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अब इस माध्यम से भी हो सकती है कोविड-19 मामलों की सुनवाई

अब इस माध्यम से भी हो सकती है कोविड-19 मामलों की सुनवाई

कोविड-19 के खिलाफ फौरन कार्रवाई करने के लिये कृत्रिम बौद्धिकता आधारित प्लेटफार्म का सहारा लिया जायेगा। इसके तहत छाती का एक्स-रे करके उसे डॉक्टरों के पास व्हॉट्स-एप्प के जरिये भेज दिया जायेगा। डॉक्टर उसे एक्स-रे मशीन पर देख सकते हैं। इस प्रक्रिया का नाम एक्स-रे सेतु रखा गया है और कम रेजोल्यूशन वाली फोटो को मोबाइल के जरिये भेजा जा सकता है। ग्रामीण इलाकों में कोविड की जांच और कार्रवाई के हवाले से इससे आसानी और तेजी से काम हो सकता है।

भारत के ग्रामीण इलाकों में कोविड ने कहर बरपा कर रखा है, जिसे मद्देनजर रखते हुये, तेज गति से जांच करना, यह जानना कि किस मरीज का किन-किन लोगों से संपर्क हुआ और कंटेनमेंट जोन बनाना बहुत जरूरी हो गया है। कुछ शहरों में कोविड जांच में एक सप्ताह से भी ज्यादा समय लग जाता है, ऐसी स्थिति में ग्रामीण इलाकों में चुनौती बहुत कठिन है। आसान वैकल्पिक जांचों की जरूरत है, क्योंकि आरटी-पीसीआर जांच से भी कभी-कभी कुछ वैरियंट्स के मामले में ‘फाल्स निगेटिव’ रिपोर्ट आ जाती है। इसका मतलब है कि जांच में वैरियंट विशेष का पता नहीं लग पाता।

आर्टपार्क (एआई एंड रोबोटिक टेक्नोलॉजी पार्क) लाभ न कमाने वाली संस्था है, जिसे भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरू ने स्थापित किया है। इसमें भारत सरकार की संस्था विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग का सहयोग है। बेंगलुरू स्थित हेल्थ-टेक स्टार्ट-अप निरामय और भारतीय विज्ञान संस्थान ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के साथ मिलकर एक्स-रे सेतु का विकास किया है। इसे कोविड पॉजीटिव मरीजों की पहचान करने और व्हाट्स-एप्प के जरिये उनकी छाती के एक्स-रे को कम रेजूल्युशन पर डॉक्टर तक भेजने की सुविधा के लिये तैयार किया गया है।

इसमें प्रभावित इलाकों का विश्लेषण और उसे रंगों के जरिये मानचित्र (हीटमैप) द्वारा समीक्षा भी की जायेगी। यह समीक्षा डॉक्टरों के लिये उपलब्ध रहेगी, ताकि वे आसानी से हालात के बारे में जान सकें। इसके जरिये भारत के दूर-दराज इलाकों से 1200 से अधिक रिपोर्ट मिली हैं।

स्वास्थ्य की जांच करने के लिये किसी भी डॉक्टर को सिर्फ www.xraysetu.com पर जाकर ‘ट्राई दी फ्री एक्स-रे सेतु बीटा’ बटन को क्लिक करना है। उसके बाद यह प्लेटफार्म उन्हें सीधे दूसरे पेज पर ले जायेगा, जहां उक्त डॉक्टर वेब या स्मार्टफोन एप्लीकेशन के जरिये व्हॉट्स-एप्प आधारित चैट-बॉट से जुड़ जायेंगे।इसके अलावा डॉक्टर लोग एक्स-रे सेतु सेवा शुरू करने के लिये +91 8046163838 पर व्हॉट्स-एप्प संदेश भेज सकते हैं। उन्हें बस मरीज के एक्स-रे इमेज को क्लिक करना है और चंद मिनटों में ही सम्बंधित तस्वीरें और निदान की पूरी व्याख्या वाले दो पेज निकल आयेंगे। कोविड-19 का किसी विशेष स्थान पर ज्यादा प्रभाव डालने की संभावना को ध्यान में रखते हुये, रिपोर्ट में डॉक्टरों की सुविधा के लिये हीट-मैप का भी उल्लेख रहेगा।

इंग्लैंड के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ ने 1,25,000 से अधिक एक्स-रे तस्वीरों को इस प्रक्रिया से जांचा है। इसी तरह एक्स-रे सेतु से एक हजार से अधिक भारतीय कोविड मरीजों की जानकारी हासिल की गई है। इस प्रक्रिया के शानदार नतीजे निकले हैं। आंकड़ों की संवेदनशीलता 98.86 प्रतिशत और सटीकता 74.74 प्रतिशत है।

आर्टपार्क के संस्थापक और सीईओ श्री उमाकांत सोनी का कहना है, “हमें 1.36 अरब लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुये प्रौद्योगिकी का विकास करना है। उल्लेखनीय है कि इस समय हमारे यहां एक लाख लोगों पर एक रेडियोलॉजिस्ट है। उद्योग और अकादमिक जगत के सहयोग से एक्स-रे सेतु ने कृत्रिम बौद्धिकता जैसी शानदार प्रौद्योगिकी के बल पर आगे बढ़कर बेहतरीन स्वास्थ प्रौद्योगिकी संभव की है, जो ग्रामीण इलाकों के लिये है और बहुत सस्ती है।”

निरामय की संस्थापक और सीईओ डॉ. गीता मंजुनाथ ने कहा, “निरामय ने आर्टपार्क और आईआईएससी के साथ सहयोग किया है, ताकि एक्स-रे मशीन तक पहुंच रखने वाले ग्रामीण क्षेत्रों में सेवारत डॉक्टरों को कोविड की तेज जांच और उसके उपचार की सुविधा मिल सके। एक्स-रे सेतु में छाती के एक्स-रे का मूल्यांकन अपने-आप होता है और उससे पता चल जाता है कि आगे मरीज को फेफड़े की कोई समस्या होने वाली है या नहीं। इससे कोविड-19 के संक्रमण का पता लग जाता है।”

आईआईएससी के प्रो. चिरंजीब भट्टाचार्य ने कहा, “कोविड पॉजीटिव एक्स-रे इमेज का अभाव होने के कारण हमने एक अनोखी ट्रांस्फर लर्निंग खाका तैयार किया है, जो आसानी से फेफड़ों का एक्स-रे उपलब्ध करा देता है। यह सिर्फ कोविड पॉजीटिव ही नहीं बताता, बल्कि आगे की संभावित जटिलताओं का संकेत भी देता है। हमने संक्रमित फेफड़ों के लिये भी प्रक्रिया का विकास किया है। इस प्रणाली में आगे के लिये संकेत, संक्रमित हिस्सों की भी जानकारी मिलती है।”

कोविड-19 प्लेटफार्म के अलावा इस प्लेटफार्म से फेफड़े सम्बंधी 14 अन्य बीमारियों का भी पता लगाया जा सकता है, जैसे टीबी, न्यूमोनिया आदि। इसका इस्तेमाल एनालॉग और डिजिटल एक्स-रे, दोनों रूपों में किया जा सकता है। पिछले 10 महीनों के दौरान ग्रामीण इलाकों में कार्यरत 300 से अधिक डॉक्टरों ने इसका सफल प्रयोग किया है।

एक्स-रे सेतु जैसी प्रौद्योगिकियों से बेहतरीन बौद्धिक कृत्रिमता आधारित प्रणालियों को मोबाइल के जरिये चलाया जा सकता है। इसके कारण बहुत सस्ती दर पर ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं को सुगम्य बनाया जा सकता है।

केएमसी, मंगलोर के हृदयरोग विभाग के अध्यक्ष व प्रोफेसर डॉ. पद्मनाभ कामथ ने एक्स-रे सेतु के इस्तेमाल की सलाह दी थी। वे खुद भी इसका इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने कहा कि इन प्रौद्योगिकियों से वंचित और ग्रामीण इलाके के लोगों को स्वास्थ्य सुविधायें प्राप्त होंगी। डॉ. अनिल कुमार, एडी, चिकित्सा अधिकारी, शिमोगा, कर्नाटक ने भी इस प्लेटफार्म का इस्तेमाल किया है। वे इस प्रौद्योगिकी से बहुत संतुष्ट हैं और उनका कहना है कि इससे मरीज का जल्द निदान हो जाता है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. आशुतोष शर्मा ने कहा, “डीएसटी कई साइबर-फिजीकल प्रणालियों पर काम कर रहा है, जिसमें कृत्रिम बौद्धिकता, वर्चुअल वास्तविकता, डाटा विश्लेषण, रोबोटिक्स, सेंसर्स और अन्य प्रणालियां शामिल हैं, जो स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियों का हल निकालने में सक्षम हैं। इसमें निदान, औषधि से बायो-मेडिकल उपकरण और टेलीमेडीसिन तक शामिल हैं।”

आर्टपार्क को नेशनल मिशन ऑन इंटरडिसीप्लिनेरी साइबर-फिजीकल सिस्टम्स (एनएम-आईसीपीएस) के तहत शुरू किया गया था और अब उसे सी-डैक जैसी संस्था से सहयोग मिल रहा है। इसमें कृत्रिम बौद्धिकता वाला सुपरकंप्यूटर परमसिद्धि, एनवीडिया और एडब्लूएस शामिल हैं। यह ग्रामीण भारत में डॉक्टरों को निशुल्क सेवा प्रदान करेगा।

अन्य विवरण के लिये श्री उमाकांत सोनी, संस्थापक और सीईओ, आर्टपार्क से umakant@artpark.in. से संपर्क किया जा सकता है।

 

World Bicycle Day 2021: रोजाना 30 मिनट जरूर करें साइकिलिंग, शरीर को मिलेंगे ये बेमिसाल फायदे

World Bicycle Day 2021: रोजाना 30 मिनट जरूर करें साइकिलिंग, शरीर को मिलेंगे ये बेमिसाल फायदे

World Bicycle Day 2021: 3 जून को अंतर्राष्ट्रीय विश्व साइकिल दिवस (World Bicycle Day 2021) मनाया जाता है. साइकिल की विशेषता और बहुमुखी प्रतिभा को पहचानने के लिए यह दिन मनाया जाता है. कहा गया है कि शहरवासी अपने आसपास की दूरी तय करने के लिए साइकिल का इस्तेमाल करें, तो इससे प्रतिदिन सैकड़ों लीटर पेट्रोल की खपत कम होगी. वहीं शहर का प्रदूषण स्तर भी कम होगा. साथ ही जो लोग साइकिल चलाते हैं, उनका मानना है कि इससे सोशल डिस्टेंसिंग का पालन भी होता है और सुरक्षित रहते हैं. संयुक्त राष्ट्र द्वारा पहला आधिकारिक विश्व साइकिल दिवस 3 जून, 2018 को मनाया गया था.
साइकिल चलाने से हृदय रोग, स्ट्रोक, कैंसर, तथा मधुमेह जैसे रोगों के मृत्यु के जोखिम को कम करने में सहायता मिलती है. डॉक्टर्स का मानना है कि रोजाना 30 मिनट तक साइकिल (Cycle Chalane Ke Fayde) चलाना सेहत के लिए काफी फायदेमंद होता है. आइए जानते हैं इसके फायदों के बारे में-
साइकिल चलाने के फायदे-
अच्छी नींद- रोजाना 30 मिनट साइकिल चलाने से रात में अच्छी नींद आती है. अगर आपको रात में नींद न आने की समस्या है तो साइकिलिंग करने से आपकी ये परेशानी हल हो सकती है.
तेज होता है दिमाग- एक रिसर्च के अनुसार जो इंसान रोजाना 30 मिनट साइकिल चलाता है उसका दिमाग साधारण इंसान के मुकाबले ज्यादा एक्टिव रहता है और ब्रेन पावर बढने के चांसेज भी 15 से 20 प्रतिशत तक बढते है.
ठीक होता है इम्यून सिस्टम- साइकिल चलाने से इम्यून सिस्टम ठीक तरीके से काम करता है. एक रिपोर्ट के अनुसार प्रतिदिन आधा घंटा साइकिल चलाने से इम्यून सेल्स एक्टिव हो जाते हैं और बीमार होने का खतरा कम हो जाता है.
बर्न होती हैं कैलोरीज- साइकिलिंग करना एक्स्ट्रा कैलोरी को बर्न करने में मदद करता है. साइकिलिंग करके एक्स्ट्रा कैलोरी को बहुत ही आसानी से बर्न किया जा सकता है.

 

 सावधान! मैगी बनाने वाली कंपनी नेस्ले ने खुद स्वीकारा, 60 प्रतिशत प्रोडक्ट सेहतमंद नहीं

सावधान! मैगी बनाने वाली कंपनी नेस्ले ने खुद स्वीकारा, 60 प्रतिशत प्रोडक्ट सेहतमंद नहीं

नई दिल्ली। मैगी नूडल्स, किटकैट्स और नेस्कैफे बनाने वाली नेस्ले ने स्वीकारा है कि उसके 70प्रतिशत से अधिक फूड प्रोडक्टस सेहतमंद नहीं है। इसका मतलब यह है कि जिस मैगी को आप खा रहे है वो आपके सेहत के लिए अच्छा नहीं हो सकता है। दुनिया की सबसे बड़ी खाद्य कंपनी ने यह भी स्वीकार किया कि उसके कुछ प्रोडक्ट कभी भी स्वस्थ नहीं होंगे चाहे हम कितना भी नवीनीकरण करें। कंपनी ने अपनी एक रिपोर्ट जारी कर यह बताया है कि वह अपने प्रोडक्टस में न्यूट्रिशन वैल्यू की जांच में जुट गए है और साथ ही इसकी रणनिति पर भी काम कर रहे है। प्रोडक्ट सेहतमंद और टेस्टी हो इसपर पूरा काम किया जा रहा है।

कॉफी है सेहतमंद! 
2021 की शुरुआत में किए गए एक सर्वे पर यह रिपोर्ट आधारित है। रिपोर्ट के अनुसार, नेस्ले के केवल 37 प्रतिशत उत्पादों ने ऑस्ट्रेलिया के स्वास्थ्य स्टार रेटिंग सिस्टम के तहत 3.5 या उससे अधिक की रेटिंग हासिल की है। कंपनी ने 3.5-स्टार रेटिंग को स्वास्थ्य की मान्यता प्राप्त परिभाषा माना। सिस्टम 5 स्टार के पैमाने पर खाद्य पदार्थों को रेट करता है और अंतरराष्ट्रीय समूहों द्वारा बेंचमार्क के रूप में उपयोग किया जाता है। कंपनी के खाद्य और पेय पोर्टफोलियो में से 70प्रतिशत उत्पाद शुद्ध कॉफी को छोड़कर 90त्न पेय पदार्थों के साथ कटौती करने में विफल रहे। हालांकि, पानी और डेयरी उत्पादों ने 82 फीसदी पानी और 60 फीसदी डेयरी के साथ बेहतर प्रदर्शन किया। हमने अपने उत्पादों में महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। लेकिन हमारा पोर्टफोलियो अभी भी स्वास्थ्य की कैटगरी खराब है। स्विस कंपनी ने एक बयान में कहा कि वह अपनी पोषण और स्वास्थ्य रणनीति को अपडेट करने के लिए एक कंपनी-व्यापी परियोजना पर काम कर रही है और यह सुनिश्चित करने के लिए अपने पूरे पोर्टफोलियो को देख रही है कि उसके उत्पादों ने लोगों की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मदद की। 
DRDO ने 2डीजी को लेकर जारी किया नया प्रोटोकॉल, कहा- डॉक्टरों की सलाह और देखरेख में ही लें दवा

DRDO ने 2डीजी को लेकर जारी किया नया प्रोटोकॉल, कहा- डॉक्टरों की सलाह और देखरेख में ही लें दवा

नई दिल्ली, एंटी कोविड मेडिसिन, 2डीजी को लेकर डीआरडीओ ने नया प्रोटोकॉल जारी किया है. डीआरडीओ ने कहा है कि 2डीजी दवा को डॉक्टरों की सलाह और देखरेख में ही लें. डीआरडीओ के मुताबिक, डायबिटीज, हार्ट से जुड़ी बीमारी इत्यादि वाले मरीजों पर इस दवाई की स्टडी नहीं हुई है. इसलिए इन बीमारियों से जुड़े मरीजों को बेहद सावधानी से 2डीजी देनी है. इसके अलावा गर्भवती और बच्चों को स्तनपान कराने वाली महिलाओं और 18 साल से कम उम्र वाले मरीजों को 2डीजी दवाई नहीं देनी है.


कब से होगी उपलब्ध


कोरोना महामारी के बीच डॉक्टर रेड्डीज़ लैब ने हाल ही में घोषणा की है कि एंटी-कोविड मेडिसन, 2डीजी का कॉमर्शियल-लॉन्च जून के महीने के मध्य से शुरू होने की संभावना है. लैब के मुताबिक, तब तक 2डीजी दवा का असल रेट भी सामने आ जाएग और देश के प्रमुख सरकारी और प्राईवेट हॉस्पिटल्स में ये दवा मिलनी शुरू हो जाएगी. आपको बता दें कि अभी तक ये दवा दिल्ली स्थित एम्स अस्पताल और डीआरडीओ के कोविड हॉस्पिट्ल्स में ही उपलब्ध है.


हैदाराबाद स्थित डॉक्टर रेड्डीज़ लैब ने हाल ही में सवालों पर जवाब देते हुए अपना बयान दिया था और कंपनी की एक प्रेजेंटेशन-प्लेट भी साझा की थी. जिसपर साफ तौर से लिखा है कि जून महीने के मध्य से ये दवा सरकारी और प्राईवेट अस्पताल में मिलनी शुरू हो जाएगी. इसके अलावा कंपनी के मुताबिक, दवा का रेट भी तय किया जा रहा है, ताकि ज्यादा से ज्यादा मरीजों को ये आसानी से उपलब्ध हो सके.


आपको बता दें 8 मई को देश के प्रमुख रक्षा संस्थान, डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाईजेशन (डीआरडीओ) ने एंटी-कोविड मेडिसन, 2डीजी बनाने का दावा किया था. दिल्ली स्थित डीआरडीओ की इंस्टीट्यूट ऑफ न्युक्लिर मेडिसन एंड एलाइड साईंसेज़ (इनामस) लैब ने रेड्डीज़ लैब के साथ मिलकर ये 2-डियोक्सी-डी-ग्लूकोज़ यानि 2डीजी दवाई तैयार की है. डीआरडीओ के मुताबिक, ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) ने 2डीजी के इमरजेंसी इस्तेमाल की इजाजत दे दी है. इसके बाद 17 मई को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्द्धन ने इस दवा का पहला बैच एम्स और सेना द्वारा संचालित कोविड अस्पतालों के लिए रिलीज कर दिया था. पहले बैच में करीब 10 हजार सैशे जारी किए गए हैं. जून के महीने से हर हफ्ते, कंपनी करीब एक लाख सैशे तैयार करेगी.


ग्लूकोज़ के एनेलोग पहली ये 2डीजी दवा सैशे के रूप में सामने आई है और पानी मे घोलकर मरीज को पिलाई जाती है. डीआरडीओ का दावा है कि इस दवा के सेवन से मरीज को 40 प्रतिशत कम ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है और वो कोरोना से छुटकारा पा सकता है. 

यहां पढ़े,  कोविड-19 से जुड़ी नवीनतम जानकारी

यहां पढ़े, कोविड-19 से जुड़ी नवीनतम जानकारी

भारत में 1.27 लाख मामलों के साथ पिछले 54 दिनों में दैनिक नये मामले अपने सबसे निचले स्तर पर;नये मामलों के घटने का चलन बरकरार। सक्रिय मामले और घटकर 18,95,520 हुए; 43 दिनों के बाद 20 लाख से कम। पिछले 24 घंटे में सक्रिय मामलों में 1,30,572 की कमी आयी। देश में अब तक कुल 2,59,47,629 लोग कोविड-19 से स्वस्थ हुए। पिछले 24 घंटे में बीमारी से 2,55,287 लोग स्वस्थ हुए। लगातार 19वें दिन बीमारी से स्वस्थ होने वाले लोगों की संख्या दैनिक नये मामलों की संख्या से ज्यादा।

रिकवरी रेट का बढ़ना जारी, आज यह 92.09 प्रतिशत।

साप्ताहिक पॉजिटिविटी रेट इस समय 8.64 प्रतिशत।

दैनिक पॉजिटिविटी रेट गिरकर 6.62 प्रतिशत हुआ, लगातार आठवें दिन 10 प्रतिशत से कम।

जांच की क्षमता में काफी वृद्धि – अब तक कुल 34.67 करोड़ जांच की गयी।

राष्ट्रव्यापी टीकाकरण अभियान के तहत अब तक लोगों को टीके की 21.6 करोड़ खुराक दी गयीं। 

कोरोना के बाद ब्लैक फंगस का कहर 26 राज्यों में 20 हजार मरीज उपचाराधीन

कोरोना के बाद ब्लैक फंगस का कहर 26 राज्यों में 20 हजार मरीज उपचाराधीन

नई दिल्ली, कोरोना महामारी के साथ देश के 26 राज्यों में ब्लैक फंगस की भी दस्तक हो चुकी है। ब्लैक फंगस के मरीजों के इलाज के लिए केंद्र सरकार ने एम्फोटेरिसिन-बी इंजेक्शन की 30,100 वॉयल आवंटित की है। हालांकि ये वॉयल के कुल मांग का दस फीसदी भी नहीं है।
केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा ने बताया कि सोमवार को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कुल 30,100 एम्फोटेरिसिन इंजेक्शन की एक खेप दी गई है। देश में अभी करीब 20 हजार मरीज उपचाराधीन हैं जिनके लिए हर दिन 30 हजार वॉयल चाहिए। एक दिन में दो बार यह इंजेक्शन दिया जाता है और करीब छह सप्ताह तक ज्यादातर मामलों में देना पड़ता है। केंद्रीय मंत्री ने बताया कि अंडमान निकोबार, अरुणाचल प्रदेश, दादरा नागर हवेली, लद्दाख, लक्षद्वीप, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम,सिक्किम और नगालैंड को छोड़कर बाकी सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फंगस के मरीज अस्पतालों में भर्ती हैं। देश में अभी एक लाख इंजेक्शन की उत्पादन क्षमता है।

सात राज्यों में सबसे अधिक मरीज
स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि महाराष्ट्र, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा फंगस के रोगी उपचाराधीन हैं। इसीलिए यहां सबसे अधिक दवा आवंटित की गई है। इसके अलावा केंद्र सरकार के अस्पतालों में भी काफी मरीजों का उपचार चल रहा है। इसीलिए सरकार ने इन अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए 1260 वॉयल आवंटित किए हैं।

सोशल मीडिया पर छलका डॉक्टरों का दर्द
ब्लैक फंगस से तड़पते मरीजों को समय पर दवा और इंजेक्शन न मिलने से डॉक्टरों की भी हिम्मत जवाब देने लगी है। बेंगलूरू के मणिपाल अस्पताल के डॉ. रघुरात हेगड़े ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि ब्लैक फंगस से तड़पते मरीजों की जान बचाने के लिए ऑपरेशन कर रहे हैं लेकिन इसके बावजूद जान नहीं बचा पा रहे हैं। उन्होंने लिखा है कि वे अब तक कई मरीजों की आंख निकाल चुके हैं।

समय पर दवा मिलना मुश्किल हो रहा
डॉ. रघुराजन का कहना है कि कुछ मरीजों में फंगस पहले ही काफी फैल चुका होता है। इसका कारण ऐसे मरीजों की जान मुश्किल में पड़ जाती है। कुछ मरीज ऐसे भी हैं जो शुरुआती लक्षण के साथ अस्पताल में भर्ती होते हैं लेकिन समय पर इंजेक्शन और दूसरी दवाएं न मिलने के कारण उनकी भी जान मुश्किल में पड़ रही है। यही कारण है कि फंगस के कारण देश में मृत्यु दर लगातार बढ़ रही है।

इंदौर: कई मरीजों के दिमाग में मिला ब्लैक फंगस
ब्लैक फंगस से पीड़ित मरीजों में संक्रमण उनके दिमाग में पहुंच रहा है। मध्यप्रदेश में इंदौर के महाराजा यशवंत राव अस्पताल में भर्ती ब्लैक फंगस से पीड़ित मरीजों में 15 फ़ीसदी के दिमाग में संक्रमण पहुंच चुका है। एमवाईएच के न्यूरोसर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ राकेश गुप्ता ने सोमवार को बताया कि अस्पताल में भर्ती ब्लैक फंगस के 368 मरीजों में से 55 के दिमाग में संक्रमण पहुंच चुका है।
सीटी, एमआरआई स्कैन के जरिए इसकी पुष्टि हुई। ज्यादातर मरीजों में छोटे आकार का संक्रमण मिला, जबकि 4 लोगों में संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए दिमाग की सर्जरी करनी पड़ी। उन्होंने कहा कि अस्पताल में भर्ती होने से पहले मरीजों में साइनस से संक्रमण उनके दिमाग पर पहुंच गया था।

राज्यों के पास अभी भी 1.75 करोड़ खुराक
कोरोना महामारी से निपटने के लिए सरकार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अबतक 23 करोड़ से ज्यादा टीके उपलब्ध करा चुकी है। मंत्रालय के मुताबिक इनमें से 21,22,38,652 खुराक का इस्तेमाल किया गया। सरकार ने साफ किया कि राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पास अभी 1,75,48,648 खुराक मौजूद हैं। अगले तीन दिनों के भीतर राज्यों को 2,73,970 खुराक उपलब्ध हो जाएगी।
 

कोरोना काल में मजबूत इम्यूनिटी के लिए इन चीजों का सेवन कर दें शुरू, ब्लैक फंगस से भी होगा बचाव

कोरोना काल में मजबूत इम्यूनिटी के लिए इन चीजों का सेवन कर दें शुरू, ब्लैक फंगस से भी होगा बचाव

कोरोना संक्रमण के बाद अब फंगल संक्रमण (ब्लैक फंगस) का खतरा लोगों पर मंडरा रहा है. ब्लैक फंगस और व्हाइट फंगस के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. लेकिन हमारी मजबूत इम्यूनिटी इन दोनों खतरों से हमारी रक्षा कर सकती है. इसके लिए जरूरी है कि हम उन चीजों का सेवन कर जो हमारी इम्यूनिटी को बेहतर बनाए. हमारे शरीर को इम्यूनिटी देने में विटामिन सी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है. इसलिए हमें उन फूड्स का सेवन करना चाहिए, जिनमें विटामिन सी ज्यादा होता है.


संतरा
एक मध्यम आकार के संतरे (100 ग्राम) में विटामिन सी की मात्रा 53.2 मिलीग्राम के करीब होती है. साइट्रिक युक्त फलों में एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं जो कि हमारी इम्यूनिटी को मजबूत करते हैं.


अनानास
रोजाना अनानास का सेवन करने से वायरल और बैक्टीरियल दोनों संक्रमणों का खतरा कम हो सकता है क्योंकि इसमें विटामिन सी और मैंगनीज प्रचुर मात्रा में होते हैं. अनानास में कैलोरी कम होती है. इसे डाइट्री फाइबर और ब्रोमलेन भी होते हैं.


शिमला मिर्च
शिमला मिर्च भी विटामिन सी का अच्छा स्रोत है. इसमें बीटा कैरोटीन भी प्रचुर मात्रा में होता है. शिमला मिर्च खनिज और विटामिन भी होते हैं जो कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करते हैं. यह प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करने वाले ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को भी कम करती है.


आंवला
आंवले में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. विटामिन सी एक शक्तिशाली एंटीऑक्सिडेंट के रूप में कार्य करता है जो कि तंत्रिका तंत्र, प्रतिरक्षा प्रणाली और त्वचा के लिए बेहद फायदेमंद माना जाता है. आंवले का सेवन मेटाबॉलिज्म को ठीक रखने, हड्डियों के बनने, प्रजनन और प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को बढ़ावा देने में भी मददगार है.


नींबू

नींबू विटामिन सी और एंटीऑक्सिडेंट का अच्छा स्रोत है. इनके अलावा भी इनमें बहुत से और पोषक तत्व होते हैं जैसे- थियामिन, राइबोफ्लेविन, विटामिन बी-6, पैंटोथेनिक एसिड, कॉपर और मैंगनीज. नींबू में मौजूद एंटीऑक्सिडेंट शरीर से फ्री रेडिकल्स को हटाने में सहायक हैं जो कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाकर संक्रमण का कारण बन सकती हैं.


Disclaimer: इस आर्टिकल में बताई विधि, तरीक़ों व दावों की just36news पुष्टि नहीं करता है. इनको केवल सुझाव के रूप में लें. इस तरह के किसी भी उपचार/दवा/डाइट पर अमल करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें.

 

दुर्गा महाविद्यालय द्वारा “लेट्स टॉक पीरियड” विषय पर हुआ वेबिनार

दुर्गा महाविद्यालय द्वारा “लेट्स टॉक पीरियड” विषय पर हुआ वेबिनार

रायपुर, माहवारी स्वच्छता दिवस के उपलक्ष में एनएसएस दुर्गा महाविद्यालय द्वारा विगत दिनों में वेबीनार का आयोजन किया गया जिसमें डॉक्टर प्रमिला शर्मा द्वारा सेनेटरी पैड यूज करने के लिए जागरूक किया गया डॉ शर्मा गांव में निशुल्क वितरित करती हैं एवं यूट्रस इंफेक्शन अवेयरनेस पर जागरूकता कार्यक्रम करती हैं आप ने बताया कि किस तरह माहवारी के दिनों में हमें स्वच्छता रखनी चाहिए कार्यक्रम का संचालक सुनीता चंसोरिया ने बताया कि हमारे द्वारा प्रत्येक वर्ष माहवारी दिवस मनाया जाता हैं जिसमें विद्यार्थी अपने आसपास के स्लम एरिया में जाकर जागरूकता अभियान चलाते हैं, यूनिसेफ के साथ मिलकर लेट्स टॉक पीरियड के अंतर्गत यह कार्यक्रम दुर्गा महाविद्यालय द्वारा आयोजित किया जाता है 

 लू में क्या करें और क्या ना करें

लू में क्या करें और क्या ना करें

बेमेतरा। ग्रीष्म ऋतु के आगमन के साथ ही लू का प्रकोप भी बढऩे लगा है। इस बीच कोविड-19 के संक्रमण से बचाव के लिए लॉकडाउन से विरानी छायी हुई है। एक ओर कोविड-19 का संक्रमण तो दूसरी ओर लू का प्रकोप, ऐसे में शासन की ओर से लोगों को लू से बचने आवश्यक सुझाव दिये गये हैं। प्रशासन की ओर से आमलोगों से इसके बेहतर ढंग की पालन की अपेक्षा की गई है।
क्या करें-घर पर रहे और रेडियो सुनें टीवी देखें, स्थानीय मौसम और कोविड-19 की स्थिति पर अद्यतन परामर्श के लिए समाचार पत्र पढ़ें। जितना हो सके पर्याप्त पानी पिएं, भले ही प्यास न लगी हो। मिर्गी, हृदय, गुर्दे या लीवर से संभावित रोग वाले जो तरल प्रतिबंदित आहार लेते हो तरल पदार्थ लेने से पहले डॉक्टर से परामर्श ले, हल्के, हल्के रंग के, ढीले सूती कपड़े पहनें, ओआरएस (ओरल रिहाइड्रेशन) घोल, घर का बना पेय लस्सी. (तोरानी चावल) का पानी, नींबू का पानी, छाछ आदि का उपयोग करें। बाहर जाने से बचें, यदि बाहर जाना आवश्यक है, तो अपने सिर (कपड़े,टोपी या छाता) और चेहरे को कवर करें। जहां तक संभव हो किसी भी सतह को छूने से बचें। अन्य व्यक्तियों से कम से कम 1 मीटर की दूरी पर शारीरिक दूरी बनाए रखें। साबुन और पानी से बार-बार और ठीक से हाथ धोएं। साबुन और पानी उपलब्ध न हो तो हैंड सैनिटाइजर का उपयोग करें। घर के प्रत्येक सदस्य के लिए अलग-अलग तौलिये रखो। इन तौलियों को नियमित रूप से धोएं।
अन्य सावधानियां
जितना हो सके घर के अंदर रहें, अपने घर को ठंडा रखें, धूप से बचाव के लिए रात में पर्दे, शटर का उपयोग करें और खिड़कियां खोलें। निचली मंजिलों पर बने रहने का प्रयास करें। पंखो का उपयोग करें, कपड़ों को नम करें और अधिक गर्मी में ठंडे पानी में ही स्नान करें। यदि आप बीमार महसूस करते हैं - उच्च बुखार, लगातार सिरदर्द, चक्कर आना, मितली या भटकाव, लगातार खांसी, सांस की तकलीफ है, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाये। जानवरों को छाया में रखें और उन्हें पीने के लिए भरपूर पानी दें।
क्या ना करें
लॉकडाउन के दौरान बाहर न जाएं। यदि आपको आवश्यक कार्य के लिए बाहर जाना है, तो दिन के शीतलन घंटों के दौरान अपनी सारणी निर्धारित करने का प्रयास करें। अत्यधिक गर्मी के घंटों के दौरान बाहर जाने से बचें, विशेष रूप से दोपहर 12 बजे से 3 बजे के बीच। नंगे पैर या बिना चेहरे को ढके और बिना सिर ढककर बाहर न जाएं। व्यस्थतम समय (दोपहर) के दौरान खाना पकाने से बचें। खाना पकाने वाले क्षेत्रों (रसोई घरों) में दरवाजे और खिड़कियां खोल कर रखें, जिससे पर्याप्त रूप से हवा आ सके। शराब, चाय, कॉफी और कार्बोनेटेड पेय, पीने से बचें जो शरीर को निर्जलित करते हैं। उच्च प्रोटीन, मसालेदार और तैलीय भोजन खाने से बचें, बासी खाना न खाएं। बिना हाथ धोए अपनी आंखों, नाक और मुंह को न छुएं। जो लोग बीमार हैं उनके साथ नजदीकी संपर्क से बचें। बीमार होने पर बाहर धूप में न जाएं, घर पर रहें।
नियोक्ता और श्रमिक क्या करें
कार्यस्थल पर स्वच्छ और ठंडा पेयजल प्रदान करें। श्रमिकों को सीधे धूप से बचने के लिए सावधानी बरतें। यदि उन्हें खुले में काम करना पड़ता है। जैसे कि (कृषि मजदूर, मनरेगा मजदूर, आदि) तो सुनिश्चित करें कि वे हर समय अपना सिर और चेहरा ढके रहें। दिन के समय निर्धारित समय सारणी निश्चित करे। खुले में काम करने के लिए विश्राम की अवधि और सीमा बढ़ाएं। गर्भवती महिलाओं या कामगारों की चिकित्सीय स्थिति पर विशेष ध्यान दें। सभी कार्यकर्ता चेहरे को ढककर रखे, एक-दूसरों से 1 से 1.5 मीटर की शारीरिक दूरी बनाए रखें और हाथ की सफाई का अभ्यास करवाए। बार-बार हाथ धोने के लिए साबुन और पानी दें। अपने हाथों को धोए बिना चेहरे को छूने से पहले सावधानी बरतने के निर्देश दें। दोपहर, रात के खाने के समय इस तरह से प्रावधान करें कि दो व्यक्तियों के बीच 1 से 1.5 मीटर की दूरी हो। स्वच्छता कर्मचारियों को अपने हाथों को ढंकना चाहिए। मास्क और दस्ताने पहनना चाहिए। दस्ताने पहनने के बाद मास्क को नहीं छूना चाहिए। उन्हें अपने हाथों को अच्छी तरह और बार-बार धोना चाहिए। हमेशा सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करें। यदि कोई बीमार है, तो उसे ड्यूटी पर्यवेक्षक को सूचित किया जाना चाहिए।
क्या ना करें
कार्यस्थल पर, धूम्रपान या तंबाकू न ही थूके और न ही चबाएं। एक-दूसरे से हाथ न मिलाएं या एक-दूसरों को गले न लगाएं। अपने चेहरे को विशेष रूप से आंखों, नाक और मुंह को न छुएं। जो लोग बीमार हैं उनके निकट संपर्क से बचें। बीमार होने पर काम पर न जाएं रू घर पर ही रहें।
पुलिस/यातायात पुलिस कार्मिक
दिन में ड्यूटी पर रहते हुए ठंड वाली जैकेट पहनें। अपने से कुछ दूरी पर लोगों/वाहनों को रोकें। आपके द्वारा जांचे जा रहे दस्तावेजों को न छुएं। जहां तक संभव हो किसी भी सतह को छूने से बचें। जहां तक संभव हो, अपना हाथ नियमित और अच्छी तरह से धोएं। यदि साबुन, पानी आसानी से उपलब्ध नहीं है तो हैंड सैनिटाइजर का उपयोग करें। अपने चेहरे को अनचाहे हाथों से न छुएं। हर समय फेस मास्क पहनें। उन्हें समय-समय पर बदलें और उपयोग किए गए मास्क को सुरक्षित रूप से फेकें। पर्याप्त पानी पीएं, जितनी बार संभव हो पानी पीएं, भले ही प्यास न लगी हो।
सुरक्षात्मक साधनों का उपयोग करें
छाया में रहने का प्रयास करे, धूप का चश्मा और सनस्क्रीन का प्रयोग करें। जहां तक संभव हो युवा कर्मियों को दिन में यातायात ड्यूटी पर रखा जाना चाहिए। जब आप काम के बाद घर जाते हैं, तो स्नान करें और अपने इस्तेमाल किए कपड़ों को अच्छी तरह से धोएं।
वरिष्ठ नागरिक
जितना हो सके घर के अंदर रहें। पार्क, बाजारों और धार्मिक स्थानों जैसे भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर न जाएँ। अपने घर को ठंडा रखें, पर्दे और पंखे या कूलर का उपयोग करें। नियमित रूप से हाथ धोने से, खासकर भोजन करने से पहले स्वच्छता बनाए रखें। यदि आप बीमार महसूस करते हैं और निम्न में से किसी एक का अनुभव करते हैं, तो तुरंत डॉक्टर को बुलाएं - उच्च शरीर का तापमान, शरीर में दर्द लगे। सिरदर्द, चक्कर आना, मतली या भटकाव लगना। सांस की तकलीफ होना। असामान्य रूप से भूख लगना। यदि आप एक वरिष्ठ नागरिक की देखरेख कर रहे है- नियमित रूप से हाथ धोने में उनकी मदद करें। समय पर भोजन और पानी का सेवन सुनिश्चित करें। उनके पास जाते समय अपनी नाक और मुंह ढकने के लिए फेस कवर का इस्तेमाल करे। यदि आप बुखार, खांसी, सांस लेने जैसे चीजों से पीडि़त हैं, तो आपको वरिष्ठ नागरिक के पास नहीं जाना चाहिए। उस दौरान किसी और को उनके पास जाने के लिए कहे वो भी पूरी सावधानी के साथ।
 

नमक पानी के गरारे से आरटी-पीसीआर जांच, राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसन्धान संस्थान ने जाँच के तरीको में बताया कि यह विधि...

नमक पानी के गरारे से आरटी-पीसीआर जांच, राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसन्धान संस्थान ने जाँच के तरीको में बताया कि यह विधि...

वैश्विक महामारी कोविड-19 का प्रकोप शुरू होने के बाद से ही भारत अपने यहाँ इसकी जांच (परीक्षण) के बुनियादी ढांचे और क्षमता को बढ़ाने के लिए कई कदम उठा रहा है। वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के तहत नागपुर स्थित राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (एनईईआरआई) के वैज्ञानिकों ने इस कड़ी में एक और कीर्तिमान बना लिया है जिसके अंतर्गत जिसमें कोविड​​​​-19 के नमूनों के परीक्षण के लिए 'नमक के पानी से गरारे (सलाइन गार्गल) आरटी-पीसीआर विधि' ढूंढ ली गयी हैI नमक के पानी से गगारे (सेलाइन गार्गल) की इस विधि से कई प्रकार के लाभ एक साथ मिलते हैंI यह विधि सरल, तेज, लागत प्रभावी, रोगी के अनुकूल और आरामदायक है और इससे परिणाम भी जल्दी मिलते हैंI न्यूनतम बुनियादी ढांचा आवश्यकताओं को देखते हुए यह विधि ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है। पत्र सूचना कार्यालय से बातचीत में राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसन्धान संस्थान (एनईईआरआई) में पर्यावरण विषाणु विज्ञान प्रकोष्ठ के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. कृष्णा खैरनार ने कहा कि : “स्वैब संग्रह विधि के लिए समय की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, चूंकि इस तकनीक में सम्भावित संक्रमितों जांच के दौरान कुछ असुविधा का सामना भी करना पढ़ सकता है जिससे वे कभी-कभी असहज भी हो सकते। साथ ही इस प्रकार से एकत्र किए गए नमूनों को एकत्रीकरण केंद्र और जांच केंद्र तक ले जाने में भी कुछ समय लगता है। वहीं दूसरी ओर, नमक के पानी से गरारे (सेलाइन गार्गल) की आरटी-पीसीआर विधि तत्काल, आरामदायक और रोगी के अनुकूल है। नमूना तुरंत ले लिया जाता है और तीन घंटे में ही परिणाम मिल जाएगा।” डॉ. खैरनार के अनुसार यह विधि गैर-आक्रामक और इतनी सरल है कि रोगी स्वयं नमूना एकत्र कर सकता है। उन्होंने कहा कि, "नाक से और मुंह से नासोफेरींजल और ऑरोफरीन्जियल स्वैब एकत्र करने जैसी संग्रह विधियों के लिए तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है और इनमें समय भी लगता है। इसके विपरीत, नमक के पानी से गरारे (सेलाइन गार्गल) की आरटी-पीसीआर विधि में नमक के पानी (सेलाइन वाटर) से भरी एक साधारण संग्रह ट्यूब का उपयोग किया जाता है। रोगी इस घोल से गरारे करता है और उसे ट्यूब के अंदर डाल देता है। संग्रह ट्यूब में यह नमूना प्रयोगशाला में ले जाया जाता है जहां इसे कमरे के तापमान पर एनईईआरआई द्वारा तैयार एक विशेष बफर घोल (सौल्युशन) में रखा जाता है। इस घोल को गर्म करने पर एक आरएनए टेम्प्लेट तैयार किया जाता है, जिसे आगे रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन (आरटी-पीसीआर) के लिए संसाधित किया जाता है। नमूना एकत्र करने और उसे संसाधित करने की यह विशेष विधि हमें आरएनए निष्कर्षण की दूसरी अन्य महंगी ढांचागत आवश्यकता के स्थान पर इसका प्रयोग करने के लिए सक्षम बनाती है। लोग इससे स्वयं का परीक्षण भी कर सकते हैं, क्योंकि इस विधि अपना नमूना (सैम्पल) खुद ही लिया जा सकता है।" यह विधि पर्यावरण के अनुकूल भी है, क्योंकि इसमें अपशिष्ट उत्पादन कम से कम होता है।

ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में परीक्षण के लिए वरदान

 

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि परीक्षण की यह अनूठी तकनीक ऐसे ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से लाभप्रद सिद्ध होगी जहां अभी तक बुनियादी ढांचे की आवश्यकताएं एक बाधा के रूप में सामने आ सकती हैं। इस गैर-तकनीक को भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की मंजूरी मिल गई है। साथ ही एनईईआरआई से कहा गया है कि वह देश भर में इसके प्रयोग में मदद करने के लिए अन्य परीक्षण प्रयोगशालाओं को प्रशिक्षित आवश्यक प्रशिक्षण की व्यवस्था करेंI

 

नागपुर नगर निगम ने इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी है, जिसके बाद एनईईआरआई में स्वीकृत परीक्षण प्रोटोकॉल के अनुसार परीक्षण शुरू हो गया है।

 

"पूरे भारत में लागू करने की आवश्यकता"

एनईईआरआई में पर्यावरणीय विषाणुविज्ञान प्रकोष्ठ (एनवायरनमेंटल वायरोलॉजी सेल) के वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और लैब-तकनीशियनों ने विदर्भ क्षेत्र में बढ़ते कोविड-19 संक्रमणों के बीच इस रोगी-अनुकूल तकनीक को विकसित करने के लिए अनथक प्रयास किए हैं। डॉ. खैरनार और उनकी टीम को उम्मीद है कि इस पद्धति को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाएगा, जिसके परिणामस्वरूप तेजी से और अधिक नागरिक-अनुकूल परीक्षण होंगे, और महामारी के खिलाफ हमारी लड़ाई को और मजबूती मिलेगी I

 

 

कोविड-19 से जुड़ी नवीनतम जानकारी

कोविड-19 से जुड़ी नवीनतम जानकारी

सक्रिय मामले और घटकर 23,43,152 हुए

पिछले 24 घंटे में सक्रिय मामलों में 76,755 की कमी आयी

नये मामलों का रुझान नीचे की तरफ जाता हुआ, इस समय 1.86 लाख नये मामले

पिछले 44 दिनों में दैनिक नये मामले सबसे निचले स्तर पर

देश में अब तक कोविड-19 से कुल 2,48,93,410 लोग ठीक हुए

पिछले 24 घंटे में बीमारी से 2,59,459 लोग ठीक हुए

लगातार 15वें दिन बीमारी से ठीक वाले लोगों की संख्या दैनिक नये मामलों की संख्या से ज्यादा

रिकवरी रेट बढ़कर 90.34 प्रतिशत हुआ

साप्ताहिक पॉजिटिविटी रेट इस समय 10.42 प्रतिशत

दैनिक पॉजिटिविटी रेट नौ प्रतिशत, लगातार चौथे दिन 10 प्रतिशत से कम

राष्ट्रव्यापी टीकाकरण अभियान के तहत अब तक लोगों को टीके की 20.57 करोड़ खुराक दी गयीं

कोविड जांच की क्षमता बढ़ायी गयी- पिछले 24 घंटे में 20.7 लाख जांच की गयी 

 मूत्राशय कैंसर : ध्यान रखने योग्य बातें

मूत्राशय कैंसर : ध्यान रखने योग्य बातें

मूत्राशय कैंसर जागरूकता माह समुदाय में समुदाय में इस बीमारी के बारे में जागरूकता बढ़ाने एवं शुरुआती मदद लेने के लिए लोगों को प्रेरित करने का समय है।  "क्या आपने कभी मूत्राशय के कैंसर के बारे में सुना है?" मेरा मानना है कि यह एक सवाल पूछने और इस बारे में बात करने से आम लोगों को जागरूक होने में मदद मिल सकती है। मूत्राशय कैंसर से लड़ने में हम सभी की एक अहम भूमिका होती है और यदि हम एक साथ इसके बारे में जागरूकता फैलाते हैं तो यह मायने रखता है।

बुनियादी 3 चीजें हैं जिन्हें ध्यान में रखा जाना चाहिए। सबसे पहले, तम्बाकू और संबंधित उत्पादों से बचें, क्योंकि इनको आधे से अधिक मूत्राशय के कैंसर के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है। हम डॉक्टर्स सभी लोगों को मूत्राशय के कैंसर से बचने के लिए प्रचुर मात्रा में पानी पीने, फल और हरी पत्तेदार सब्जियां खाने के साथ-साथ आवश्यक विटामिन से भरपूर संतुलित आहार खाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।
दूसरा, शुरुआती संकेतों को पहचानें यदि कुछ सही नहीं है। यदि आप को दर्द-रहित हेमट्यूरिया (पेशाब में खून आना), पेशाब के दौरान अस्पष्टीकृत जलन या तकलीफ या लगातार मूत्र पथ का संक्रमण हो रहा हैं, तो शीघ्र चिकित्सा सहायता लें । मूत्राशय के कैंसर अभी भी भारत में सबसे आम नहीं हैं और इनमें से अधिकांश लक्षण कई अन्य सामान्य मूत्र समस्याओं में पाए जा सकते हैं। प्रारंभिक हस्तक्षेप मूत्राशय को और जीवन को बचाता है। 

तीसरा, सौभाग्य से नॉन मसल इनवेसिव कैंसर हमारे ओ पि डी में दिखने वाले सबसे आम कैंसर हैं। ऐसी स्थिति वाले रोगियों में इलाज की उत्कृष्ट दर होती है और लगभग सभी मामलों में हम मूत्राशय को संरक्षित कर सकते हैं। वे रोगी जो अधिक उन्नत बीमारियों के साथ हमारे पास आते हैं, उन्हें कई बार विभिन्न संयोजनों में सर्जरी, कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी उपचार के संयोजन की आवश्यकता होती है। उनमें से कई को मूत्र के निकास के लिए एक स्थायी रंध्र की आवश्यकता होती है, जिसके साथ सहज होने में समय लगता है। डिस्चार्ज के बाद, जीवन नए तरीके से कैसे जियें, आपके मैं में कई सवाल आ सकते हैं। कुछ आहार परिवर्तन, कुछ प्रशिक्षण सत्र आपके स्टोमा नर्स के साथ और आपके अस्पताल में एक मूत्राशय कैंसर सहायता समूह -आपके जीवन को नए सामान्य में लाने के लिए आवश्यक है। कैंसर और कैंसर के उपचार का अनुभव, लोगों और उनके प्रियजनों के लिए एक भावनात्मक प्रक्रिया हो सकती है। यह महत्वपूर्ण है कि आप एक सकारात्मक स्रोत से समर्थन प्राप्त करें। कुछ लोग अपने परिवार, दोस्तों, परामर्शदाताओं, सहकर्मियों और विश्वास में आराम पाते हैं। कैंसर सहायता समूह एक और अच्छा विकल्प हैं, वे उन लोगों से जानकारी और समर्थन का एक अच्छा स्रोत हो सकते हैं जो समझ सकते हैं कि आप क्या अनुभव कर रहे हैं। अपने क्षेत्र में कैंसर सहायता समूह स्थानों के लिए अपने डॉक्टर से पूछें।

लेखक, डॉ दिवाकर पांडे, बालको मेडिकल सेंटर, नया रायपुर में सर्जिकल ऑन्कोलॉजिस्ट हैं।
कोरोना के बाद इस शहर में ब्रेन फॉग का मामला आया सामने, जानें क्या है लक्षण

कोरोना के बाद इस शहर में ब्रेन फॉग का मामला आया सामने, जानें क्या है लक्षण

इंदौर, पोस्ट कोविड मरीजो के बारे में आपने सुना होगा कि उसे ब्लैक फंगस, व्हाइट फंगस या फिर यलो फंगस ने अपनी जकड़ में ले लिया हो लेकिन इंदौर में पोस्ट कोविड मरीज को एक ऐसी बीमारी ने अपनी जकड़ में लिया है जिसे आम तौर मरीज व उनके परिजन नजर अंदाज करते है. दरअसल, इंदौर में ब्रेन फॉग से जुड़ा एक मामला सामने आया है.
यहां के के महालक्ष्मी नगर में रहने वाले 40 वर्षीय युवक ने सप्ताहभर पहले ही कोरोना को हराया था और लगभग 15 दिन अस्पताल में रहने के बाद जब वह घर लौटा तो अचानक चीजें भूलने लगा. इतना ही नही वह अपने परिजनों पर चिड़चिड़ करने लगा और नींद नहीं आने, भूख न लगने जैसे लक्षण के चलते उसके परिजन भी परेशान हो गए. जब इस मामले को लेकर परिजनों ने डॉक्टर से संपर्क किया तो पता चला यह ब्रेन फॉग से मिले जुले लक्षण हैं.
जानकारी के मुताबिक 50 प्रतिशत पोस्ट कोविड मरीजों में इस बात की संभावना बनी रहती है, बावजूद इसके इस तरह के मामलों को गंभीरता से नहीं लेते हुए लोग डॉक्टरों के पास नही जाते, नतीजा ये होता है कि मरीजो की हालत बिगड़ती जाती है.

वरिष्ठ मनोचिकित्सक डा. उज्जवल सरदेसाई के मुताबिक कोरोना को हरा चुके मरीजों में ब्रेन फॉग के लक्षण, अवसाद से मिलते है. 40 से अधिक से आयु के मरीज इस प्रकार की परेशानी से घिर जाते है जिनका उपचार संभव है. कोरोना को हरा चुके मरीजों की परेशानी होती है कि उन्हें कभी थकान होती है तो कभी किसी काम में मन नहीं लगता है. लिहाजा, डॉक्टर ऐसे मरीजों को दूसरी आवश्यक दवाओं के साथ खून पतला करने की दवा भी दे रहे हैं.
वही डा. सरदेसाई ने बताया कोरोना संक्रमण के दौरान मरीजों में ब्लड क्लॉट्स यानी नसों में खून के थक्के जमना इसका कारण हो सकता है. संक्रमण के बाद व्यक्ति के शरीर में कई तरह के बदलाव होते हैं. इसमें बीमारी से जुड़ी कई नकारात्मक बातें होती हैं जो दिमाग पर असर करती हैं. इस स्थिति को ब्रेन फॉग कहते हैं.

इंदौर के सुपर स्पेशयलिटी अस्पताल के प्रभारी डॉक्टर ए.डी. भटनागर की माने तो कोरोना के मरीज अवसाद में आ जाते हैं और उनकी एकाग्रता भी भंग हो जाती है. भूख नहीं लगना जैसी शिकायते मरीज करते है, इसलिए अस्पताल में मनोचिकित्सक भी मरीजों की मॉनिटरिंग करते हैं. डॉक्टरों के मुताबिक कोरोना को हरा चुके मरीजोें को अगर नींद न आए, लगातार चिड़चिड़ करे, भूख न लगे, कुछ समझ नहीं आए और बोलने में हकलाने लगे तो परिजनों को तत्काल डॉक्टराें की सलाह लेनी चाहिए.

 

व्हाइट फंगस के कारण छोटी आंत एवं बड़ी आंत में छेद का मामला सामने आया, पढ़े क्या है मामला

व्हाइट फंगस के कारण छोटी आंत एवं बड़ी आंत में छेद का मामला सामने आया, पढ़े क्या है मामला

नई दिल्ली, कोरोना संक्रमित मरीज में व्हाइट फंगस यानी कैंडिडा की वजह से फूड पाइप, छोटी आंत एवं बड़ी आंत में छेद का मामला सामने आया है. अस्पताल का दावा है कि यह विश्व का पहला केस है. इससे पहले सर गंगाराम अस्पताल में दो मरीज जो कोरोना संक्रमित थे उनकी आंत में ब्लैक फंगस यानी म्यूकोरम्यकोसिस मिला था. आमतौर पर कोरोना संक्रमित मरीजों में म्यूकोरम्यकोसिस के आंख और नाक के केस ज्यादा आए हैं. दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में 49 साल की महिला को 13 मई को अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में एडमिट कराया गया. उसके पेट में असहनीय दर्द था और उल्टियों के साथ वो कब्ज़ से पीड़ित थी. कुछ समय पहले महिला का ब्रैस्ट कैंसर की वजह से ऑपेरशन किया गया था और चार हफ्ते पहले कीमोथेरेपी खत्म हुई थी.


महिला को सांस लेने में हो रही थी परेशानी
एडमिशन के समय महिला शॉक में थी और सांस लेने में उसे काफी कठिनाई हो रही थी. सीटी स्कैन करने पर मरीज के पेट में हवा और तरल द्रव्य का आभास हुआ जोकि आंतो में छेद की निशानी है. जिसके बाद मरीज की हालत काफी नाजुक थी. तुरन्त उसके पेट में पाइप डालकर करीब एक लीटर पस एवं बाइल द्रव्य निकला गया और उसके बाद इमरजेंसी सर्जरी की गई.


डॉ. (प्रो.) अनिल अरोड़ा, चेयरमैन, इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर, गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एंड पैन्क्रियाटिकोबिलरी साइंसेज,सर गंगा राम अस्पताल, ने बताया कि सर गंगाराम अस्पताल में दो हफ्ते पहले ये पेशेंट हमारे पास आई थीं जिनकी पहले ब्रैस्ट कैंसर की सर्जरी हुई, फिर कीमोथेरेपी हुई और अब वो लूज मोशन और एब्डोमिनल पेन की वजह से एडमिट हुई. फिर हमने पाया कि उनके आंत में लीक है. उनकी कंडीशन को सुधारने के बाद तुरंत सर्जरी की गई. सर्जरी में GE जंक्शन से स्टामक से फ़ूड पाइप से बड़ी आंत में होल मिले.


सर गंगा राम अस्पताल के डॉक्टरों के मुताबिक, चार घंटे चली इस मुश्किल सर्जरी में महिला के फूड पाइप, छोटी आंत और बड़ी आंत में हुए छेदों को बंद कर दिया और द्रव्य लीक को रोक दिया. छोटी आंत में हुए गैंगरीन को भी काटकर निकाल दिया गया. इसके बाद आंत के एक टुकड़े को बायोप्सी के लिए भेजा गया.


इस ऑपेरशन में शामिल डॉ. अरोड़ा के मुताबिक, "आंत से निकाले गए टुकड़ो की बायोप्सी से हमें पता चला कि आंतों में व्हाइट फंगस है जिसने आंतों के अंदर खतरनाक फोड़ेनुमा घाव कर दिए थे जिसकी वजह से खाने की पाइप से लेकर छोटी आंत और बड़ी आंत में छेद हो गए थे. मरीज की कोविड-19 एंटीबॉडी लेवल भी बढे हुए थे. खून की जांच करने पर शरीर के अंदर व्हाइट फंगस बढ़ा हुआ मिला. जल्द ही मरीज को ऐंटीफंगल ट्रीटमेंट शरू कर दिया गया जिससे उसकी हालत में काफी सुधार हुआ.


अपनी तरह का पहला मामला
डॉक्टरों के मुताबिक स्टेरॉयइड के इस्तेमाल के बाद ब्लैक फंगस के द्वारा आंत में छेद होने के कुछ मामले हाल ही में सामने आए हैं पर व्हाइट फंगस द्वारा कोविड-19 इन्फेक्शन के बाद खाने की नली, छोटी आंत एवं बड़ी आंत में छेद करने का मामला यह विश्वभर में पहला है.


कोविड-19 के बाद व्हाइट फंगस का मामला कहीं भी मेडिकल लिटरेचर में प्रकाशित नहीं हुआ. इसका कारण शायद मरीज की तीन अवस्थाएं थी जिससे उसके शरीर की बीमारी से लड़ने की क्षमता बहुत कम हो गयी थी.


यह तीन अवस्थाएं थी कैंसर, हाल ही में दी गई कीमोथेरेपी और कोविड-19 इंफेक्शन. इसकी वजह से व्हाइट फंगस जो कि सामान्यतः इतनी हानि नहीं पहुंचाता है, उसने भी हानिकारक रूप से मरीज के शरीर के अंदर काफी नुकसान पहुंचा दिया. इस वक्त मरीज सर्जरी के बाद ठीक है और कुछ दिनों के बाद उसको अस्पताल से छुट्टी दे दी जाएगी.


डॉ अनिल अरोड़ा ने बताया कि ये देखा गया कि ये व्हाइट फंगस या कैंडिडा की वजह से था. कैंडिडा नॉर्मल फंगल इंफेक्शन होता है जो आंत में रहता है. जब इम्मुनो सप्रेस होती है जब आपका इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है, जैसा इस मरीज में था. इसके तीन कारण थे इम्मयून कमज़ोर होना, अंडरलाइन कैंसर, कीमोथेरेपी होना और कोरोना. इन तीनो की वजह से उसे ये हुआ.


इसे पहले सर गंगाराम अस्पताल में दो ऐसे मरीजों का इलाज हुआ है जिन्हें कोरोना था और उसके चलते उन्हें पेट की छोटी आंत में म्यूकोर्मिकोसिस हुआ. समय रहते उनका इलाज हुआ और उनकी जान बच गई. जिसे ये साफ है कि म्यूकोरम्यकोसिस का खतरा सिर्फ आंख नाक से नहीं पेट मे भी है.  

भारत में धूम्रपान करने वालों की संख्या में हुई : पढ़े रिपोर्ट,Global Burden of Disease ने अध्ययन प्रकाशित किया

भारत में धूम्रपान करने वालों की संख्या में हुई : पढ़े रिपोर्ट,Global Burden of Disease ने अध्ययन प्रकाशित किया

31 मई को विश्व तंबाकू निषेध दिवस (World No Tobacco Day) ​ से ठीक पहले, Global Burden of Disease ने दुनिया भर में धूम्रपान करने वालों की संख्या पर एक अध्ययन प्रकाशित किया है। इस अध्ययन के अनुसार, भारत में 2019 में 15-24 आयु वर्ग के लगभग 2 करोड़ धूम्रपान करने वाले थे। यह दुनिया भर में तंबाकू धूम्रपान करने वालों की दूसरी सबसे बड़ी संख्या है। भारत में भी 1990 के बाद से 15-24 आयु वर्ग में धूम्रपान करने वालों की सबसे अधिक वृद्धि देखी गई।

वैश्विक परिदृश्य
इस अध्ययन के अनुसार, 2019 में धूम्रपान करने वालों की संख्या बढ़कर 1 बिलियन हो गई।
तंबाकू के सेवन से 7 मिलियन लोगों की मौत हुई।
नए धूम्रपान करने वालों में, 89% 25 साल की उम्र तक आदी हो गए थे।
दुनिया भर में 155 मिलियन धूम्रपान करने वाले 15-24 आयु वर्ग के हैं।
धूम्रपान करने वालों की सबसे अधिक संख्या वाले देश
तंबाकू धूम्रपान करने वालों की सबसे अधिक संख्या वाले 10 देशों में वैश्विक तंबाकू धूम्रपान करने वाली आबादी का दो-तिहाई हिस्सा है। शीर्ष 10 देश इस प्रकार हैं- चीन, भारत, इंडोनेशिया, अमेरिका, रूस, बांग्लादेश, जापान, तुर्की, वियतनाम और फिलीपींस।

विश्व तंबाकू निषेध दिवस (World No Tobacco Day)
दुनिया भर में हर साल 31 मई को यह दिवस मनाया जाता है। यह लोगों को तंबाकू के सेवन से होने वाले खतरों और तंबाकू कंपनियों की व्यावसायिक प्रथाओं के बारे में जागरूक करने के लिए मनाया जाता है। यह आगे जनता को सूचित करता है; विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) तंबाकू के सेवन को रोकने के लिए क्या कर रहा है। यह नकारात्मक स्वास्थ्य प्रभावों पर भी ध्यान आकर्षित करता है।

 

फंगल इंफेक्शन को उसके रंग के नाम से न बुलाएं, यह  इंफेक्शन कि जगह के हिसाब से रंग बदलता: एम्स निदेशक, पढ़े पूरी खबर

फंगल इंफेक्शन को उसके रंग के नाम से न बुलाएं, यह इंफेक्शन कि जगह के हिसाब से रंग बदलता: एम्स निदेशक, पढ़े पूरी खबर

नई दिल्ली. कोरोना वायरस संक्रमण के बाद देश ब्लैक फंगस इंफेक्शन से जूझ रहा है. ये ब्लैक फंगस इंफेक्शन अब अलग-अलग रंग में दिख रहा है. किसी मरीज में सफेद तो किसी मरीज में पीला... इस मामले पर सोमवार को स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जानकारी देते हुए एम्स डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कहा कि फंगल इंफेक्शन को उसके रंग के नाम से न बुलाएं तो ज्यादा ठीक रहेगा, क्योंकि इससे कंन्फ्यूजन होता है. एम्स निदेशक ने कहा कि इंफेक्शन किस जगह पर हो उस हिसाब से रंग बदलता है.

उन्होंने कहा कि ब्लैक फंगस एक अलग फैमिली है. इसका नाम म्यूकर माइकोसिस के साथ इसलिए जुड़ा क्योंकि इसमें सफेद रंग की फंगल कॉलोनी के साथ ब्लैक कलर की डॉट दिखती है. इसलिए आम तौर पर इसे ब्लैक फंगस कह देते हैं. गुलेरिया ने कहा कि फिलहाल मरीजों में जो फंगल इंफेक्शन मिल रहे हैं, वो म्यूकर माइकोसिस, कैंडिडा और एस्परजिलस हैं. इसमें भी म्यूकर माइकोसिस ज्यादा है, जिन लोगों की इम्युनिटी कम होती है, उनमें ज्यादा कैंडिडा, एस्परजिलस या म्यूकर माइकोसिस होता है.

डायबिटिक या स्टेरॉयड लेने वाले खतरे की जद में

एम्स निदेशक ने कहा कि ये फंगल इंफेक्शन 92 से 95 फीसदी उन मरीजों में देखा गया है, जो या तो डायबिटिक हैं या स्टेरॉयड का इस्तेमाल कर रहे हैं. बाकियों में यह काफी रेयर है. उन्होंने कहा कि ज्यादातर मरीज को म्यूकर माइकोसिस कोरोना के अर्ली स्टेज में हो रहा है. यह एक बड़ा चैलेंज है. क्योंकि म्यूकर माइकोसिस मरीज का ट्रीटमेंट लंबे वक्त तक चलता है. हॉस्पिटल के लिए चैलेंज है कि म्यूकर माइकोसिस के मरीज के लिए दो अलग अलग वार्ड बनाएं, एक कोरोना पॉजिटिव मरीजों के लिए और एक नेगेटिव मरीजों के लिए. करनी होगी पोस्ट कोविड की चुनौतियों से निपटने की तैयारी

इसके अलावा रणदीप गुलेरिया ने कहा कि कोरोना की रिकवरी रेट बढ़ने पर पोस्ट कोविड की चुनौतियों से निपटने की तैयारी करनी होगी. उन्होंने कहा कि देश में कोरोना से रिकवरी रेट बढ़ा है, यानी ठीक होने वाले मरीजों की संख्या बढ़ी है. 3 मई को रिकवरी 81.8 पर्सेंट थी, वही अब 88.7 पर्सेंट हो गई है. एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने कहा कि जैसे-जैसे रिकवरी रेट बढ़ेगा, वैसे ही पोस्ट-कोविड मरीज भी बढ़ेंगे और हमें इसके लिए तैयार रहना चाहिए.

कई हफ्तों तक रहते हैं कई पोस्ट कोविड लक्षण

गुलेरिया ने कहा कि कोरोना की पहली लहर में ये समझ नहीं पाए थे कि कोविड ठीक होने के बाद भी लक्षण रहते थे. किसी में ये लक्षण चार से 12 हफ्तों तक रहते हैं और किसी में इससे भी ज्यादा. उन्होंने कहा कि कोविड ठीक होने के बाद भी सांस लेने में तकलीफ, खांसी, छाती में दर्द या पल्स ज्यादा रहने के लक्षण हो सकते हैं. थकान, जोड़ों में दर्द, सिर में दर्द जैसे लक्षण भी कई हफ्तों तक रहते हैं, जिनका लक्षण के आधार पर इलाज जरूरी है.

गुलेरिया के मुताबिक कई बार कोरोना ठीक होने के बाद भी मरीज सही से कॉन्संट्रेट नहीं कर पाते, नींद नहीं आती है या डिप्रेशन रहता है. इसके लिए मेडिकल कम्युनिटी को तैयारी करनी होगी. पोस्ट कोविड सेंटर बनाने होंगे. रिकवरी रेट बढ़ेगा तो पोस्ट कोविड मरीज बढ़ेंगे और हमें उसके लिए तैयार रहना चाहिए. 

अब इस रंग के फंगस ने दी दस्तक, यहां मिला पहला मामला... पहले से है ज्‍यादा खतरनाक

अब इस रंग के फंगस ने दी दस्तक, यहां मिला पहला मामला... पहले से है ज्‍यादा खतरनाक

गाजियाबाद। कोरोना संक्रमण, ब्लैक फंगस और व्हाइट फंगस से अभी राहत भी नहीं मिली थी कि येलो फंगस नाम के नए खतरे ने दस्तक दे दी है। गाजियाबाद में येलो फंगस के पहले मरीज की पुष्टि हुई है।
ब्लैक और व्हाइट फंगस के बाद अब गाजियाबाद के एक मरीज में येलो फंगस की पुष्टि हुई है। इलाज करने वाले डॉक्टर बीपी त्यागी ने बताया कि 45 वर्षीय मरीज पहले कोरोना संक्रमित हुए थे और वह डायबिटीज से भी पीड़ित हैं।
ब्लैक फंगस का इलाज करने के लिए ओटी में सफाई चल रही थी, इसी दौरान जांच में पता चला कि मरीज येलो फंगस से भी संक्रमित हैं। फिलहाल मरीज की हालत में सुधार है। बताया गया कि इस बीमारी को म्यूकर स्पेक्टिक्स कहा जाता है।
बता दें कि येलो फंगस के इस मामले ने डॉक्टरों की चिंता बढ़ा दी है। डॉक्टरों के अनुसार यह ब्लैक और व्हाइट फंगस से भी ज्यादा खतरनाक हो सकता है। यह इस हद तक खतरनाक हो सकता है कि मरीज के लिए जानलेवा भी साबित हो सकता है।
डॉक्टर ने बताया कि अभी तक यह येलो फंगस छिपकली और गिरगिट जैसे जीवों में पाया जाता था। इतना ही नहीं, यह जिस रेपटाइल को यह फंगस होता है वह जिंदा नहीं बचता इसलिए इसे बेहद खतरनाक और जानलेवा माना जाता है। पहली बार किसी इंसान में यह फंगस मिला है।
डॉक्टर के अनुसार येलो फंगस गंदगी के कारण होता है। यह फंगस सामान्य रूप से जमीन पर पाया जाता है। छिपकली और गिरगिट जैसे जिस जीव की रोग निरोधक क्षमता कम होती है यह उसे असर करता है और कमजोर कर के जानलेवा तक बन जाता है। डॉक्टरों का अनुमान है कि कोरोना के कारण अब इंसानों की इम्युनिटी कमजोर हो रही है इसलिए यह फंगस उन्हें चपेट में ले रहा है।

येलो फंगस के लक्षण
- नाक का बंद होना।
- शरीर के अंगों का सुन्न होना।
- शरीर में टूटन होना और दर्द होना।
- शरीर में अत्यधिक कमजोरी होना।
- हार्ट रेट का बढ़ जाना।
- शरीर में घावों से मवाद बहना।
- शरीर कुपोषित सा दिखने लगना।
 

Oximeter को रिप्लेस करेगा मोबाइल ऐप? फोन के कैमरे से बताएगा ऑक्सीजन लेवल

Oximeter को रिप्लेस करेगा मोबाइल ऐप? फोन के कैमरे से बताएगा ऑक्सीजन लेवल

भारत में कोरोना (COVID-19) की दूसरी लहर में सबसे ज्यादा समस्या ऑक्सीजन की रही है। अचानक मरीजों का ऑक्सीजन लेवल कम हो जाता है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में लोगों ने पल्स ऑक्सीमीटर (pulse oximeters) की खरीदारी की है। इसके जरिए आप घर बैठे अपना ऑक्सीजन लेवल चेक कर पाते हैं। बाजार में एक ठीक-ठाक पल्स ऑक्सीमीटर की कीमत करीब 2000 रुपये है। वहीं, अब ऑक्सीमीटर की तरह काम करने वाले एक मोबाइल ऐप आ गया है।
BGR.in की रिपोर्ट के मुताबिक, कोलकाता के एक हेल्थ-स्टार्टअप ने इस मोबाइल ऐप का तैयार किया है। ऐप का नाम CarePlix Vital's है, जो आपके ब्लड ऑक्सीजन लेवल से लेकर पल्स और श्वसन दर को भी बताता है। खास बात यह है कि यह सब काम फोन के कैमरे से किया जाता है। रिपोर्ट की मानें तो यूजर को सिर्फ अपने अपने फोन के रियर कैमरा और फ्लैश लाइट पर उंगली रखनी होगी और चंद सेकेंड्स में ही उनका ऑक्सीजन सेचुरेशन (SpO2), pulse और सांसों की दर दिखने लग जाएगी।
यह एक रजिस्ट्रेशन-आधिरित ऐप है। केयरनाउ हेल्थकेयर (CareNow Healthcare) के को-फाउंडर सुभब्रत पॉल ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, 'ऑक्सीजन सेचुरेशन और पल्स रेट का पता लगाने के लिए लोगों को पल्स ऑक्सीमीटर या इसी तरह के दूसरे वियरेबल जैसे कि स्मार्टवॉच की जरूरत होती है। इन सबमें जो मुख्य टेक्नोलॉजी इस्तेमाल होती है वह फोटोप्लेथिसमोग्राफी या पीपीजी है। हम यह काम स्मार्टफोन के रियर कैमरे और फ्लैशलाइट के जरिए कर रहे हैं।'
इस तरह का करता है ऐप
सुभब्रत पॉल की मानें तो ऑक्सीमीटर और स्मार्टवॉच में इन्फ्रारेड लाइट सेंसर होते हैं, लेकिन स्मार्टफोन में सिर्फ फ्लैशलाइट मिलती है। एक बार हम अपनी उंगली से स्मार्टफोन के रियर कैमरा और फ्लैशलाइट को कवर करंगे तो 40 सेकेंड के लिए स्कैन शुरू होगा। हम प्रकाश की तीव्रता (light intensity) के अंतर का कैलक्यूलेट करने के अलावा कुछ नहीं कर रहे हैं और अंतर के आधार पर हम PPG ग्राफ तैयार करते हैं। इस ग्राफ से ही SpO2 और पल्स रेट निकाल लिया जाता है।
 

कोवैक्सीन का टीका ले चुके लोग के लिए ये खबर है काम की, पढ़े पूरी खबर

कोवैक्सीन का टीका ले चुके लोग के लिए ये खबर है काम की, पढ़े पूरी खबर

कोरोना वायरस की दूसरी लहर से भारत सबसे अधिक प्रभावित हुआ है और इधर कोरोना पाबंदियों की वजह से वैश्विक आवाजाही पर भी प्रतिबंध है। मगर अब जब पूरी दुनिया में वैक्सीनेशन की रफ्तार तेज होने लगी है तो कई देशों ने ट्रेवल बैन में छूट देने का ऐलान किया है। कई देशों ने वैक्सीन लगवा चुके लोगों के लिए अपनी नीतियों में छूट दी है और उनके लिए अपने देश के दरवाजे खोलने का ऐलान कर दिया है। मगर उन लोगों के लिए अब भी विदेश जाने के दरवाजे बंद रहेंगे, जिन्होंने भारत बायोटेक की कोक्सीन लगवाई है। जी हां, अगर आप भारत बायोटेक की वैक्सीन कोवैक्सीन की दोनों खुराक लगवा चुके हैं तब भी शुरुआती महीनों में इंटरनेशनल ट्रेवल पर आपको छूट नहीं मिलेगी।
टीओआई की खबर के मुताबिक, दरअसल जिन देशों ने अपने यहां इंटरनेशनल ट्रेवल की छूट दी है, या तो वे अपनी खुद की रेग्युलेटरी अथॉरिटी द्वारा स्वीकृत की गई वैक्सीन को मान्यता दे रहे हैं या फिर विश्व स्वास्थ्य संगठन की इमर्जेंसी यूज लिस्टिंग (EUL) की तरफ से स्वीकृत की गई वैक्सीन को ही मान्य मान रहे हैं। इस लिस्ट में सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की कोविशील्ड, मॉडर्ना, एस्ट्राजेनेका, फाइजर, जानसेन (अमेरिका और नीदरलैंड में) और सिनोफार्म/BBIP शामिल है, मगर मगर कोवैक्सिन का नाम कहीं नहीं है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की लेटेस्ट गाइडेंस डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक, इमर्जेंसी यूज लिस्टिंग में शामिल होने के लिए भारत बायोटेक की ओर से इच्छा जाहिर की गई है, मगर संगठन की तरफ से और जानकारी मांगी गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि प्री-सबमिशन मीटिंग मई-जून में प्लान की गई है, जिसके बाद कंपनी की तरफ से डोजियर सबमिट किया जाएगा। जिसकी समीक्षा की जाएगी और फिर इस पर फैसला लिया जाएगा। इस प्रक्रिया में अभी लंबा वक्त लग सकता है।
बता दें कि भारत में अभी दो कोरोना वैक्सीन की मदद से वैक्सीनेशन अभियान चल रहा है। हालांकि, इसमें स्पूतनिक-वी का नाम भी जुड़ गया है, मगर सरकारी अभियान में अब तक यह शामिल नहीं हो पाया है। भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के एक दिन में 2.57 लाख नए मामले आए हैं। इसी के साथ संक्रमण के रोज आने वाले मामले लगातार छठे दिन तीन लाख से नीचे रहे। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने शनिवार को बताया कि संक्रमण के नए मामलों के साथ ही देश में कोविड-19 के कुल मामले बढ़कर 2,62,89,290 हो गए हैं।


 

पुरुषों और डायबिटीज मरीजों को ब्लैक फंगस का खतरा सबसे ज्यादा, डॉक्टरों की स्टडी में खुलासा

पुरुषों और डायबिटीज मरीजों को ब्लैक फंगस का खतरा सबसे ज्यादा, डॉक्टरों की स्टडी में खुलासा

भारत में कोरोना संकट के बीच ब्लैक फंगस यानी म्यूकोर्मिकोसिस के बढ़ते मामले ने केंद्र और राज्य सरकारों की चिंता बढ़ा दी है। चार भारतीयों द्वारा जल्द ही प्रकाशित होने वाले एक अध्ययन के अनुसार, पुरुषों में म्यूकोर्मिकोसिस से संक्रमित होने की संभावना अधिक होती है। डाक्टरों ने अपनी इस स्टडी का नाम 'COVID-19 में म्यूकोर्मिकोसिस: दुनिया भर में और भारत में रिपोर्ट किए गए मामलों की एक व्यवस्थित समीक्षा' दिया है।
डॉक्टरों ने एक दुर्लभ लेकिन गंभीर फंगल संक्रमण, म्यूकोर्मिकोसिस से संक्रमित कोरोना रोगियों के 101 मामलों का विश्लेषण किया। इसमें पाया गया कि संक्रमितों में 79 पुरुष थे। डायबिटीज को सबसे महत्वपूर्ण जोखिम कारक के रूप में पाया गया। जिसमें 101 में से 83 डायबिटीज से पीड़ित थे।
इस स्टडी को एल्सेवियर जर्नल में प्रकाशित किया जाना है। कोलकाता में जीडी अस्पताल और डायबिटीज संस्थान से डॉ अवधेश कुमार सिंह और डॉ रितु सिंह, मुंबई में लीलावती अस्पताल से डॉ शशांक जोशी और नई दिल्ली में राष्ट्रीय डायबिटीज, मोटापा और कोलेस्ट्रॉल फाउंडेशन से डॉ अनूप मिश्रा ने एक साथ 101 रोगियों का अध्ययन किया, जिसमें 82 भारत से थे, 9 अमेरिका से और तीन ईरान से।
आपको बता दें कि कोविड -19 से संबंधित म्यूकोर्मिकोसिस एक गंभीर बीमारी बन गई है, जिसमें अब तक सबसे अधिक मौतें (90) महाराष्ट्र से हुई हैं।
अध्ययन में 101 में से 31 लोगों की मौत फंगल संक्रमण के कारण हुई। डेटा से पता चला है कि म्यूकोर्मिकोसिस विकसित करने वाले 101 व्यक्तियों में से 60 में सक्रिय कोविड -19 संक्रमण था और 41 ठीक हो गए थे। साथ ही, 101 में से 83 लोगों को डायबिटीज था, वहीं तीन को कैंसर था।
शशांक जोशी, जो एक एंडोक्रिनोलॉजिस्ट भी हैं, ने कहा कि उन्होंने अध्ययन किया कि कोरोना के लिए म्यूकोर्मिकोसिस के रोगियों का क्या उपचार किया गया। कुल 76 रोगियों में एक इम्यूनोसप्रेसेन्ट के रूप में उपयोग किए जाने वाले कॉर्टिकोस्टेरॉइड का इतिहास था। 21 को रेमेडिसविर और चार टोसीलिज़ुमैब दिए किए गए थे।
एक मामले में, डायबिटीज से पीड़ित मुंबई के एक 60 वर्षीय व्यक्ति को स्टेरॉयड और टोसीलिज़ुमैब दोनों दिए गए। फंगल इंफेक्शन के कारण उनकी मौत हो गई। लेकिन मुंबई में एक 38 वर्षीय व्यक्ति बिना डायबिटीज के बच गया। अध्ययन में कोविड -19 के साथ डायबिटीज रोगियों में मृत्यु और गंभीरता का संबंध अधिक पाया गया।
Mucormycosis नाक, साइनस, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र, फेफड़े, जठरांत्र संबंधी मार्ग, त्वचा, जबड़े की हड्डियों, जोड़ों, हृदय और गुर्दे को प्रभावित कर सकता है। अध्ययन से पता चला है कि ज्यादातर मामलों में, 89 से अधिक, नाक और साइनस में फंगल का संक्रमण पाया गया था। ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि कोविड-19 श्वसन तंत्र को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि कम ऑक्सीजन (हाइपोक्सिया), उच्च ग्लूकोज, अम्लीय माध्यम और इम्यूनोसप्रेसेन्ट्स के उपयोग के कारण सफेद रक्त कोशिकाओं की गतिविधि में कमी के आदर्श वातावरण में कोविड -19 वाले लोगों में फगस म्यूकोरालेस बीजाणु फैल रहे हैं। इसमें कहा गया है कि जहां इस फंगल संक्रमण का वैश्विक प्रसार प्रति मिलियन जनसंख्या पर 0.005 से 1.7 है, वहीं भारत में डायबिटीज की आबादी अधिक होने के कारण यह 80 गुना अधिक है।
जोशी ने कहा कि अध्ययन ने "मरीजों में कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स के विवेकपूर्ण साक्ष्य-आधारित उपयोग" और उनके रक्त शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने की सलाह दी है।

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