। मुख्यमंत्री ने राजीव गांधी किसान न्याय योजना बनाई। उनकी नरवा, गरवा, घुरवा, बारी जैसी योजनाएं किसी फलदार वृक्ष की तरह प्रदेश के हर जिलें-हर गांव में अंकुरित होने लगी। गोधन न्याय योजना से रोजगार और पर्यावरण, पशु संरक्षण को नई दिशा मिली।
मुख्यमंत्री श्री बघेल के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ विकास की राह में तब भी पूरी गति से चलायमान था, जब विश्वव्यापी कोरोना के कहर से पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था कराह रही थी। स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के साथ कोरोना से निपटने की हर संभव कोशिश की गई। पहली और दूसरी लहर में उपजे संकट को दूर करने में सरकार ने कई अहम फैसले लिए। यह वह समय था, जब लॉकडाउन होने से किसानों के पास पैसों का संकट उठ खड़ा हुआ। इस विपरीत समय में भी मुख्यमंत्री ने राजीव गांधी न्याय योजना और गोधन न्याय योजना के माध्यम से किसानों और गौ-पालकों की जेब में पैसे डाले और वनोपज संग्रहण, मनरेगा से समय पर राशि भुगतान कर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाकर छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाए रखा। कोविडकाल में राज्य में उपचार हेतु मेडिकल उपकरणों के उत्पादन को प्राथमिकता के साथ कोविड प्रबंधन हो या बाहर से आने वाले मजदूरों को सुरक्षित घर तक पहुंचाने का काम, मुख्यमंत्री ने यहां भी अपनी दक्षता साबित की। उन्होंने परिवारों के लिए नि:शुल्क राशन की व्यवस्था सुनिश्चित की। स्कूल बंद होने पर पढ़ई तुंहर दुआर के माध्यम से ऑनलाइन शिक्षा जारी रख विद्यार्थियों को तनाव से उबारा। कोविडकाल में मृत कर्मचारियों के आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति देने नियमों को शिथिल किया।
ऐसा नहीं कि उन्होंने सिर्फ किसानों, गौ-पालकों के लिये ही सबकुछ किया। वनवासियों के लिए भी बड़े कदम उठाये। वन अधिकार पत्र देने के साथ वनोपज संग्रहण, तेंदूपत्ता समर्थन मूल्य में इजाफा कर सुदूरवर्ती क्षेत्रों के लोगों के लिए भी आर्थिक संबलता के द्वार खोले। कृषि ऋण माफी, सिंचाई कर माफी के अलावा सिंचाई क्षमता दोगुना करने की पहल की और बोध घाट सिंचाई परियोजना सहित कई बड़ी परियोजनाओं, एनीकट, व्यपवर्तन योजनाओं पर भी अपना ध्यान केन्द्रित किया।
उन्होंने गरीबों को लक्ष्य बनाकर उनसे जुड़ी योजनाएं बनाई और राज्य के विकास में इन योजनाओं को महत्वपूर्ण माना। राज्य में संचालित मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना, दाई-दीदी क्लीनिक, मुख्यमंत्री हाट बाजार क्लीनिक योजना, स्वामी आत्मानंद इंग्लिश मीडियम स्कूल योजना, मुख्यमंत्री वार्ड कार्यालय योजना, छत्तीसगढ़ महतारी दुलार योजना, पौनी-पसारी योजना, मुख्यमंत्री सुगम सड़क योजना, शहीद महेंद्र कर्मा तेंदूपत्ता संग्राहक सामाजिक सुरक्षा योजना, धरसा विकास योजना, मुख्यमंत्री वृक्षारोपण प्रोत्साहन योजना, मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान, शहरी गरीबों को पट्टा एवं आवास, ई.पंजीयन, रामवनगमन पर्यटन परिपथ का विकास, प्रशासनिक विकेन्द्रीकरण और पिछड़े अंचलों के विकास के लिए पांच नए जिले का निर्माण, अनेक नई तहसीलों के गठन, आदिवासियों के विरूद्ध दर्ज प्रकरणों की वापसी, चिटफंड कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर निवेशकों का पैसा वापस कराने सहित राष्ट्रीय स्तर पर राज्य की संस्कृति को बढ़ावा देने आदिवासी नृत्य महोत्सव का आयोजन किया। मुख्यमंत्री श्री बघेल छत्तीसगढ़ की संस्कृति, परम्परा के बड़े संरक्षक व संवाहक साबित हुए। उन्होंने तीज-त्यौहारों से लेकर यहा की सांस्कृतिक विरासत को भी अक्षुण्ण बनाये रखने की दिशा में काम किया। सार्वजनिक अवकाश घोषित कर सभी को अपने पर्व से जुड़े रहने का अवसर दिया। अधोसंरचना से जुड़े कार्यों शासकीय भवनों, सड़कों और पुलों के निर्माण कार्य भी कराए। उन्होंने गौठानों के माध्यम से स्व-सहायता समूहों को आर्थिक रूप से और भी सशक्त बनाने की दिशा में काम किया। उनके द्वारा बनाए गए उत्पादों को सी-मार्ट सहित अन्य बाजार उपलब्ध कराने के साथ कर्ज में दबे महिला समूहों के कर्ज भी माफ किया। छत्तीसगढ़ से कुपोषण मिटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली वह चाहे आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, सहायिका हो या फिर छत्तीसगढ़ को स्वच्छ बनाने वाली स्वच्छता दीदी, मुख्यमंत्री ने उनका मानदेय बढ़ाकर उनका मनोबल बढ़ाया। वर्षों से संविलयन की मांग करने वाले शिक्षकों का संविलयन तो किया ही, स्कूलों में शिक्षकों की सीधी भर्ती, पुलिस में जवानों की भर्ती के अलावा रोजगार के अनेक नये अवसर भी विकसित किए। आदिवासी अंचलों में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने का काम किया गया है। बस्तर अंचल में सैकड़ों बंद पड़े स्कूलों को शुरू किया गया। छोटे भू-खण्डों की खरीदी, जमीन की गाइड लाइन दरों में 30 प्रतिशत की कमी जैसी कल्याणकारी कदम उठाए गए।
विकास की दिशा में छत्तीसगढ़ सरकार का कार्यकाल जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, चुनौतियां आती गई। लॉकडाउन में बाजार बंद होने से जीएसटी संग्रहण में फर्क आया, लेकिन बाजार खुलने के दौर में संग्रहित जीएसटी में से राज्य के हिस्से की राशि समय पर राज्य को नहीं मिलने से भी कार्य प्रभावित हुए। छत्तीसगढ़ से चावल को लेने का मामला हो या इथेनॉल, प्रधानमंत्री आवास योजना या फिर जीएसटी से जुड़ा हुआ मामला। अनेक व्यवधानों की वजह से जनहित और कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े हुए मामलों में आगे बढऩा कांटों की राह में चलने के समान था।
एक किसान जब खेत में फसल उगाता है तो कई बार फसलों पर मौसम की मार और खड़ी फसल पर कीट-पतंगों का हमला होता है। किसान अपनी फसल बचाने कीटनाशकों का इस्तेमाल करता है। चुनौतियों से जूझते हुए किसान फसल उगा ही लेता है। ठीक वैसे ही अनेक व्यवधान और चुनौतियों के बावजूद किसान मुख्यमंत्री श्री बघेल ने राज्य के विकास में कोई कसर नहीं छोड़ी। शपथ लेते ही किसानों के कल्याण से शुरू की गई उनकी मुहिम हर चुनौतियों में भी सतत् जारी रही। देश के अन्य राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ ऐसा राज्य भी है, जहां किसानों का आंदोलन भी नहीं हुआ। खेती से जुड़े वे युवा जो अपने उत्पादन का सही मूल्य नहीं मिलने पर खेती-किसानी से दूर जा रहे थे, उन्हें अब कृषि के क्षेत्र में सुनहरा भविष्य नजर आने लगा है। शायद यहीं वजह है कि वे भी अब छत्तीसगढ़ सरकार के किसान हितैषी फैसलों को देखकर खेती-किसानी से जुडऩे लगे हैं। मुख्यमंत्री श्री बघेल के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ की सरकार ने छत्तीस माह में विकास की बुनियाद खड़ी करने के साथ धरातल पर फलीभूत भी किया है। उनके नेतृत्व में प्रदेश को अनेक राष्ट्रीय सम्मान भी हासिल हुआ और देश भर में पहचान बढ़ी।
हम सभी जानते है कि कोरोना की पहली और दूसरी लहर के बीच छत्तीसगढ़ की सरकार ने चुनौतियों के बीच 36 माह में जो-जो उपलब्ध्यिां हासिल की वह किसी से छिपी नहीं है, अब जबकि कोरोना का खतरा फिर से मंडरा रहा है। तीसरी लहर के संकेत है। ऐसे में नये साल में छत्तीसगढ़वासियों को पूरा भरोसा है कि कोरोना प्रबंधन को पुन: अपनाकर छत्तीसगढिय़ों के गौरव और आत्मसम्मान के खातिर मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल कांटों की राह में चलकर विकास और सबकों न्याय देने के साथ सशक्त बनाने की राह में सतत् आगे बढ़ेंगे और एक नवा छत्तीसगढ़ गढऩे में कामयाब होंगे।
- कमलज्योति

 

आलेख: कांग्रेस स्थापना दिवस पर विशेष, कांग्रेस का आजादी व देश के विकास में योगदान अहम!

आलेख: कांग्रेस स्थापना दिवस पर विशेष, कांग्रेस का आजादी व देश के विकास में योगदान अहम!

कांग्रेस का स्वर्णिम इतिहास देश के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के साथ जुड़ा हुआ है। इसका गठन सन 1885 में हुआ, जिसका श्रेय एलन ऑक्टेवियन ह्यूम को जाता है। एलेन ओक्टेवियन ह्यूम का जन्म सन1829 को इंग्लैंड मंध हुआ था। वह अंग्रजी शासन की सबसे प्रतिष्ठित 'बंगाल सिविल सेवा' में पास होकर सन 1849 में ब्रिटिश सरकार के एक अधिकारी बने।सन 1857 की गदर के समय वह इटावा के कलक्टर थे। लेकिन ए ओ ह्यूम ने खुद ब्रटिश सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाई और सन1882 में पद से अवकाश ले लिया और कांग्रेस यूनियन का गठन किया। उन्हीं की अगुआई में मुंबई में पार्टी की पहली बैठक हुई थी। शुरुआती वर्षों में कांग्रेस पार्टी ने ब्रिटिश सरकार के साथ मिल कर भारत की समस्याओं को दूर करने की कोशिश की और इसने प्रांतीय विधायिकाओं में हिस्सा भी लिया। लेकिन सन1905 में बंगाल के विभाजन के बाद पार्टी का रुख़ कड़ा हुआ और अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ आंदोलन शुरु हए।इसी बीच महात्मा गाँधी भारत लौटे और उन्होंने ख़िलाफ़त आंदोलन शुरु किया। शुरु में बापू ही कांग्रेस के मुख्य विचारक रहे। इसको लेकर कांग्रेस में अंदरुनी मतभेद गहराए। चित्तरंजन दास, एनी बेसेंट, मोतीलाल नेहरू जैसे नेताओं ने अलग स्वराज पार्टी बना ली।साल 1929 में ऐतिहासिक लाहौर सम्मेलन में जवाहर लाल नेहरू ने पूर्ण स्वराज का नारा दिया। पहले विश्व युद्ध के बाद पार्टी में
महात्मा गाँधी की भूमिका बढ़ी, हालाँकि वो आधिकारिक तौर पर इसके अध्यक्ष नहीं बने, लेकिन कहा जाता है कि सुभाष चंद्र बोस को कांग्रेस से निष्कासित करने में उनकी मुख्य भूमिका थी।स्वतंत्र भारत के इतिहास में कांग्रेस सबसे मज़बूत राजनीतिक ताकत के रूप में उभरी। महात्मा गाँधी की हत्या और सरदार पटेल के निधन के बाद जवाहरलाल नेहरु के करिश्माई नेतृत्व में पार्टी ने पहले संसदीय चुनावों में शानदार सफलता पाई और ये सिलसिला सन 1967 तक लगातार चलता रहा। पहले प्रधानमंत्री के तौर पर जवाहर लाल नेहरू ने धर्मनिरपेक्षता, आर्थिक समाजवाद और गुटनिरपेक्ष विदेश नीति को सरकार का मुख्य आधार बनाया जो कांग्रेस पार्टी की पहचान बनी।नेहरू की अगुआई में सन1952, सन1957 और सन1962 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने अकेले दम पर बहुमत हासिल करने में सफलता पाई। सन1964 में जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री के हाथों में कमान सौंप गई लेकिन उनकी भी सन 1966 में ताशकंद में रहस्यमय हालात में मौत हो गई। इसके बाद पार्टी की मुख्य कतार के नेताओं में इस बात को लेकर ज़ोरदार बहस हुई कि अध्यक्ष पद किसे सौंपा जाए। आखऱिकार पंडित नेहरु की बेटी इंदिरा गांधी के नाम पर सहमति बनी।देश की आजादी के संघर्ष से जुड़े सबसे मशहूर और जाने-माने लोग इसी कांग्रेस का हिस्सा थे।गांधी-नेहरू से लेकर सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद तक आजादी की लड़ाई में आम हिंदुस्तानियों की नुमाइंदगी करने वाली पार्टी ने देश को एकता के सूत्र में बांधने की कोशिश की थी।एलेन ओक्टेवियन ह्यूम सन1857 के गदर के वक्त इटावा के कलेक्टर थे। ह्यूम ने खुद ब्रटिश सरकार के खिलाफ आवाज उठाई और 1882 में पद से अवकाश लेकर कांग्रेस यूनियन का गठन किया। उन्हीं की अगुआई में बॉम्बे में पार्टी की पहली बैठक हुई थी. व्योमेश चंद्र बनर्जी इसके पहले अध्यक्ष बने। शुरुआती वर्षों में कांग्रेस पार्टी ने ब्रिटिश सरकार के साथ मिलकर भारत की समस्याओं को दूर करने की कोशिश की और इसने प्रांतीय विधायिकाओं में हिस्सा भी लिया लेकिन 1905 में बंगाल के विभाजन के बाद पार्टी का रुख कड़ा हुआ और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन शुरू हुए।दादाभाई नौरोजी और बदरुद्दीन तैयबजी जैसे नेता कांग्रेस के साथ आ गए थे।आजादी के बाद सन1952 में देश के पहले चुनाव में कांग्रेस सत्ता में आई। सन1977 तक देश पर केवल कांग्रेस का शासन था।लेकिन सन 1977 में हुए चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस से सत्ता की कुर्सी छीन ली थी। हालांकि तीन साल के अंदर ही सन1980 में कांग्रेस वापस गद्दी पर काबिज हो गई।सन 1989 में कांग्रेस को फिर हार का सामना करना पड़ा।दादा भाई नौरोजी 1886 और 1893 में कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। सन1887 में बदरुद्दीन तैयबजी तो सन1888 में जॉर्ज यूल कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे।सन1889 से सन1899 के बीच विलियम वेडरबर्न, फिरोज़शाह मेहता, आनंदचार्लू, अल्फ्रेड वेब, राष्ट्रगुरु सुरेंद्रनाथ बनर्जी, आगा खान के अनुयायी रहमतुल्लाह सयानी, स्वराज का विचार देने वाले वकील सी शंकरन नायर, बैरिस्टर आनंदमोहन बोस और सिविल अधिकारी रोमेशचंद्र दत्त कांग्रेस अध्यक्ष रहे।इसके बाद हिंदू समाज सुधारक सर एनजी चंदावरकर, कांग्रेस के संस्थापकों में शुमार दिनशॉ एडुलजी वाचा, बैरिस्टर लालमोहन घोष, सिविल अधिकारी एचजेएस कॉटन, गरम दल व नरम दल में पार्टी के टूटने के वक्त गोपाल कृष्ण गोखले, वकील रासबिहारी घोष, शिक्षाविद मदनमोहन मालवीय, बीएन दार, सुधारक राव बहादुर रघुनाथ नरसिम्हा मुधोलकर, नवाब सैयद मोहम्मद बहादुर, भूपेंद्र नाथ बोस, ब्रिटेन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में पहले भारतीय सदस्य बने एसपी सिन्हा, एसी मजूमदार, पहली महिला कांग्रेस अध्यक्ष एनी बेसेंट, सैयद हसन इमाम और नेहरू परिवार के मोतीलाल नेहरू सन 1900 से सन 1919 के बीच कांग्रेस अध्यक्ष रहे।सन 1915 में अफ्रीका से लौटकर भारत आए मोहनदास करमचंद गांधी का प्रभाव कांग्रेस की विचारधारा व आंदोलन तय करने में सन1920 के आसपास से साफ दिखना शुरू हो गया था।जो गांधी के जीवन के बाद तक भी बना हुआ है। सन1920 से भारत की आज़ादी अर्थात सन 1947 के बीच के युग में कांग्रेस अध्यक्ष पंजाब केसरी लाला लाजपत राय थे, जिन्होंने सन1920 के कलकत्ता अधिवेशन की अध्यक्षता की। स्वराज संविधान बनाने में अग्रणी रहे सी विजयराघवचारियार, जामिया मिल्लिया के संस्थापक हकीम अजमल खान, देशबंधु चितरंजन दास, मोहम्मद अली जौहर, शिक्षाविद मौलाना अबुल कलाम आज़ाद कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। सन1924 में बेलगाम अधिवेशन की अध्यक्षता महात्मा गांधी ने की थी और यहां से कांग्रेस के ऐतिहासिक स्वदेशी, सविनय अवज्ञा और असहयोग आंदोलनों की नींव पड़ी थी। सरोजिनी नायडू, मद्रास के एडवोकेट जनरल रहे एस श्रीनिवास अयंगर, मुख्तार अहमद अंसारी कांग्रेस अध्यक्ष रहे। गांधी के अनुयायी जवाहरलाल नेहरू सन 1929 में पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष बने थे सरदार वल्लभभाई पटेल, नेली सेनगुप्ता, राजेंद्र प्रसाद, नेताजी सुभाषचंद्र बोस और गांधी के अनुयायी जेबी कृपलानी भारत को आज़ादी मिलने तक कांग्रेस अध्यक्ष रहे।सन1948 और सन 1949 में पट्टाभि सीतारमैया कांग्रेस के अध्यक्ष रहे और यही वह साल था जब गांधी की हत्या हो चुकी थी. महात्मा गांधी का प्रभाव आज तक भी भारतीय राजनीति पर है, लेकिन उनकी हत्या के बाद कांग्रेस का नेहरू युग शुरू हुआ। पहले प्रधानमंत्री बन चुके पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय में जिस साल संविधान लागू हुआ ।सन 1950 में कांग्रेस के अध्यक्ष साहित्यकार पुरुषोत्तमदास टंडन थे।सन1951 से सन 1954 तक खुद नेहरू अध्यक्ष रहे। पंडित नेहरू युग में 1955 से सन19 59 तक यूएन धेबार कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। सन 1959 में पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी बनी थी।सन 1960 से सन 1963 तक नीलम संजीव रेड्डी, नेहरू के निधन के सन 1964 से सन19 67 तक कामराज कांग्रेस अध्यक्ष रहे। हालांकि नेहरू का निधन 1964 में हो चुका था, लेकिन कांग्रेस का अगला इंदिरा गांधी युग लाल बहादुर शास्त्री की मौत के बाद शुरू होता है।सन 1966 में पहली बार देश की पहली और इकलौती महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी बनीं। कामराज के साथ उनका सत्ता संघर्ष काफी चर्चित रहा। इसके बाद ही इंदिरा की लीडरशिप और उनके 'आयरन लेडी' होने के ख्याति मिलने लगी। इंदिरा गांधी के प्रभाव के समय में सन 1968से सन 1969 तक निजालिंगप्पा, 1970से सन 1971 तक बाबू जगजीवन राम ,1972से सन 1874 तक शंकर दयाल शर्मा और सन 1975 से सन 1977 तक देवकांत बरुआ कांग्रेस अध्यक्ष रहे।
सन1977 से सन1978 के बीच केबी रेड्डी ने कांग्रेस को संभाला लेकिन इमरजेंसी के बाद कांग्रेस टूटी तो सन 1978 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस की अध्यक्ष वे स्वयं बनीं।कुछ समय को छोड़कर 1984 में अपनी हत्या के पहले तक इंदिरा ही अध्यक्ष रहीं। कांग्रेस ने करीब 15 साल का इंदिरा गांधी युग देखा और इसके बाद राजीव गांधी युग शुरू हुआ, कांग्रेस अध्यक्ष इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री भी बने और सन1985 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी बन गए थे। जब प्रधानमंत्री व कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी की हत्या हुई तब फिर कांग्रेस के सामने अध्यक्ष को लेकर संकट खड़ा हो गया था,क्योंकि शुरुआत में सोनिया गांधी ने सक्रिय राजनीति में आने में रुचि नहीं दिखाई थी।इसी कारण सन1992 से सन1996 तक पीवी नरसिम्हाराव ने कांग्रेस का नेतृत्व किया ।सन 1996 से सन 19 98 तक गांधी परिवार के वफादार सीताराम केसरी अध्यक्ष रहे।सोनिया गांधी का सक्रिय राजनीति में पदार्पण हुआ और सन1998 से सन 2017 तक करीब 20 वर्षो तक सोनिया ही कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं।राहुल गांधी को सन 2017 में पार्टी की कमान सौंपी गई, लेकिन सन 2019 के आम चुनावों में बड़ी हार के बाद राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद छोडऩे की पेशकश की और कहा था कि कांग्रेस अध्यक्ष गांधी परिवार के बाहर के नेता को होना चाहिए।लेकिन इसपर सहमति नही हुई। तबसे कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी ही ने कांग्रेस का नेतृत्व कर रही है। सन1991,सन 2004, सन2009 में कांग्रेस ने दूसरी पार्टियों के साथ मिलकर केंद्र की सत्ता हासिल की।आजादी के बाद कांग्रेस कई बार विभाजित हुई। लगभग 50 नई पार्टियां इस संगठन से निकल कर बनीं। इनमें से कई निष्क्रिय हो गए तो कईयों का भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और जनता पार्टी में विलय हो गया। कांग्रेस का सबसे बड़ा विभाजन सन1967 में हुआ। जब इंदिरा गांधी ने अपनी अलग पार्टी बनाई जिसका नाम कांग्रेस (आर) रखा। सन 1971 के चुनाव के बाद चुनाव आयोग ने इसका नाम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस कर दिया।राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का काम देखना एआईसीसी की जिम्मेदारी होती है. राष्ट्रीय अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के अलावा पार्टी के महासचिव, खजांची, पार्टी की अनुशासन समिती के सदस्य और राज्यों के प्रभारी इसके सदस्य होते हैं.हर राज्य में कांग्रेस की ईकाई है जिसका काम स्थानीय और राज्य स्तर पर पार्टी के कामकाज को देखना होता है।

डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)

 

छत्तीसगढ़ मॉडल से बदल रही गांव-किसानों की तस्वीर और तकदीर

छत्तीसगढ़ मॉडल से बदल रही गांव-किसानों की तस्वीर और तकदीर

किसान और खेती छत्तीसगढ़ की असल पूंजी हैं। इनकी बेहतरी और खुशहाली से ही राज्य को समृद्ध और खुशहाल बनाया जा सकता है। इस मर्म को समझकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सत्ता की बागडोर संभालते ही किसानों के हित में क्रांतिकारी फैसले लिये। खेती-किसानी, गांव और ग्रामीणों को सहेजने का जतन किया। इसी का परिणाम है कि नया छत्तीसगढ़ मॉडल तेजी से आकार ले रहा है। जिसके चलते मुरझायी खेती लहलहा उठी है और गांव गतिमान हो गए हैं। छत्तीसगढ़ मॉडल राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था अब तेजी से पुष्पित और पल्लवित होकर इठलाने लगी है। गांव, ग्रामीणों और किसानों की तस्वीर और तकदीर में सुखद बदलाव दिखाई देने लगा।
छत्तीसगढ़ सरकार की गांव, गरीब, किसान, व्यापार और उद्योग हितैषी नीतियों से समाज के सभी वर्गों में खुशहाली है। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा धान और तेंदूपत्ता की देश में सबसे अधिक कीमत पर खरीदी, किसानों की कर्ज माफी, सिंचाई कर की माफी, सुराजी गांव योजना, राजीव गांधी किसान न्याय योजना और गोधन न्याय योजना के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई जिंदगी मिली है। इसके चलते छत्तीसगढ़ के बाजारों में रौनक बरकरार है। दरअसल छत्तीसगढ़ सरकार ने जो नया आर्थिक मॉडल अपनाया है, उसमें ग्रामीण विकास एवं औद्योगिक विकास के माध्यम से आर्थिक विकास और रोजगार के नए अवसर सुलभ हुए हैं। तीन सालों में धान खरीदी, लघु वनोपज संग्रहण एवं किसानों को मिले प्रोत्साहन के जरिए ग्रामीणों, किसानों एवं संग्राहकों को लगभग 80 हजार करोड रुपए से अधिक की राशि मिली है। सुराजी गांव योजना नरवा, गरवा, घुरवा, बाड़ी से ग्रामीण विकास की प्रक्रिया तेज हुई है।
राज्य की खुशहाल ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि बीते तीन सालों में न सिर्फ खेती के रकबे में वृद्धि हुई है, बल्कि किसानों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राज्य के किसानों का लगभग 9 हजार करोड़ रूपए का कृषि ऋण माफ कर किसानों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरने के साथ ही उन्हें आत्म विश्वास से भर दिया है। समर्थन मूल्य पर धान खरीदी, किसानों के ऊपर वर्षों से बकाया सिचाई कर, राज्य के 5 लाख 81 हजार से अधिक किसानों को सिंचाई के लिए निःशुल्क एवं रियायती दर पर बिजली उपलब्ध कराकर राहत दी है।
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा शुरू की गई राजीव गांधी किसान न्याय योजना ने वास्तव में किसानों के श्रम का सम्मान करने की योजना है। इस योजना के तहत किसानों को प्रतिवर्ष लगभग 5700 करोड़ रूपए की राशि आदान सहायता तौर पर दी जा रही है। इसका सीधा लाभ खेती-किसानी और किसानों को हुआ है। प्रदेश सरकार की सुराजी गांव योजना नरवा, गरुवा, घुरवा, बाड़ी के विकास से गांव में स्वावलंबन और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिला है। स्थानीय संसाधनों के संरक्षण और विकास में लोगों की भागीदारी बढ़ी है। गांवों में बने गौठान आजीविका के केंद्र बनते जा रहे हैं। राज्य के लगभग 7777 से अधिक गौठानों में पशुओं के संरक्षण और संवर्धन की व्यवस्था के साथ ही वहां हरे चारे का उत्पादन, महिला समूह द्वारा सामूहिक रूप से सब्जी की खेती, फलदार पौधों का रोपण और जैविक खाद के उत्पादन के साथ ही अन्य आय मूलक गतिविधियों के संचालन से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नया आधार मिला है।
राज्य में पशुधन को संरक्षित एवं संवर्धित करने गांवों में रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के साथ ही जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए राज्य में गोधन न्याय योजना की शुरू की गई है। छत्तीसगढ़ सरकार इसके जरिए ग्रामीणों, किसानों और गो-पालकांे से 2 रुपये किलो में गोबर खरीदी की व्यवस्था कर ग्रामीणों और गो-पालकों को सीधा लाभ पहुंचाने का सार्थक प्रयास किया है। राज्य गौठानांे में अब तक 57 लाख क्विंटल गोबर की खरीदी की गई है, जिसके एवज में सरकार ने पशुपालकों एवं ग्रामीणों को 114 करोड़ की राशि का भुगतान किया है।
छत्तीसगढ़ राज्य में वनोपज का संग्रहण भी राज्य के वनांचल क्षेत्र के लोगों की आजीविका का बहुत बड़ा साधन रहा है। प्रदेश सरकार ने वनवासियों को वनोपज संग्रहण के जरिए लाभान्वित करने का सराहनीय प्रयास किया है। राज्य में अब 52 प्रकार के लघु वनोपज की खरीदी समर्थन मूल्य पर की जाने लगी है। लघु वनोपज के संग्रहण में छत्तीसगढ़ देश में पहले स्थान पर है। छत्तीसगढ़ सरकार कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने का जतन कर रही है। इसके लिए नई औद्योगिक नीति में कई सहूलियतें एवं प्रावधान किए गए हैं। लघु वनोपज, औषधि एवं उद्यानिकी आधारित प्रोसेसिंग यूनिट और ग्रामीण अंचल में फूड पार्क की स्थापना से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और सुदृढ़ बनाने में मदद मिलेगी।
राज्य में किसानों को सिंचाई के लिए निःशुल्क एवं रियायती दर पर बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने से खेती किसानी को बल मिला है। कृषि पंपों के ऊर्जीकरण के लिए प्रति पम्प एक लाख अनुदान राशि दी जा रही है। राज्य में लगभग 5 लाख 81 हजार से अधिक ऊर्जीकृत कृषि पम्प हैं। बीते 03 वर्षों में लगभग 60 हजार स्थायी कृषि पम्पों को ऊर्जीकृत किया गया है। राज्य शासन द्वारा कृषकों को वित्तीय राहत प्रदाय किये जाने के उद्देश्य से कृषक जीवन ज्योति योजना के अंतर्गत पात्र कृषकों को 3 अश्वशक्ति तक कृषि पम्प के बिजली बिल में 6000 यूनिट प्रति वर्ष एवं 3 से 5 अश्वशक्ति के कृषि पम्प के बिजली बिल में 7500 यूनिट प्रति वर्ष छूट दी जा रही है। इस छूट के अलावा कृषकों को फ्लेट रेट दर पर बिजली प्राप्त करने का विकल्प भी दिया गया है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के किसानों के लिए विद्युत खपत की कोई सीमा नहीं रखी गई है। वर्तमान में इस योजना के अंतर्गत 5 लाख 81 हजार किसान हितग्राही लाभान्वित हो रहें हैं।
-नसीम अहमद खान (सहायक संचालक)
 

आलेख: विनोद दुआ:पत्रकारिता के एक युग का अंत

आलेख: विनोद दुआ:पत्रकारिता के एक युग का अंत

एनडीटीवी पर ख़बरदार इंडिया विनोद दुआ लाइव ज़ायका इंडिया का जैसे चर्चित कार्यक्रमो के प्रस्तोता विनोद दुआ ने दूरदर्शन पर जनवाणी से भी पहचान बनाई थी। दूरदर्शन पर चुनाव विश्लेषण के लिए उन्हें खास प्रसिद्धि मिली। कुछ समय पहले उन्हें कोरोना संक्रमण हुआ था।उनकी बेटी मल्लिका दुआ ने पिता के निधन की जानकारी दी,तो पूरा देश स्तब्ध रह गया। विनोद दुआ को डॉक्टरों की सलाह पर पिछले दिनों दिल्ली के एक हास्पिटल के आईसीयू में भर्ती कराया गया था।मल्लिका ने कहा, हमारे निर्भय और असाधारण पिता हमारे बीच नहीं रहे।कोरोना वायरस से संक्रमित होने के चलते ही इसी साल जून माह में उन्होंने अपनी पत्नी रेडियोलॉजिस्ट पद्मावती दुआ को खो दिया था। उन्होंने एक अद्वितीय जीवन जिया, दिल्ली की शरणार्थी कॉलोनी से अपने कैरियर की शुरुआत कर वे 42 सालों तक श्रेष्ठ पत्रकारिता के शिखर तक पहुंचे और हमेशा सच के साथ खड़े रहे। देश में कोरोना की दूसरी लहर के चरम पर रहने के दौरान विनोद दुआ और उनकी पत्नी गुरुग्राम के एक अस्पताल में भर्ती कराए गए थे। उनकी सेहत तब से खराब थी और उन्हें बार-बार अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता था और अंतत: वे जीवन की जंग हार गए।उस समय जब टेलीविजन की दुनिया दूरदर्शन तक सिमटी हुई थी और टेलीविजन पत्रकारिता का कही नाम तक नही था उस समय विनोद दुआ एक नक्षत्र की तरह उभरे थे। वे साढ़े तीन दशकों तक किसी मीडिया जगत के बीच जगमगाते रहे।दूरदर्शन पर उनकी शुरुआत ग़ैर समाचार कार्यक्रमों की ऐंकरिंग से हुई थी, मगर बाद में वे समाचार आधारित कार्यक्रमों की दुनिया में दाखिल हुए और छा गए। चुनाव परिणामों के जीवंत विश्लेषण ने उनकी शोहरत को आसमान तक पहुँचा दिया था। प्रणय रॉय के साथ उनकी जोड़ी ने पूरे भारत को सम्मोहित कर लिया था। विनोद दुआ का अपना विशिष्ट अंदाज़ था। इसमें उनका बेलागपन शामिल था।जनवाणी कार्यक्रम में वे मंत्रियों से जिस तरह से सवाल पूछते या टिप्पणियाँ करते थे, उसकी कल्पना करना उस ज़माने में एक असंभव सी बात हुआ करती थी।
दूरदर्शन में कोई ऐंकर किसी मंत्री को यह कहे कि उनके कामकाज के आधार पर वे दस में से केवल तीन अंक देते हैं तो ये मंत्री के लिए बहुत ही शर्मनाक बात थी। लेकिन विनोद दुआ में ऐसा कहने का साहस था। इसीलिए मंत्रियों ने प्रधानमंत्री से इसकी शिकायत करके उनके कार्यक्रम को बंद करने के लिए दबाव भी बनाया था, मगर मन्त्रीगण कामयाब नहीं हुए थे,जो विनोद दुआ के बड़े प्रभाव का प्रमाण था।विनोद दुआ ने अपना यह अंदाज़ जीवनपर्यंत नहीं छोड़ा। आज के दौर में जब अधिकांश पत्रकार और ऐंकर सत्ता की चापलूसी करते हैं, विनोद दुआ नाम का यह व्यक्ति सत्ता से टकराने में भी कभी नहीं घबराया।उन्होंने कभी इस बात की परवाह नहीं की कि सत्ता उनके साथ क्या करेगी। सत्तारूढ़ दल ने उनको राजद्रोह के मामले में फँसाने की कोशिश की गई, मगर उन्होंने लड़़ाई लड़ी और सुप्रीम कोर्ट से जीत भी हासिल की।उनका मुकदमा मीडिया के लिए भी एक राहत साबित हुआ।
हिंदी और अँग्रेज़ी दोनों भाषाओं पर दुआ साहब की अच्छीपकड़ थी।प्रणय रॉय के साथ चुनाव कार्यक्रमों में उनकी प्रतिभा पूरे देश ने देखी और उसे सराहा भी गया। त्वरित अनुवाद की क्षमता ने उनकी ऐंकरिंग को ऊंचाई तक पहुँचा दिया था।
देश की पहली हिंदी साप्ताहिक वीडियो पत्रिका परख की उनकी लोकप्रियता का प्रमाण थी। इस पत्रिका के वे न केवल ऐंकर थे बल्कि निर्माता-निर्देशक भी थे। इसके लिए उन्होंने देश भर में संवाददाताओं का जाल बिछाया और विविध सामग्री का संयोजन करके पूरे देश को मुरीद बना लिया। वे अपने सहयोगियों को भरपूर आज़ादी देते थे। वे ज़ी टीवी के लिए एक कार्यक्रम चक्रव्यूह करते थे।ये एक स्टूडियो आधारित टॉक शो था, जिसमें ऑडिएंस के साथ किसी मौज़ू सामाजिक मसले पर चर्चा की जाती थी। इस शो में विनोद दुआ के व्यक्तित्व और ऐंकरिंग का एक और रूप देखा जा सकता था।
विनोद दुआ की पत्रकारीय समझ सहारा टीवी पर उनके द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला कार्यक्रम प्रतिदिन भी कहा जा सकता है।इस कार्यक्रम में वे पत्रकारों के साथ उस दिन के अख़बारों में प्रकाशित ख़बरों की समीक्षा करते थे। इस कार्यक्रम में उनकी भूमिका को देखकर कोई कह ही नहीं सकता था कि ऐंकर पत्रकार नहीं है।
विनोद दुआ टीवी पत्रकारिता की पहली पीढ़ी के ऐंकर थे। उन्होंने उस दौर में ऐंकरिंग शुरू की थी, जब लाइव कवरेज न के बराबर होता था।1974 में युवा मंच और 1981 में आपके लिए जैसे कार्यक्रम प्रसारित होते थे। सन 1985 में समाचार आधारित चुनाव विश्लेषण लाइव प्रसारण शुरू हुआ और उन्होंने अपनी महारत साबित कर दी। जब डिजिटल पत्रकारिता का दौर आया तो वे बड़ी आसानी से वहाँ भी अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में कामयाब रहे।
-डॉ श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट


 

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