₹1 लाख से नीचे आ सकता है सोने का भाव, खरीदने से पहले पढ़ लें यह खबर
साल 2025 में शानदार रिटर्न देने वाला सोना जनवरी 2026 में भी अपनी तेजी पर कायम रहा और एमसीएक्स पर 1,80,779 रुपये प्रति 10 ग्राम के अपने शिखर पर पहुंच गया। हालांकि, बीते शुक्रवार को एमसीएक्स पर सोना 1,56,200 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ, जो अपने पिछले रिकॉर्ड स्तर से लगभग 24,500 रुपये यानी 13.50% नीचे है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी यही हाल रहा, जहां कॉमेक्स गोल्ड 5,626.80 डॉलर प्रति औंस के रिकॉर्ड उच्च स्तर से करीब 10.50% नीचे 5,046.30 डॉलर प्रति औंस पर आ गिरा।
ब्लूमबर्ग समाचार एजेंसी ने एक रूसी डॉक्यूमेंट्स के हवाले से बताया है कि क्रेमलिन अमेरिका के साथ आर्थिक साझेदारी की संभावना तलाश रहा है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प पहलू मॉस्को का डॉलर आधारित व्यापार निपटान पर लौटना है। यह कदम ब्रिक्स देशों के डी-डॉलरीकरण यानी अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने के प्रयासों के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ब्रिक्स सदस्य व्यापार में डॉलर की जगह लेने के लिए जमकर सोना जमा कर रहे थे, लेकिन रूस का डॉलर में लौटना सीधे तौर पर इस मुहिम और सोने की बढ़ती कीमतों को प्रभावित करेगा।
क्या रूस सच में डॉलर में वापस लौट रहा है?
भू-राजनीतिक संरेखण में बदलाव की ओर इशारा करते हुए, पेस 360 के मुख्य वैश्विक रणनीतिकार अमित गोयल ने बताया कि सप्ताहांत में ब्लूमबर्ग ने रिपोर्ट दी है कि रूस डॉलर में वापस लौट रहा है। खबर में दावा किया गया है कि क्रेमलिन अमेरिका के साथ व्यापार साझेदारी की संभावना तलाश रहा है, जिसमें लेन-देन डॉलर में होगा, क्योंकि ट्रम्प किसी अन्य रूप में भुगतान स्वीकार नहीं करेंगे। रिपोर्ट के अनुसार, पुतिन प्रशासन रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त होने के मद्देनजर इस तरह की ट्रेड डील पर विचार कर रहा है, जो एक संभावित शांति समझौते का संकेत है।
गोयल ने कहा कि रूस ने अभी तक ऐसी खबरों पर कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन इतने संवेदनशील मामले पर मॉस्को की ओर से कोई खंडन न आना डिमांड-सप्लाई के खेल में एक बड़े बदलाव का संकेत है। ऐसे घटनाक्रम से ब्रिक्स देशों के डी-डॉलराइजेशन अभियान पर सीधा असर पड़ने की उम्मीद है, जो अब तक बड़े पैमाने पर सोना खरीदकर उसकी सप्लाई को सीमित कर रहे थे।
सोने की कीमतों को आसमान पर पहुंचाने वाला बड़ा कारण
एसईबीआई-रजिस्टटर्ड मार्केट एक्सपर्ट अनुज गुप्ता ने सोने की कीमतों में तेजी में केंद्रीय बैंकों की सोने की खरीदारी के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जब से डोनाल्ड ट्रम्प व्हाइट हाउस में आए, दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने ट्रम्प के टैरिफ का मुकाबला करने के लिए सोना खरीदना शुरू कर दिया। इससे मांग और आपूर्ति में भारी असंतुलन पैदा हुआ, जिससे कीमतें बढ़ीं।
विशेष रूप से ब्रिक्स सदस्यों के केंद्रीय बैंकों ने लगातार सोना खरीदा, जिसने सोने की कीमतों में तेजी के लिए ईंधन का काम किया। अनुज गुप्ता का मानना है कि वैश्विक केंद्रीय बैंकों की सोने की खरीदारी में रुकावट का सोने की कीमतों पर गहरा नकारात्मक असर होगा और हम कीमतों में तेज सुधार देख सकते हैं। यहां तक कि संभावना है कि ये केंद्रीय बैंक खुले बाजार में सोना बेचना शुरू कर सकते हैं, जिससे धातु की अधिक आपूर्ति के कारण मांग और कमजोर होगी।
ब्रिक्स देशों का डॉलर रिजर्व और उनकी दोहरी रणनीति
ब्रिक्स उभरते देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) का एक महत्वपूर्ण आर्थिक समूह है, जो सोना जमा करके तेजी से डॉलर पर अपनी निर्भरता कम कर रहा है। हालांकि आधिकारिक तौर पर ब्रिक्स देशों के पास वैश्विक सोने के भंडार का लगभग 20% है, लेकिन अपने रणनीतिक सहयोगियों के साथ मिलकर ये अब वैश्विक सोने के उत्पादन का लगभग 50% हिस्सा रखते हैं। इस रणनीति में रूस और चीन सबसे आगे रहे। 2024 में, चीन ने 380 टन सोने का उत्पादन किया, जबकि रूस ने 340 टन का योगदान दिया। सितंबर 2025 में ब्राजील ने 2021 के बाद पहली बार 16 टन सोना खरीदा।
अनुज गुप्ता के अनुसार, ब्रिक्स देशों की दोहरी रणनीति रही है: वे अधिक सोना उत्पादित कर रहे हैं और कम बेच रहे हैं, साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार से भी सोना खरीद रहे हैं। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, 2020 से 2024 के बीच, ब्रिक्स देशों के केंद्रीय बैंकों ने दुनिया के 50% से अधिक सोने की खरीदारी की। ब्रिक्स की अर्थव्यवस्थाएं आज वैश्विक व्यापार का लगभग 30% हिस्सा हैं, जिससे उनके मौद्रिक विकल्पों को वैश्विक प्रासंगिकता मिलती है। रूस के डॉलर में लौटने से ब्लॉक के डी-डॉलराइजेशन के लंबे समय से चले आ रहे उद्देश्य को खतरा पैदा हो जाएगा।
सरकारी बांड सोने की जगह लेंगे सुरक्षित निवेश के रूप में?
पेस 360 के विशेषज्ञ अमित गोयल का कहना है कि जनवरी 2026 के सीपीआई आंकड़ों में अमेरिकी मुद्रास्फीति में वृद्धि ने आर्थिक मंदी की आशंका को फिर से बढ़ा दिया है, क्योंकि वहां मांग और कंपनियों की कमाई पहले से ही दबाव में है। इससे मार्च 2026 की बैठक में अमेरिकी फेड दर में कटौती की संभावना रुक गई है। ऐसे में अमेरिकी डॉलर इंडेक्स, जो 110 के रिकॉर्ड स्तर से गिरकर 100 से नीचे आ चुका है, पर और बिकवाली का दबाव बनने की उम्मीद है।
हालांकि, आर्थिक अनिश्चितता के इस माहौल में सोना सुरक्षित निवेश (सेफ हेवन) का विकल्प नहीं बन पाएगा, क्योंकि यह पहले ही अपने चरम पर पहुंच चुका है। उन्होंने 2008 के अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि आर्थिक अनिश्चितता की स्थिति में लंबी अवधि के सरकारी बांड सोने और चांदी की जगह सुरक्षित निवेश की मांग को पूरा कर सकते हैं। उनका सुझाव है कि लंबी अवधि के निवेशकों को 30 या 40 साल के सरकारी बांड पर ध्यान देना चाहिए।
सोने की कीमतें और कितनी गिरेंगी ?
सोने की कीमतों की डिमांड-सप्लाई में संरचनात्मक बदलाव की उम्मीद करते हुए, अमित गोयल का मानना है कि सोने की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में 5,626.80 डॉलर प्रति औंस और भारत में 1,80,779 रुपये प्रति 10 ग्राम पर अपने शिखर पर पहुंच चुकी हैं। डी-डॉलराइजेशन प्रक्रिया में इस तरह के संरचनात्मक बदलाव से वैश्विक केंद्रीय बैंकों द्वारा घबराहट में बिकवाली शुरू हो सकती है, जिससे डिमांड-सप्लाई का असंतुलन पीली धातु के पक्ष में कमजोर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि पहला झटका कागजी सोने की बिकवाली के रूप में आएगा, लेकिन अंततः इसका असर भौतिक सोने की कीमतों पर भी पड़ेगा। भारत में सोने की दरें पहले ही लगभग 15% गिर चुकी हैं और इस विकास के बाद यह गिरावट और गहराने की उम्मीद है।
उनका अनुमान है कि 2027 के अंत तक भारत में सोने की दरें 1 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम से नीचे आ सकती हैं और कॉमेक्स गोल्ड की कीमत 3,000 डॉलर प्रति औंस तक पहुंच सकती है। उन्होंने कहा कि भारत में सोने की दर 2027 के अंत तक 90,000 से 1,00,000 रुपये प्रति 10 ग्राम के आसपास आ सकती है।
हालांकि, यह गिरावट एक बार में नहीं आएगी बल्कि इसमें कई बार 'डेड-कैट बाउंस' (तेजी के दौरान अस्थायी उछाल) देखने को मिलेंगे। इस रिपोर्ट के अनुसार, रूस का एक आंतरिक मेमो दर्शाता है कि व्लादिमीर पुतिन का प्रशासन अमेरिका के साथ आर्थिक साझेदारी के सात क्षेत्रों पर विचार कर रहा है, जिसमें जीवाश्म ईंधन, प्राकृतिक गैस, अपतटीय तेल और महत्वपूर्ण कच्चे माल पर केंद्रित है।







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