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जानिए कोविड-19 कैसे प्रभावित कर रहा है ब्लड शुगर लेवल

जानिए कोविड-19 कैसे प्रभावित कर रहा है ब्लड शुगर लेवल

पिछले दो महीने हम सभी के लिए किसी कयामत से कम नहीं रहे. हालांकि, कोविड-19 के मामले कम हो रहे हैं, लेकिन मौत की बढ़ती संख्या चिंता का मुद्दा है. हाल के एक रिसर्च के मुताबिक, हाई ब्लड प्रेशर से जूझ रहे लोगों को कोरोना की जांच में पॉजिटिव पाए जाने का 30 फीसद ज्यादा खतरा है. कोविड-19 कैसे ब्लड शुगर लेवल को प्रभावित करती है और उसकी रोकथाम के लिए क्या किया जा सकता है, विशेषज्ञों के हवाले से जानना चाहिए.


मैक्स अस्पताल, नई दिल्ली में डायबिटीज विशेषज्ञ डॉक्टर सुजीत झा कहते हैं, "भारत में करीब 10-13 फीसद लोग डायबिटीज का शिकार हैं. कोरोना वायरस महामारी के कारण, हमारा बाहर निकलना बंद हो गया है और घर में रहने को विवश हैं. इन सभी ने शारीरिक गतिविधि को कम कर दिया है, जिससे हमारे स्वास्थ्य और ब्लड शुगर लेवल व्यापक रूप से प्रभावित हुए हैं. शरीर में किसी तरह के तीव्र संक्रमण से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है. इसके अलावा, संक्रमण के दौरान खराब डाइट, तेज बुखार और अन्य फैक्टर ब्लड शुगर लेवल को बढ़ा सकते हैं. उसके ऊपर स्ट्रॉयड के इस्तेमाल से उसे ईंधन मिलता है, जो कुछ मरीजों में अनिवार्य है."


किसे ब्लड शुगल लेवल की जांच कराना चाहिए?
झा के मुताबिक, कोई शख्स जो कोरोना वायरस की जांच में पॉजिटिव पाया गया है, उसे जरूर अपना डायबिटीज टेस्ट करवाना चाहिए. ये एक साधारण जांच है जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. सही इलाज का फैसला करने में इसकी प्रमुख भूमिका होती है, इसलिए जरूर करवाना चाहिए. यहां तक कि अगर डॉक्टर से भी छूट जाए, तो उसे अनिवार्य टेस्ट समझा जाना चाहिए. उनका कहना है कि अगर पांच साल का बच्चा भी कोरोना पॉजिटिव होता है, तो उसका भी जरूर ब्लड शुगर लेवल की जांच होनी चाहिए.


ब्लड शुगर लेवल बढ़ने के संकेत
कोविड-19 के लक्षणों के साथ मिलने पर हाई ब्लड शुगर के लक्षणों में अंतर करना बहुत मुश्किल है. इस तरह, सबसे अच्छा है कि HbA1c से ब्लड शुगर टेस्ट करवाया जाए ताकि औसत ब्लड शुगर लेवल का सही अंदाजा हो सके. अपोलो अस्पताल, दिल्ली में सीनियर कंसलटेंट डॉक्टर एसके वान्गू भी हर शख्स के लिए अपना ब्लड शुगर लेवल चेक करवाना जरूरी समझते हैं, चाहे उसे डायबिटीज हो या नहीं.


कोविड-19 पेनक्रियाज में बीटा सेल्स को प्रभावित कर सकती है, जो इंसुलिन पैदा करते हैं. ACE2-रिसेप्टर इंसुलिन बनानेवाली बीटा सेल्स को नुकसान पहुंचाते हैं. इससे इंसुलिन की कमी होती है और इस तरह ब्लड शुगर लेवल में बढ़ोतरी होती है. कोविड-19 संक्रमण के दौरान ब्लड शुगर लेवल पूरी बारीकी से मॉनिटर किया जाना चाहिए और सिर्फ इंसुलिन के साथ इलाज होना चाहिए.


प्रीडायबिटीज के कोविड मरीज

समय पर इलाज नहीं कराने से प्रीडायबिटीज की स्थिति पूरी तरह डायबिटीज में बदल सकती है. ऐसे लोगों का इलाज स्थिति को काबू करने के लिए इंसुलिन से किया जाना चाहिए. नियंत्रित डायबिटीज के साथ किसी शख्स का भी कोविड के बाद ब्लड शुगर लेवल ऊंचा हो सकता है. ऐसे लोगों को अस्थायी तौर पर इंसुलिन की जरूरत हो सकती है और उनकी पुरानी दवा काम नहीं कर सकती.  

देशव्यापी “आयुष कोविड-19 काउंसलिंग हेल्पलाइन”की शुरुआत

देशव्यापी “आयुष कोविड-19 काउंसलिंग हेल्पलाइन”की शुरुआत

आयुष मंत्रालय ने एक समर्पित सामुदायिक सहायता हेल्पलाइन शुरू की है। इसके जरिये कोविड-19 की चुनौतियों के समाधान के लिये आयुष आधारित उपाय बताये जायेंगे। इसका टोल-फ्री नंबर 14443 है। यह हेल्पलाइन पूरे देश में शुरू हो गई है और सप्ताह के सातों दिन सुबह छह बजे से आधी रात बारह बजे तक खुली रहेगी।

हेल्पलाइन 14443 के जरिये आयुष की विभिन्न विधाओं, जैसे आयुर्वेद, होमियोपैथी, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी और सिद्ध के विशेषज्ञ, लोगों की समस्याओं का समाधान करने के लिये उपलब्ध रहेंगे। ये विशेषज्ञ सिर्फ रोगी की काउंसलिंग और उपयोगी उपचार ही नहीं बतायेंगे, बल्कि वे नजदीकी आयुष केंद्रों की जानकारी भी देंगे।

विशेषज्ञ कोविड-19 से उबरने वाले रोगियों को दोबारा रोजमर्रा के काम शुरू करने और अपनी देखभाल के बारे में सलाह देंगे। यह हेल्पलाइन इंटरऐक्टिव वॉइस रेस्पांस (आईवीआर) आधारित है और हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा में उपलब्ध है। जल्द ही अन्य भाषायें भी इसमें जोड़ दी जायेंगी। हेल्पलाइन एक बार में 100 कॉल्स ले सकती है। जरूरत को देखते हुये इसकी क्षमता बढ़ा दी जायेगी। हेल्पलाइन के जरिये आयुष मंत्रालय का प्रयास है कि देशभर में कोविड-19 के फैलाव को सीमित किया जाये। उसके इस प्रयास को गैर-सरकारी संस्था प्रोजेक्ट स्टेप-वन सहयोग कर रही है।

उल्लेखनीय है कि आयुष प्रणाली प्राचीनतम चिकित्सा प्रणाली है और आज भी लोग इसका उपयोग करते हैं। इसे स्वास्थ्य और आरोग्य के लिये इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसे अब देश में औपचारिक रूप से मान्यता प्रदान कर दी गई है। मौजूदा महामारी के दौरान इन प्रणालियों का उपयोग बढ़ गया है, क्योंकि इनसे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है। आयुष प्रणालीअसरदार, सुरक्षित, आसानी से उपलब्ध और सस्ती है। इसे कोविड-19 का इलाज करने में कारगर पाया गया है। इसके अतिरिक्त, इसकी चिकित्सकीय क्षमता की भी पड़ताल की गई, जिसके आधार पर कई जड़ी-बूटियों से बने दो असरदार नुस्खे सामने आये। पहला नुस्खा आयुष-64 को केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद ने और दूसरासिद्ध प्रणाली वाला कबसुर कुडीनीर नुस्खा विकसित किया गया। इन दोनों नुस्खों को कोविड-19 के हल्के और कम गंभीर मामलों में कारगर पाया गया है। आयुष मंत्रालय इन दवाओं को प्रोत्साहन दे रहा है, ताकि आम लोगों को इसका फायदा मिल सके। 

DRDO ने किया एक और कारनामा, तैयार की कोरोना एंटीबॉडी टेस्ट किट DIPCOVAN, मात्र इतने रु में हो जायेगा टेस्ट

DRDO ने किया एक और कारनामा, तैयार की कोरोना एंटीबॉडी टेस्ट किट DIPCOVAN, मात्र इतने रु में हो जायेगा टेस्ट

कोरोना मरीजों के लिए दवा 2 DG के आविष्कार के बाद अब डीआरडीओ ने नया कारनामा कर दिखाया है। रक्षा अनुसंधान संगठन ने कोरोना वायरस एंटीबॉडी डिटेक्शन किट तैयार की है। इस किट का नाम 'DIPCOVAN' रखा गया है। इसके जरिए SARS-CoV-2 वायरस के साथ-साथ न्यूक्लियोकैप्सिड (S&N) प्रोटीन का भी 97% की उच्च संवेदनशीलता और 99% की विशिष्टता के साथ पता लगाया जा सकता है। इसे दिल्ली स्थित वैनगार्ड डायग्नोस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से विकसित किया गया है। यह किट पूरी तरह स्वदेशी है और इसे यहीं के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है। इसके बाद दिल्ली के विभिन्न COVID अस्पतालों में 1000 से अधिक रोगियों के नमूनों पर व्यापक जांच के बाद इसकी क्षमता सत्यापित की गई।


बीते एक साल में इस किट के तीन बैच को वैधता प्रदान की गई है। अप्रैल 2021 में इस किट को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की ओर से मान्यता दी गई थी। अब मई में इस प्रोडक्ट को भारत ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया की ओर से भी मंजूरी दे दी गई है। अब इस किट की खुले बाजार में बिक्री की जा सकती है। DIPCOVAN किट को तैयार करने का मकसद यह है कि इंसान के शरीर में कोरोना से लड़ने के लिए जरूरी एंटीबॉडी या प्लाज्मा का पता लगाया जा सके। इस किट की वैलिडिटी 18 महीने की होगी। इस किट को डीआरडीओ ने वैनगार्ड डायग्नोस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ मिलकर तैयार किया गया है।
वैनगार्ड की ओर से जून के पहले सप्ताह में इसकी लॉन्चिंग की जाएगी। पहले बैच में 100 किट मुहैया कराई जाएंगी। इसके बाद हर महीने 500 किट तैयार होंगी। इस किट की कीमत प्रति टेस्ट 75 रुपये के करीब होगी। इस किट के जरिए किसी व्यक्ति की कोरोना से लड़ने की क्षमता और उसकी पिछली हिस्ट्री के बारे में पता लगाने में मदद मिलेगी। डिफेंस मिनिस्टर राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ के इस प्रयास की सराहना की है। बता दें कि इसी सप्ताह इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने कोवीसेल्फ नाम की होम टेस्टिंग किट को भी मंजूरी दी है, जो एक रैपिड एंटीजन टेस्ट किट है। इस किट की मदद से लोग घर बैठे खुद ही अपना कोरोना टेस्ट कर सकेंगे।
 

Immunity: अदरक और शहद की चटनी से बढ़ाएं इम्यूनिटी, स्वाद के साथ मिलेंगे कई फायदे

Immunity: अदरक और शहद की चटनी से बढ़ाएं इम्यूनिटी, स्वाद के साथ मिलेंगे कई फायदे

कोरोना महामारी के बीच लोग अपनी इम्यूनिटी बढ़ाने पर सबसे ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. जिन लोगों की इम्यूनिटी कमजोर होती है उन्हें सबसे ज्यादा संक्रमण का खतरा होता है. कोरोना वायरस का संक्रमण और दूसरी मौसमी बीमारी जैसे वायरल, डेंगू, टाइफाइड और हैजा भी कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को सबसे ज्यादा होती हैं. बदलते मौसम में गले में इनफेक्शन होना भी आम बात है. अगर आप बारिश में भीग जाएं तो तुरंत सर्दी, खांसी, जुकाम हो सकता है. ऐसे में आपको अपने गले का बचाव करना जरूरी है. इस वक्त आपको अपने खाने-पीने का बहुत ध्यान रखने की जरूरत है. आज हम आपको अदरक और शहदी की चटनी बनाने का तरीका बता रहे हैं. इससे आपका शरीर मजबूत होगा और आपकी इम्यूनिटी भी बढ़ेगी. खास बात ये है कि ये चटनी खाने का स्वाद भी बढ़ा देती है.


शहद- अदरक की चटनी से बढ़ाएं इम्यूनिटी


अदरक और शहद के कई फायदे हैं रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए अदरक और शहद को काफी अच्छा माना जाता है. ऐस में आप अपने खाने में अदरक और शहद की चटनी खा सकते हैं. इससे आपके खाने का स्वाद और इम्यूनिटी दोनों बढ़ेंगी. कोरोना काल में इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाए रखना बहुत जरूरी है. आप इस चटनी को खा सकते हैं इससे पाचनतंत्र सही से काम करेगा और बीमारियां कोसों दूर रहेंगी.


शहद-अदरक की चटनी बनाने का तरीका
चटनी बनाने के लिए आपको 2 इंच कसा हुआ अदरक लेना है. अब आप इसमें 2 चम्मच नींबू का रस, थोड़ा शहद या गुड़ मिला दें. स्वाद बढ़ाने के लिए चटनी में एक चुटकी नमक और एक चुटकी काली मिर्च मिला दें. आप इस चटनी को बनाकर तुरंत खा सकते हैं. इसे आप एयरटाइट कंटेनर में फ्रिज में स्टोर भी कर सकते हैं.


शहद-अदरक की चटनी को कैसे खाएं?
आप चाहें तो इस चटनी को खाने के साथ भी खा सकते हैं या फिर डेली एक चम्मच चटनी को थोड़े से पानी में मिलाकर पी लें. आप इसे एक दिन में 3-4 बार खा सकते हैं. इससे आपका इम्यून सिस्टम मजबूत होगा और स्वास्थ्य अच्छा रहेगा. अगर आपको चटनी अच्छी नहीं लगती तो आप अदरक-नींबू की चाय भी पी सकते हैं. ये भी आपको उतना ही फायदा पहुंचाएगी. 

सावधान! वैक्सीन नहीं कोरोना बना रहा पुरुषों को नपुंसक, जानें क्या कहती है यह स्टडी

सावधान! वैक्सीन नहीं कोरोना बना रहा पुरुषों को नपुंसक, जानें क्या कहती है यह स्टडी

कोरोना वायरस से बचाव का फिलहाल दुनियाभर में एक ही हथियार है, टीकाकरण। हालांकि, कुछ अफवाहों ने लोगों के मन में यह भी आशंका भर दी है कि वैक्सीन लेने से पुरुष नपुंसक हो रहे हैं। लेकिन यह एक भ्रांति से ज्यादा और कुछ नहीं। इस बीच एक नई स्टडी आई है जिसमें दावा किया गया है कि वैक्सीन लेने से नहीं बल्कि कोरोना संक्रमित होने से पुरुषों में नपुंसकता आ सकती है।

'वर्ल्ड जर्नल ऑफ मेन्स हेल्थ' में छपे अध्ययन में वैज्ञानिकों ने कोरोना से संक्रमित हुए और संक्रमित न होने वाले पुरुषों के ऊतकों यानी टिशू में अंतर को विस्तार से बताया है।

इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया है कि कोरोना वायरस शरीर में रक्त वाहिकाओं यानी ब्लड वेसल्स को नुकसान पहुंचा सकता है, जिसके परिणामस्वरूप शरीर के कई अंग प्रभावित हो सकते हैं और पुरुषों का प्राइवेट पार्ट भी इसमें शामिल है।


यूनिवर्सिटी ऑफ मियामी मिलर स्कूल ऑफ मेडिसिन के रिप्रोडक्टिव यूरोलॉजी प्रोग्राम के एसोसिएट प्रोफेसर और डायरेक्टर ने इस अध्ययन का नेतृत्व किया। उन्होंने कहा कि इस वायरस के प्रतिकूल प्रभावों में से एक नपुंसकता भी हो सकती है।

यह अध्ययन उन लोगों पर किया गया जो 6 या 8 महीने पहले कोरोना से संक्रमित हुए थे। इनमें से किसी को भी पहले से ऐसी समस्या नहीं था। दो कोरोना संक्रमित हुए पुरुषों के प्राइवेट पार्ट के टिशू में वायरस के अवशेष भी देखे गए।


स्टडी में शामिल रहे डॉक्टर रंजीत रामासामी कहते हैं, 'हमारे पायलट स्टडी में हमने पाया है कि जिन पुरुषों को कभी भी इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या नहीं थी, उनमें कोरोना संक्रमित होने के बाद ऐसी समस्या हुई है। हमारी स्टडी से पता लगता है कि कोरोना वायरस सिर्फ फेफड़ों और किडनी ही नहीं बल्कि शरीर के अन्य अंगों को भी निष्क्रिय बना सकता है।'

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि कोरोना वायरस का सेक्शुअल फंक्शन पर होने वाले वास्तविक असर का पता लगाने के लिए भविष्य में और गहन शोध करने पड़ेंगे। 

Source: Hindustan News

ब्लैक फंगस से भी ज्यादा खतरनाक है ये फंगस राज्य में दी दस्तक

ब्लैक फंगस से भी ज्यादा खतरनाक है ये फंगस राज्य में दी दस्तक

कोरोना वायरस महामारी के बीच ब्लैक फंगस के मामलों में तेजी देखी जा रही है। लेकिन इस बीच अब व्हाइट फंगस के मामले मिलने से भी हड़कंप मच गया है। बताया जा रहा है कि व्हाइट फंगस बीमारी ब्लैक फंगस से भी ज्यादा खतरनाक है। इसमें भी कोरोना की तरह फेफड़े संक्रमित होते हैं और वहीं शरीर के दूसरे अंग जैसे नाखून, स्किन, पेट, किडनी, ब्रेन और मुंह के अंदर भी संक्रमण फैल सकता है।
बिहार की राजधानी पटना में व्हाइट फंगस के 4 मामले मिले हैं। बताया जा रहा है कि उनमें कोरोना जैसे लक्षण थे पर रैपिड एंटीजेन टेस्ट, आरटी -पीसीआर और एंटीबॉडी टेस्ट में सभी रिपोर्ट्स कोरोना नेगेटिव आई है।
 

खांसी और छींक से 10 मीटर तक फैल सकता है कोरोना वायरस, सरकार ने जारी कीं नई गाइडलाइंस

खांसी और छींक से 10 मीटर तक फैल सकता है कोरोना वायरस, सरकार ने जारी कीं नई गाइडलाइंस

कोरोना संक्रमण से बचने के लिए मास्क लगाने के साथ ही सोशल डिस्टेंसिंग भी उतनी ही जरूरी है। केंदद्र सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार के. विजय राघवन के दफ्तर की ओर से जारी गाइडलाइंस के मुताबिक किसी व्यक्ति की छींक और खांसी 10 मीटर की दूरी तक पहुंच सकती है। कोरोना वायरस संक्रमण को लेकर जारी की गई अडवाइजरी के मुताबिक किसी भी संक्रमित व्यक्ति की खांसी और छींक वायरस के फैलने का सबसे प्रमुख कारण है। यही नहीं विजयराघवन के ऑफिस की ओर से जारी एडवाइजरी में कहा गया है कि खांसी और छींक के जरिए वायरस हवा में 10 मीटर दूर तक जा सकता है।

ऐसे में मास्क तो हमेशा पहनना जरूरी ही है। इसके अलावा सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन करना भी कोरोना से बचाव के लिए जरूरी है। यही नहीं बिना लक्षण वाले कोरोना संक्रमित मरीज की छींक और खांसी से भी वायरस फैल सकता है। इसके अलावा जमीन पर गिरे छींक और खांसी से निकले कण भी संक्रमण का कारण हो सकते हैं। यही नहीं जमीन पर खांसी, छींक, थूक और बलगम के कण लंबे समय के लिए वायरस फैलने की वजह बन सकते हैं। बता दें कि देश के कई राज्यों में सड़कों पर थूकने पर जुर्माने का प्रावधान किया गया है।

सरकारी पैनल की ओर से हाई कॉन्टेक्ट पॉइंट्स की लगातार और नियमित सफाई का आदेश दिया गया है। इनमें डोर हैंडल्स, लाइट स्विच, टेबल्स, चेयर आदि शामिल हैं। इन्हें ब्लीच और फिनाइल आदि से साफ करने की सलाह दी गई है। सरकारी कमिटी ने सलाह दी है कि लोगों को कोरोना से बचने के लिए डबल मास्क या फिर N95 मास्क पहनना चाहिए। सरकार की ओर से जारी की गई एडवाइजरी के मुताबिक यदि कॉटन के कपड़े का मास्क पहनना है तो दो पहनने चाहिए, लेकिन सर्जिकल मास्क है तो फिर एक से ही काम चल सकता है।


वेंटिलेशन वाले स्थानों पर कम होता है कोरोना संक्रमण का खतरा
एडवाइजरी के मुताबिक सर्जिकल मास्क यदि आप पहनते हैं तो उसका इस्तेमाल एक ही बार किया जा सकता है। हालांकि डबल मास्क को आप 5 बार पहन सकते हैं। यही नहीं वैज्ञानिक सलाहकार की ओर से जारी एडवाइजरी में कहा गया है कि वेंटिलेशन वाले स्थानों पर संक्रमण फैलने का खतरा कम रहता है। इसलिए घर और वर्क प्लेस पर वेंटिलेशन की व्यवस्था बेहतर होनी चाहिए। इससे आपके संक्रमण से बचने की संभावना ज्यादा रहती है। 

अब आप घर बैठे खुद ही कर सकेंगे कोरोना की जांच, 250 रुपए की किट से 15 मिनट में ऐसे पाएं रिजल्ट

अब आप घर बैठे खुद ही कर सकेंगे कोरोना की जांच, 250 रुपए की किट से 15 मिनट में ऐसे पाएं रिजल्ट

कोराना की जांच अब घर पर भी की जा सकेगी। आईसीएमआर ने एक किट को मंजूरी दी है। इस किट के जरिये घर में ही नाक से कोरोना जांच के लिए सैंपल ले सकते हैं। आईसीएमआर ने कोरोना टेस्ट किट को लेकर नई एडवाइजरी भी दी है। इसके मुताबिक, अब आप घर पर ही 250 रुपए की कीमत वाले किट को खरीदकर 15 मिनट के भीतर कोविड रिजल्ट पा सकते हैं। इस किट में 5 से 7 मिनट में पॉजिटिव रिजल्ट का पता चल जाएगा और निगेटिव में यह 15 मिनट का समय लेगा।

आईसीएमआर ने कहा कि होम टेस्टिंग सिर्फ सिम्प्टोमेटिक मरीजों के लिए है। यह उनके लिए भी है जो लोग लैब में कन्फर्म केस के सीधे संपर्क में आए हों। होम टेस्टिंग के लिए गूगल प्ले स्टोर और ऐपल स्टोर से मोबाइल ऐप डाउनलोड करना होगा। मोबाइल ऐप के जरिये पॉजिटिव और निगेटिव रिपोर्ट मिलेगी।

जो लोग होम टेस्टिंग करेंगे उन्हें टेस्ट स्ट्रिप पिक्चर खींचनी होगी और उसी फोन से फोटो लेनी होगी जिस पर मोबाइल ऐप डाउनलोड होगा। मोबाइल फोन का डेटा सीधे आईसीएमआर के टेस्टिंग पोर्टल पर स्टोर हो जाएगा। लेकिन, मरीज की गोपनीयता बरकरार रहेगी। इस टेस्ट के जरिये जिनकी पॉजिटिव रिपोर्ट आएगी, उन्हें पॉजिटिव माना जाएगा। किसी दूसरे टेस्ट की जरूरत नहीं पड़ेगी।


जो लोग पॉजिटिव होंगे उन्हें होम आइसोलेशन को लेकर आईसीएमआर और स्वास्थ्य मंत्रालय की गाइडलाइन को मानना होगा। लक्षण वाले जिन मरीजों का रिजल्ट निगेटिव आएगा उनको आरटीपीसीआर करवाना होगा। होम आइसोलेशन टेस्टिंग किट के लिए माई लैब डिस्कवरी सल्यूशन लिमिटेड को ऑथराइज किया गया है। यह पुणे की कंपनी है। इस किट का नाम कोविसेल्फ (पैथोकैच) है। 

सांस रोक कर रखने का अभ्यास करें, अपने फेफड़ों को स्वस्थ बनाएं: डॉ. अरविन्द

सांस रोक कर रखने का अभ्यास करें, अपने फेफड़ों को स्वस्थ बनाएं: डॉ. अरविन्द

कोविड-19 की दूसरी लहर में पूरक ऑक्सीजन की मांग में भारी वृद्धि देखने को मिली है। नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. वी. के. पॉल ने देखा है कि दूसरी लहर में श्वासहीनता सर्वाधिक सामान्य लक्षण है, जिससे ऑक्सीजन की अधिक आवश्यकता पड़ती है।
डॉ. अरविन्द कुमार चेस्ट सर्जरी इन्स्टीट्यूट के अध्यक्ष, मेदांता फाउंडर तथा मैनेजिंग ट्रस्टी लंग केयर फाउंडेशन ने बताया कि कोविड-19 के 90 प्रतिशत मरीज फेफड़े में तकलीफ का अनुभव करते हैं लेकिन क्लिनिकल रूप में यह महत्वपूर्ण नहीं है। 10-12 प्रतिशत लोगों में निमोनिया विकसित हो जाता है, यह फेफड़े का संक्रमण होता है जिसमें फेफड़े की छोटी-छोटी हवा की जगहें, जिन्हें एल्वियोली कहा जाता है, संक्रमित हो जाती हैं। कम अनुपात में कोविड-19 के मरीजों को ऑक्सीजन के सहारे की जरूरत तब पड़ती है जब सांस लेने में कठिनाई गंभीर रूप ले लेती है।

सांस रोक कर रखेने का अभ्यास एक ऐसी तकनीक है जो मरीज की ऑक्सीजन आवश्यकता को कम कर सकती है और उन्हें अपनी स्थिति की निगरानी करने में मदद दे सकती है।

 

कैसे सांस रोक कर रखने का अभ्यास सहायक है

डॉ. अरविन्द का कहना है कि यह अभ्यास उन मरीजों के लिए बहुत ही लाभकारी है जिनमें हल्का लक्ष्ण है। यदि ऐसे मरीज सांस रोक कर रखने का अभ्यास करते हैं तो उन्हें पूरक ऑक्सीजन की आवश्यकता की संभावना कम रह जाती है। इस अभ्यास को मरीज की स्थिति देखने के लिए जांच के रूप में किया जा सकता है। यदि सांस रोक कर रखने के समय में कमी होने लगती है तो यह पूर्व चेतावनी का संकतेहै और मरीज को अपने डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। दूसरी ओर, यदि मरीज सांस रोक कर रखने के समय में धीरे-धीरे वृद्धि करने में सक्षम होता है तो यह सकारात्मक संकेत है।

अस्पताल में दाखिल मरीज और होम ऑक्सीजन पर डिस्चार्ज किए गए मरीज भी डॉक्टर की सलाह से इस अभ्यास को कर सकते हैं। इससे उनकी ऑक्सीजन आवश्यकता कम करने में मदद मिल सकती है।

स्वस्थ व्यक्ति भी सांस रोक कर रखने का अभ्यास कर सकते हैं। यह अभ्यास उन्हें अपने फेफड़ों को स्वस्थ रखने में मदद करेगा।

सांस रोक कर रखने का अभ्यास कैसे करें

सीधा बैठें और अपने हाथों को जांघों पर रखें।
अपना मुंह खोलें और सीने में जितना अधिक वायु भर सकते हैं भरें।
अपने होठों को कस कर बंद कर लें।
अपनी सांस को जितना अधिक समय तक रोक कर रख सकते हैं रोकें।
जांचें कि आप कितने समय तक अपनी सांस रोक कर रख सकते हैं।
मरीज एक घंटे में एक बार यह अभ्यास कर सकते हैं और धीरे-धीरे प्रयास करके सांस रोक कर रखने का समय बढ़ा सकते हैं। 25 सेकेंड और उससे अधिक समय तक सांस रोक कर रखने वाले व्यक्ति को सुरक्षित माना जाता है। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ज्यादा जोर न लगे और इस प्रक्रिया में थकान न हो जाए।

संक्रमण का शीघ्र पता लगाना महत्वपूर्ण

हम जानते हैं कि कोविड-19 का सबसे बड़ा असर हमारे फेफड़ों पर पड़ता है , इस कारण श्वासहीनता होती है और ऑक्सीजन के स्तर में कमी आ जाती है।

डॉ. अरविन्द बताते हैं कि पहली लहर में सबसे अधिक लक्षण बुखार और कफ था। दूसरी लहर में दूसरे किस्म के लक्षण दिख रहे हैं , जैसे गले में खराश , नाक बहना, आंखों में लाली, सिरदर्द,शरीर में दर्द, चकते, मतली, उल्टी, दस्त; और मरीज को बुखार का अनुभव तीन-चार दिनों के बाद होता है। तब मरीज जांच के लिए जाता है और इसकी पुष्टि में भी समय लगता है। इसलिए कोविड-19 की पुष्टि होने तक संक्रमण पांच से 6 दिन पुराना हो जाता है तथा कुछ विशेष मामलों में फेफड़े पहले ही प्रभावित हो जाते हैं।

डॉ. अरविन्द कहते हैं कि फेफड़ों के चपेट में आने वाले कारकों में आयु, वजन, फेफड़े की वर्तमान स्थिति , मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग ,एचआईवी संक्रमण, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली, धूम्रपान की आदत , कैंसर इलाज का इतिहास तथा स्टेरॉयड का इस्तेमाल हैं।

एनईजीवीएसी ने कोविड-19 टीकाकरण से संबंधित नई सिफारिशें दी, जानिए क्या है इनमें

एनईजीवीएसी ने कोविड-19 टीकाकरण से संबंधित नई सिफारिशें दी, जानिए क्या है इनमें

कोविड-19 के लिए टीकाकरण से संबंधित राष्ट्रीय विशेषज्ञ समूह (एनईजीवीएसी) ने केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ कोविड-19 टीकाकरण से संबंधित नई सिफारिशें साझा की हैं। ये सिफारिशें कोविड-19 के बदलते हालात और उभरते वैश्विक वैज्ञानिक प्रमाण एवं अनुभव पर आधारित हैं।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने ये सिफारिशें स्वीकार कर ली हैं और इनके बारे में राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों को सूचित कर दिया है, जो इस प्रकार हैं :

 

निम्नलिखित परिदृश्य में कोविड-19 टीकाकरण को टाल दिया जाए :

ऐसे लोगों में जिनमें प्रयोगशाला जांच में सार्स-2 कोविड-19 बीमारी की पुष्टि हुई है : ठीक होने के बाद कोविड-19 टीकाकरण 3 महीने तक टाल दिया जाए।
ऐसे सार्स-2 कोविड-19 मरीज जिन्हें सार्स-2 रोधी मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज या कोनवेलेसेंट प्लाज्मा दिया गया है : उनका कोविड-19 टीकाकरण अस्पताल से डिस्चार्ज होने की तारीख से 3 महीने तक के लिए टाल दिया जाए।
ऐसे लोग जिन्हें कम से कम 1 डोज मिल चुकी है और डोज का शिड्यूल पूरा होने से पहले कोविड-19 संक्रमण हो गया : उनकी दूसरी डोज कोविड-19 बीमारी से चिकित्सकीय सुधार के बाद 3 महीने के लिए टाल दी जानी चाहिए।
अन्य गंभीर सामान्य बीमारी से पीड़ित लोग जिन्हें अस्पताल में भर्ती या आईसीयू देखभाल में जाने की जरूरत पड़ी हो, को भी कोविड-19 वैक्सीन लेने से पहले 4-8 सप्ताह का इंतजार करना चाहए।

कोई व्यक्ति अगर कोविड-19 बीमारी से जूझ रहा हो, तो कोविड-19 टीका लगवाने या आरटी-पीसीआर जांच निगेटिव आने के 14 दिन के बाद रक्त दान कर सकता है।

सभी स्तनपान कराने वाली महिलाओं को कोविड-19 टीकाकरण कराए जाने की सिफारिश की जाती है।

वैक्सीन लगवाने वालों के लिए, कोविड-19 टीकाकरण से पहले रैपिड एंटीजन टेस्ट (आरएटी) के द्वारा कोई जांच की जरूरत नहीं है।

गर्भवती महिलाओं के कोविड-19 टीकाकरण के संबंध में, मामला विचाराधीन है और टीकाकरण पर राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह (एनटीएजीआई) द्वारा विचार किया जा रहा है।

केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इन सिफारिशों के बारे में राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों के संबंधित अधिकारियों को सूचित करने व इनके प्रभावी कार्यान्वयन के लिए आगे कदम उठाने के बारे में लिखा है। राज्यों को स्थानीय भाषाओं में सूचना और संवाद के सभी साधनों के इस्तेमाल के माध्यम से सेवा प्रदाताओं के साथ ही आम जनता को इन सूचनाओं का प्रभावी प्रसार सुनिश्चित करने की सलाह दी है। 

कोरोना वायरस के नए लक्षण आया सामने, बेंगलुरु के डॉक्टरों ने जताई आशंका, जाने क्या है वो लक्षण

कोरोना वायरस के नए लक्षण आया सामने, बेंगलुरु के डॉक्टरों ने जताई आशंका, जाने क्या है वो लक्षण

बेंगलुरु, बेंगलुरु में डॉक्टरों ने कोरोना वायरस के मरीजों में एक खास तरह का लक्षण देखा है, जिसे वे कोविड जुबान कह रहे हैं. ऐसे मामलों में मरीजों में कोरोना के कोई लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं सिवाय मुंह में सूखापन के. कोविड टास्क फोर्स के एक सदस्य डॉ. जी.बी. सत्तूर ने कहा कि हाइपरटेंशन से गुजर रहे 55 साल के एक व्यक्ति ने उनसे संपर्क किया था और वह बुरी तरह से मुंह के सूखेपन से पीड़ित था. बाद में उसकी कोरोना जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी.
बैंगलोर मिरर की एक रिपोर्ट के मुताबिक डॉ. सत्तूर ने कहा, 'जब मैंने उनका ब्लड शुगर चेक किया, तो वह सामान्य था, लेकिन ईएसआर सामान्य से अधिक निकला. मैंने सुना था कि कंजंक्टिवाइटिस कोरोना का एक लक्षण हो सकता है. हालांकि, मरीज को बुखार नहीं था. उन्होंने कहा था कि वे बहुत थके हुए हैं. इसलिए मुझे संदिग्ध तौर पर लगा कि यह कोविड-19 का एक लक्षण हो सकता है. फिर मैंने उनसे अपना आरटी-पीसीआर टेस्ट कराने को कहा, जो कि पॉजिटिव निकला. इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया और अब वे स्वस्थ हैं.'
इस बीच डॉक्टर कोरोना वायरस के नए लक्षण के पीछे की वजहों को जानने की कोशिश में जुटे हैं. डॉ. सत्तूर ने संभावना जताई कि कोरोना के यूके, ब्राजील या भारत में मिले पहले डबल म्यूटेंट की तरह ही किसी नए वैरिएंट के कारण ऐसा हो सकता है. इसके साथ ही उन्होंने बताया कि जुबान में कोरोना की शुरुआत मुख्यतः चिड़चिड़ाहट, खुजली और मुंह के सूखेपन के साथ होती है. इसके बाद मरीज को बिना बुखार के ही कमजोरी महसूस होने लगती है.
डॉ. सत्तूर ने कहा, 'डॉक्टरों को चाहिए कि वे जुबान या जीभ में मिल रही शिकायतों पर नजर रखें और उन्हें नजरअंदाज बिल्कुल ना करें. कोरोना के वैरिएंट को बेहतर तरीके से समझने के लिए सरकार को भी चाहिए कि वे जीनोम सीक्वेंसिंग पर और ध्यान केंद्रित करें.'
 

भारत सरकार द्वारा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अब तक इतने  करोड़ से अधिक टीके नि:शुल्क दिए

भारत सरकार द्वारा राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अब तक इतने करोड़ से अधिक टीके नि:शुल्क दिए

टीकाकरण, कोविड महामारी के नियंत्रण और प्रबंधन में भारत सरकार की व्यापक रणनीति (जिसमें जांच करना, पता लगाना, उपचार व कोविड उपयुक्त व्यवहार शामिल हैं) का एक अभिन्न अंग है। भारत सरकार कोविड टीकों के उत्पादन और आपूर्ति को बढ़ाने के कई प्रयासों के अलावा, राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों को मुफ्त में कोविड टीके प्रदान करके राष्ट्रव्यापी टीकाकरण अभियान को अधिक तेज़ी प्रदान कर रही है।

कोविड-19 टीकाकरण के उदारीकृत और त्वरित तीसरे चरण की रणनीति का कार्यान्वयन पहली मई 2021 को शुरू हो गया था। इस रणनीति के तहत, केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला (सीडीएल) द्वारा स्वीकृत किसी भी टीका निर्माता द्वारा उत्पादित कुल टीके की 50 प्रतिशत खुराक की खरीद हर महीने भारत सरकार द्वारा की जाएगी। केंद्र सरकार इन टीकों को राज्य सरकारों को पूरी तरह से मुफ्त में उपलब्ध कराना जारी रखेगी, जिस तरह से पूर्व में इसको वितरित किया जा रहा था।

भारत सरकार ने अब तक राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को 20 करोड़ से अधिक वैक्सीन खुराक (20,28,09,250) निःशुल्क प्रदान की हैं। इसमें से, 14 मई 2021 तक औसत गणना के आधार पर अब तक (कल शाम 7 बजे तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार) हुई कुल खपत 18,43,67,772 खुराक है, इसमें अपव्यय को भी शामिल किया गया है।

1.84 करोड़ से ज़्यादा कोविड वैक्सीन खुराक (1,84,41,478) अभी भी टीकाकरण के लिए राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के पास मौजूद हैं। टीकों का नेगेटिव बैलेंस दिखाने वाले राज्य आपूर्ति किए गए टीके की तुलना में अधिक खपत (अपव्यय सहित) दिखा रहे हैं, क्योंकि उन्होंने वैक्सीन खुराक की उस संख्या को शामिल नहीं किया है, जिसकी उन्होंने सशस्त्र बलों को आपूर्ति की है।

इसके अलावा लगभग 51 लाख (50,95,640) अतिरिक्त टीके पाइपलाइन में हैं और ये अगले 3 दिनों में राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को उपलब्ध कराये जाएंगे। 

पिछले छह दिनों में पांचवीं बार 24 घंटे में ठीक होने वाले मरीजों की संख्या नए कोविड मरीजों से अधिक

पिछले छह दिनों में पांचवीं बार 24 घंटे में ठीक होने वाले मरीजों की संख्या नए कोविड मरीजों से अधिक

भारत में कोविड-19 महामारी से आज तक 2,07,95,335 लोग स्वस्थ हो चुके हैं। वहीं, राष्ट्रीय रिकवरी दर 84.25 प्रतिशत पहुंच गई है। बीते 24 घंटे में 3,62,437 कोविड मरीज स्वस्थ हुए हैं। यह पिछले छह दिनों में पांचवीं बार ऐसा हुआ है जब ठीक होने वाले मरीजों की संख्या नए संक्रमित मरीजों से अधिक है। नई रिकवरी के 70.94 प्रतिशत में दस राज्यों की भागीदारी है। भारत के कुल सक्रिय मामले कम हो कर 36,18,458 रह गए हैं हैं। अब यह देश के कुल पॉजिटिव मामलों का 14.66 प्रतिशत है। पिछले 24 घंटों में कुल सक्रिय मामलों में 55,344 मामलों की शुद्ध गिरावज दर्ज की गई है। 10 राज्यों की भारत के कुल सक्रिय मामलों के 74.69 प्रतिशत में भागीदारी है। राष्ट्रव्यापी टीकाकरण अभियान के तीसरे चरण के तहत देश में आज तक 18.22 करोड़ से अधिक लोगों को कोविड-19 का टीका लगाया जा चुका है। आज सुबह 7 बजे तक की अंतिम रिपोर्ट के अनुसार, 26,55,003 सत्रों के दौरान कुल 18,22,20,164 टीके खुराक दी गई हैं। टीकाकरण लाभार्थियों की कुल संख्या में वे 96,42,278 एचसीडब्ल्यू शामिल हैं, जिन्होंने वैक्सीन की पहली खुराक ली है और 66,41,047 ऐसे एचसीडब्ल्यू भी शामिल हैं, जिन्होंने वैक्सीन की दूसरी खुराक ले ली है। इसके अलावा पहली खुराक लेने वाले 1,44,25,044 एफएलडब्ल्यू, दूसरी खुराक लेने वाले 81,86,568 एफएलडब्ल्यू में 18 से 44 साल के आयु समूह में पहली खुराक लेने वाले 48,25,799 लोग शामिल हैं। इसके साथ-साथ 45 से 60 वर्ष की आयु के पहली खुराक लेने वाले 5,71,61,076 और दूसरी खुराक लेने वाले 90,66,862 लाभार्थियों के साथ-साथ 5,44,69,599 पहली खुराक लेने वाले और 1,78,01,891 दूसरी खुराक लेने 60 वर्ष की आयु से ज्यादा के लाभार्थी भी शामिल हैं।

सरकार ने मिशन कोविड सुरक्षा के तहत कोवैक्सीन के उत्पादन के लिए दी यह सहायता

सरकार ने मिशन कोविड सुरक्षा के तहत कोवैक्सीन के उत्पादन के लिए दी यह सहायता

भारत सरकार द्वारा आत्मनिर्भर भारत 3.0 के तहत कोविड के स्वदेशी टीकों के विकास और उत्पादन में तेजी लाने के लिए मिशन कोविड सुरक्षा की घोषणा की गई थी। इस मिशन को भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बीआईआरएसी), नई दिल्ली में कार्यान्वित किया जा रहा है।

इस मिशन के तहत कोवैक्सिन के स्वदेशी उत्पादन की क्षमता को बढ़ाने के उद्देश्य सेभारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग ने अप्रैल, 2021 में उन्नत उत्पादन क्षमता,जिसके सितंबर, 2021 तक प्रति माह 10 करोड़ से अधिक खुराक तक पहुंच जाने की उम्मीद है, के लिए टीके के निर्माताओं को अनुदान के रूप में वित्तीय सहायता प्रदान की।

उन्नयन की इस योजना के एक हिस्से के रूप में, हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक लिमिटेड के साथ-साथ सार्वजनिक क्षेत्र के अन्य निर्माताओं की क्षमताओं को आवश्यक बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी के साथ उन्नत किया जा रहा है। भारत सरकार की ओर से भारत बायोटेक की न्यू बैंगलोर स्थित इकाई, जिसे टीके की उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के लिए दोबारा से तैयार किया जा रहा है, को अनुदान के रूप में लगभग 65 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है।

सार्वजनिक क्षेत्र की निम्नलिखित तीन कंपनियों को भी टीके की उत्पादन की क्षमता बढ़ाने के लिए सहयोग दिया जा रहा है:

हाफकाइन बायोफार्मास्यूटिकल कारपोरेशन लिमिटेड, मुंबई - महाराष्ट्र सरकार के तहत एक राज्य सार्वजनिक उद्यम (पीएसई)।
इस इकाई को उत्पादन के लिए तैयार करने के लिए भारत सरकार की ओर से 65 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता अनुदान के रूप में प्रदान की जा रही है। एक बार चालू हो जाने के बाद, इस उत्पादन इकाई के पास प्रति माह 20 मिलियन खुराकों के उत्पादन की क्षमता होगी।

इंडियन इम्यूनोलॉजिकल्स लिमिटेड (आईआईएल), हैदराबाद - राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के तहत इस उत्पादन इकाई को 60 करोड़ रुपये का अनुदान प्रदान किया जा रहा है। और
भारत इम्यूनोलॉजिकल एंड बायोलॉजिकल लिमिटेड (बीआईबीसीओएल), बुलंदशहर जोकि भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग केतहत एक केन्द्रीय सार्वजनिक उद्यम(सीपीएसई) है, को प्रति माह 10-15 मिलियन खुराकें उपलब्ध कराने के उद्देश्य से अपनी उत्पादन इकाई को तैयार करने के लिए 30 करोड़ रुपये के अनुदान दिया जा रहा है।
इसके अलावा, गुजरात सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के तहत आने वाले गुजरात जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केन्द्र ने हेस्टर बायोसाइंसेज और ओमनीबीआरएक्स के साथ मिलकर भारत बायोटेक के साथ कोवैक्सिन तकनीक को बढ़ाने और प्रति माह न्यूनतम 20 मिलियन खुराकों का उत्पादन करने के लिए अपनी चर्चा को ठोस रूप दिया है। सभी निर्माताओं के साथ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण समझौते को अंतिम रूप दे दिया गया है।

जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के बारे में:विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तहत जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी)कृषि, स्वास्थ्य संबंधी देखभाल, पशु विज्ञान, पर्यावरण और उद्योग के क्षेत्रों में जैव प्रौद्योगिकी के उपयोग और अनुप्रयोग को बढ़ावा देता है। यह विभाग जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को प्राप्त करने, जैव प्रौद्योगिकी को भविष्य के एक प्रमुख सटीक उपकरण के रूप में आकार देने और सामाजिक न्याय - विशेष रूप से गरीबों का कल्याण - सुनिश्चित करने पर केन्द्रित है। www.dbtindia.gov.in

जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बीआईआरएसी) के बारे में: जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बीआईआरएसी) धारा 8, अनुसूची बी, के तहत सार्वजनिक क्षेत्र का एक गैर-लाभकारीउद्यम है, जिसे भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी), द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर प्रासंगिक उत्पादों के विकास संबंधी जरूरतों को पूरा करते हुए रणनीतिक अनुसंधान और नवाचार का काम करने वाले उभरते बायोटेक उद्यमों को मजबूत और सशक्त करने वाली एक इंटरफेस एजेंसी के रूप में स्थापित किया गया है। www.birac.nic.in

अधिक जानकारी के लिए: डीबीटी/बीआईआरएसी के संचार प्रकोष्ठ से संपर्क करें*@DBTIndia @BIRAC_2012

www.dbtindia.gov.inwww.birac.nic.in

 

कोविड से उबरने के बाद भी सावधानी बनाए रखें,म्यूकोर्मिकोसिस, एक फंगल संक्रमण, पढ़े पूरी खबर

कोविड से उबरने के बाद भी सावधानी बनाए रखें,म्यूकोर्मिकोसिस, एक फंगल संक्रमण, पढ़े पूरी खबर

अब जब हम खुद को कोविड-19 से बचाने और उससे लड़ने की पूरी कोशिश कर रहे हैं,फंगस से पैदा होने वाला एक और खतरा सामने आया है जिसके बारे में हमें जानना चाहिए एवं उस पर कार्रवाई करनी चाहिए। म्यूकोर्मिकोसिस, एक फंगल संक्रमण है जोकुछ कोविड-19 मरीजों में बीमारी से ठीक होने के दौरान या बाद में पाया जा रहा है। दो दिन पहले महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री द्वारा दिए गए एक बयान के अनुसार, राज्य में इस फंगल संक्रमण से पहले ही 2000 से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं; 10 लोगों ने तो इसकी चपेट में आकर दम भी तोड़ दिया। कुछ मरीजों की आंखों की रोशनी भी चली गई।
म्यूकोर्मिकोसिस कैसे होता है?

म्यूकोर्मिकोसिस या ब्लैक फंगस, फंगल संक्रमण से पैदा होने वाली जटिलता है। लोग वातावरण में मौजूदफंगस के बीजाणुओं के संपर्क में आने से म्यूकोर्मिकोसिस की चपेट में आते हैं। शरीर पर किसी तरह की चोट, जलने, कटने आदि के जरिए यह त्वचा में प्रवेश करता है और त्वचा में विकसित हो सकता है।

कोविड-19 से उबर चुके हैं या ठीक हो रहे मरीजों में इस बीमारी के होने का पता चल रहा है। इसके अलावा, जिसे भी मधुमेह है और जिसकी प्रतिरक्षा प्रणाली ठीक से काम नहीं कर रही है, उसे इसे लेकर सावधान रहने की जरूरत है।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा जारी किए गए एक परामर्श के अनुसार, कोविड-19 रोगियों में निम्नलिखित दशाओं से म्यूकोर्मिकोसिस संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है:

अनियंत्रित मधुमेह
स्टेरॉयड के उपयोग के कारण प्रतिरक्षा प्रणाली का कमजोर होना
लंबे समय तक आईसीयू/अस्पताल में रहना
सह-रुग्णता/अंग प्रत्यारोपण के बाद/कैंसर
वोरिकोनाजोल थेरेपी (गंभीर फंगल संक्रमण का इलाज करने के लिए इस्तेमाल की जाती है)
इसका कोविड-19 से क्या संबंध है?

यह बीमारी म्यूकोर्मिसेट्स नामक सूक्ष्म जीवों के एक समूह के कारण होती है, जो पर्यावरण में प्राकृतिक रूप से मौजूद होते हैं, और ज्यादातर मिट्टी में तथा पत्तियों, खाद एवं ढेरों जैसे कार्बनिक पदार्थों के क्षय में पाए जाते हैं।

सामान्य तौर पर, हमारे शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली ऐसे फंगल संक्रमण से सफलतापूर्वक लड़ती है लेकिनहम जानते हैं कि कोविड-19 हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रभावित करता है। इसके अलावा, कोविड-19 मरीजों के उपचार में डेक्सामेथासोन जैसी दवाओं का सेवन शामिल है, जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया पर असर डालता है। इन कारकों के कारण कोविड-19 मरीजों को म्यूकोर्मिसेट्स जैसे सूक्ष्म जीवों के हमले के खिलाफ लड़ाई में विफल होने के नए खतरे का सामना करना पड़ता है।

इसके अलावा, आईसीयू में ह्यूमिडिफायर का उपयोग किया जाता है, वहां ऑक्सीजन थेरेपी ले रहे कोविड मरीजों को नमी के संपर्क में आने के कारण फंगल संक्रमण का खतरा होता है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर कोविड मरीज म्यूकोर्मिकोसिस से संक्रमित हो जाएगा। जिन मरीजों को मधुमेह नहीं है, उन्हें यह बीमारी होना असामान्य है लेकिन अगर तुरंत इलाज न किया जाए तो यह घातक हो सकता है। ठीक होने की संभावना बीमारी के जल्दी पता चलने और उपचार पर निर्भर करती है।

सामान्य लक्षण क्या हैं?

हमारे माथे, नाक, गाल की हड्डियों के पीछे और आंखों एवं दांतों के बीच स्थित एयर पॉकेट में त्वचा के संक्रमण के रूप में म्यूकोर्मिकोसिस दिखने लगता है। यह फिर आंखों, फेफड़ों में फैल जाता है और मस्तिष्क तक भी फैल सकता है। इससे नाक पर कालापन या रंग मलिन पड़ना, धुंधली या दोहरी दृष्टि, सीने में दर्द, सांस लेने में कठिनाई और खून की खांसी होती है।

आईसीएमआर ने सलाह दी है कि बंद नाक के सभी मामलों को बैक्टीरियल साइनसिसिस के मामलों के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, खासकर कोविड-19 रोगियों के उपचार के दौरान या बाद मेंबंद नाक के मामलों को लेकर ऐसा नहीं करना चाहिए। फंगल संक्रमण का पता लगाने के लिए चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए।

इसका इलाज कैसे किया जाता है?

जहां संक्रमण सिर्फ एक त्वचा संक्रमण से शुरू हो सकता है, यह शरीर के अन्य भागों में फैल सकता है। उपचार में सभी मृत और संक्रमित ऊतक को हटाने के लिए की जाने वाली सर्जरी शामिल है। कुछ रोगियों में, इससे ऊपरी जबड़े या कभी-कभी आंख की भी हानि हो सकती है। इलाज में अंतःशिरा एंटी-फंगल थेरेपी का चार से छह सप्ताह का कोर्स भी शामिल हो सकता है। चूंकि यह शरीर के विभिन्न हिस्सों को प्रभावित करता है, इसलिए इलाज करने के लिए सूक्ष्म जीवविज्ञानी, आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञों, न्यूरोलॉजिस्ट, ईएनटी विशेषज्ञ, नेत्र रोग विशेषज्ञ, दंत चिकित्सक, सर्जन और अन्य की एक टीम की आवश्यकता होती है। म्यूकोर्मिकोसिसको कैसे रोकें?

मधुमेह को नियंत्रित करना आईसीएमआरद्वारा सुझाए गए सबसे महत्वपूर्ण तरीकों में से एक है। इसलिए, मधुमेह से पीड़ित कोविड-19 रोगियों को अत्यधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता है।

अपने आप दवा लेना एवं स्टेरॉयड की अधिक खुराक लेना घातक हो सकता है और इसलिए डॉक्टर की सलाह का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. वी के पॉल ने स्टेरॉयड के अनुचित उपयोग के प्रतिकूल प्रभावों के बारे में कहा: “स्टेरॉयड कभी भी कोविड-19 के शुरुआती चरण में नहीं दिया जाना चाहिए। संक्रमण के छठे दिन के बाद ही इसका सेवन करना चाहिए। मरीजों को दवाओं की उचित खुराक पर टिके रहना चाहिए और डॉक्टरों द्वारा सलाह के अनुसार दवा को तय समय तक लेना चाहिए। दवा के प्रतिकूल दुष्प्रभावों से बचने के लिए दवाओं का विवेकपूरण उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए।”

उन्होंने कहा, “स्टेरॉयड के अलावा, टोसिलिजूमोब, इटोलिजूमाब जैसी कोविड-19 दवाओंका उपयोग भी प्रतिरक्षा प्रणाली पर असर डालता है। और जब इन दवाओं का उचित उपयोग नहीं किया जाता है तो यह जोखिम को बढ़ा देता है, क्योंकि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली फंगल संक्रमण से लड़ने में विफल रहती है।”

आईसीएमआर ने अपने दिशानिर्देशों में कोविड-19 मरीजों को इम्यूनोमॉड्यूलेटिंग दवाओं का सेवन छोड़ने की सलाह दी है, जो एक ऐसा पदार्थ है जो प्रतिरक्षा प्रणाली को उत्तेजित कर देता है या दबा देता है। राष्ट्रीय कोविड-19 कार्यबल ने ऐसे किसी भी प्रतिकूल प्रभाव को रोकने के लिए टोसिलिजुमाब की खुराक में बदलाव किया है। उचित स्वच्छता बनाए रखने से भी फंगल संक्रमण को दूर रखने में मदद मिल सकती है।

ऑक्सीजन थेरेपी ले रहे मरीजों के लिए, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ह्यूमिडिफायर में पानी साफ हो और उसे नियमित रूप से बार-बार डाला जाए। पानी का रिसाव न हो (गीली सतहों से बचने के लिए जहां फंगस प्रजनन कर सकते हैं) यह सुनिश्चित करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए। मरीजों को अपने हाथों के साथ-साथ शरीर को भी साफ रखते हुए उचित स्वच्छता बनाए रखनी चाहिए।

कोविड से उबरने के बाद भी सावधानी बनाए रखें

कोविड-19 से उबरने के बाद, लोगों को गहराई से निगरानी करनी चाहिए और ऊपर उल्लिखित किसी भी चेतावनी संकेत एवं लक्षण को याद रखना चाहिए, क्योंकि फंगल संक्रमण कोविड-19 से उबरने के कई हफ्तों या महीनों के बाद भी उभर सकता है। संक्रमण के खतरे से बचने के लिए डॉक्टर की सलाह के अनुसार स्टेरॉयड का विवेकपूर्ण उपयोग करना चाहिए। बीमारी का जल्द पता लगने से फंगल संक्रमण के उपचार में आसानी हो सकती है।

Corona Effects: घर से बाहर नहीं निकलने की वजह से बच्चों में बढ़ रहा है चिड़चिड़ापन? आपके काम आएंगी ये टिप्स

Corona Effects: घर से बाहर नहीं निकलने की वजह से बच्चों में बढ़ रहा है चिड़चिड़ापन? आपके काम आएंगी ये टिप्स

कोरोना महामारी ने लोगों को जिंदगी को पूरी तरह से बदल दिया है. लोग घरों में कैद होकर रहने के लिए मजबूर हैं. ऐसे में बच्चों के लिए सिर्फ घर में बंद होकर रहना काफी मुश्किल हो रहा है. बच्चों के स्कूल-कॉलेज बंद हैं. कोरोना की वजह से वो न अपने किसी दोस्त से मिल सकते न ही किसी के घर जा सकते हैं. पार्क, मॉल, स्विमिंग पूल, जिम और लगभग सभी टूरिस्ट प्लेस बंद हैं. ऐसे में लंबे समय से घर पर रहने से बच्चों के स्वभाव में कई तरह के बदलाव आ रहे हैं. बचपन का मतलब होता है घूमना-फिरना, मस्ती करना, बिंदास रहना और किसी बात की चिंता नहीं करना होता है. लेकिन अब बच्चों को इस बात की चिंता और डर सताने लगा है कि ऐसा कब तक रहेगा. लंबे समय से घर में रहने से बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ रहा है. कुछ बच्चे ज्यादा चिड़चिड़े हो रहे हैं. ऐसे में माता-पिता की परेशानी भी बढ़ रही है. आज हम आपको मनोचिकित्सक की सलाह से ऐसे टिप्स दे रहे हैं जिससे आप अपने बच्चे को स्वस्थ और खुश रख सकते हैं.


बच्चों को खुश रखने के लिए टिप्स


1- बच्चों के साथ खेलें-

हम सब ने अपने बचपन में कई तरह के इनडोर गेम जैसे कैरम, लूडो, गिट्टे आर कार्ड खेले हैं. इस समय बच्चों की छुट्टियां है तो आपको थोड़ा वक्त निकालकर उनके साथ खेलना चाहिए. कोरोना की वजह से बच्चे बाहर नहीं जा सकते तो आपको इन इनडोर गेम्स से बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए. इससे बच्चे खुश रहेंगे और टीवी और फोन से भी दूर रहेंगे.


2- बच्चों का पसंदीदा खाना बनाएं-

बच्चे खाने-पीने के बहुत शौकीन होते हैं. बाहर जाने या घूमने जाने के पीछे उनकी एक वजह ये भी होती है कि उन्हें उनका पसंदीदा खाना मिलेगा. लेकिन अब बच्चे घर पर ही रहते हैं तो आप उनके लिए घर में ही उनका पसंदीदा खाना बनाएं. वो खाना भी बनाएं जो बच्चे बाहर जाकर खाते थे. इससे बच्चे खुश हो जाएंगे.


3- हर दिन का लक्ष्य तय करें-

बच्चों की बोरियत दूर करने का एक तरीका है कि उन्हें हर रोज कई लक्ष्य दें. उन्हें छोटे-छोटे टास्क दें और उन्हें पूरा होने पर उनकी पसंद की चीज दिलाएं. इस तरह बच्चा व्यस्त रहेगा और उसे अकेलापन और बोरियत भी महसूस नहीं होगी.


4- दादी-नानी की कहानियां सुनाएं-

बच्चे सब कुछ जान लेना चाहते हैं. कई बार वो मोबाइल और टीवी की दुनिया से ऊब जाते हैं. अपनी किताबें पढ़कर भी बोर हो जाते हैं. ऐसे में आपको अपनी दादी-नानी की कहानियां सुनानी चाहिए. पहले दादी-नानी जो कहानियां सुनाती थीं बच्चें उन्हें बड़े ध्यान से सुनते थे. इससे 4 बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास भी होता है. इस तरह की कहानियों से नैतिक शिक्षा का पाठ भी मिलता है.


5- सकारात्मक बातें करें-

कोरोना के इस समय में बच्चों के सामने नकारात्मक बातें न करें. इस तरह की खबरें भी न दिखाएं इससे बच्चों के मन पर गहरा असर पड़ता है. उन्हें समझाएं कि ये वक्त जल्द बीत जाएगा, फिर सब अच्छा हो जाएगा. कोरोना की पॉजिटिव खबरें ही बच्चों के सामने करें. घर में प्यार का और खुशी का माहौल रखें.  

 डीसीजीआई ने दो से 18 वर्ष आयु वर्ग के लोगों के लिये कोवैक्सीन के दूसरे/तीसरे चरण के परीक्षण को मंजूरी दी, पढ़े पूरी खबर

डीसीजीआई ने दो से 18 वर्ष आयु वर्ग के लोगों के लिये कोवैक्सीन के दूसरे/तीसरे चरण के परीक्षण को मंजूरी दी, पढ़े पूरी खबर

औषधियों पर देश की नियामक संस्था ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) ने सजग पड़ताल के बाद विशेषज्ञ समिति (एसईसी) की सिफारिशें मान ली हैं और दो से 18 वर्ष आयु वर्ग के लोगों के लिये कोवैक्सीन के दूसरे/तीसरे चरण के परीक्षण को मंजूरी दे दी है। यह मंजूरी कोवैक्सीन निर्माता भारत बायोटेक लिमिटेड को 12 मई, 2021 को प्रदान की गई। मेसर्स भारत बायोटेक इंटरनेशनल लिमिटेड, हैदराबाद (बीबीआईएल) ने दो से 18 वर्ष आयु वर्ग के लोगों पर कोवैक्सीन के दूसरे/तीसरे चरण के परीक्षण का प्रस्ताव दिया था। यह परीक्षण 525 स्वस्थ स्वयंसेवियों पर किया जायेगा। परीक्षण के दौरान वैक्सीन मांसपेशियों के जरिये (इंट्रामस्कुलर) दी जायेगी। स्वयंसेवियों को दो खुराक दी जायेंगी। दूसरी खुराक, पहली खुराक के 28वें दिन पर दी जायेगी। इस प्रस्ताव पर तेज अमल करते हुये प्रस्ताव को 11 मई, 2021 को विशेषज्ञ समिति को भेज दिया गया था। समिति ने विस्तृत विमर्श करने के बाद कतिपय शर्तों के साथ प्रस्तावित दूसरे/तीसरे चरण के परीक्षण को अनुमति देने की सिफारिश कर दी थी। 

WHO ने कोविड-19 के उपचार के लिए इवरमेक्टिन (Ivermectin) के उपयोग के खिलाफ दी चेतावनी

WHO ने कोविड-19 के उपचार के लिए इवरमेक्टिन (Ivermectin) के उपयोग के खिलाफ दी चेतावनी

गोवा के स्वास्थ्य मंत्री ने हाल ही में 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों को “Ivermectin” के उपयोग की सिफारिश की है। हालांकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब इसके इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी दी है।

गोवा सरकार ने क्या कहा?
गोवा सरकार ने हाल ही में एक नए COVID-19 उपचार प्रोटोकॉल को मंजूरी दी। इस प्रोटोकॉल के तहत, सरकार ने “Ivermectin” दवा के उपयोग की सिफारिश की थी। यह वायरल बुखार को रोकने के लिए निर्धारित की गयी थी जो COVID-19 संक्रमण के साथ होता है।

सरकार ने यह भी घोषणा की कि Ivermectin दवा राज्य के सभी स्वास्थ्य केंद्रों में उपलब्ध होगी। इसके अलावा, यह सिफारिश की गई थी कि चाहे वह COVID-19 लक्षण हों या न हों, सभी निवासियों द्वारा इसे लिया जाएगा।

WHO क्या कह रहा है?
एक शोध का दावा है कि Ivermectin के निरंतर उपयोग से COVID-19 समाप्त हो जाता है। साथ ही, यह नियमित रूप से उपयोग किए जाने पर प्राणघातक सांस की बीमारी के अनुबंध के जोखिम को कम करती है। समीक्षा अमेरिकी सरकार के लिए काम कर रहे तीन वरिष्ठ वैज्ञानिकों द्वारा की गई थी। इसके पर विश्व स्वास्थ्य संगठन की मुख्य वैज्ञानिक सौम्या स्वामीनाथन ने कहा है कि डब्ल्यूएचओ Ivermectin के उपयोग के खिलाफ सिफारिश करता है।

मामला क्या है?
WHO के अलावा, जर्मन स्वास्थ्य देखभाल ने COVID-19 उपचार के लिए Ivermectin के उपयोग के खिलाफ भी चेतावनी दी है। ये संगठन दवा के खिलाफ चेतावनी दे रहे हैं क्योंकि रोगियों में इसकी नैदानिक ​​प्रभावकारिता के लिए कोई पर्याप्त डेटा या सार्थक सबूत नहीं हैं।

निष्कर्ष
भारत सरकार ने सिफारिश की थी कि USFDA और यूरोपीय चिकित्सा एजेंसी (European Medical Agency) द्वारा अनुमोदित या अनुशंसित दवाओं का उपयोग भारत में किया जाएगा। अप्रैल 2021 में, USFDA ने COVID रोगियों के इलाज में Ivermectin के उपयोग के खिलाफ सिफारिश की।

 

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कुछ राज्यों में अचानक से एम्फोटेरिसिन बीकी मांग में वृद्धि देखी गई है। चिकित्सक कोविड-19 बीमारी के बाद होने वाली तकलीफ म्यूकोरमिकोसिससे पीड़ित रोगियों के इलाज के लिए यह दवा लेने की सलाह देते हैं। इसलिए भारत सरकार दवा के उत्पादन को बढ़ाने के लिए निर्माताओं से बातचीत कर रही है। इस दवा के अतिरिक्त आयात और घरेलू स्तर पर इसके उत्पादन में वृद्धि के साथ आपूर्ति की स्थिति में सुधार होने की उम्मीद है।

औषध विभाग ने निर्माताओं/आयातकों के साथ स्टॉक की स्थिति की समीक्षा करने के बाद, और एम्फोटेरिसिन बी की बढ़ती मांग को देखते हुए11 मई, 2021 को अपेक्षित आपूर्ति के आधार पर राज्यों/केंद्रशासित क्षेत्रों को यह दवा आवंटित की जो 10 मई से 31 मई, 2021 के बीच उपलब्ध करायी जाएगी। राज्यों से सरकारी और निजी अस्पतालों एवं स्वास्थ्य सेवा एजेंसियों के बीच आपूर्ति के समान वितरण के लिए एक व्यवस्था लागू करने का भी अनुरोध किया गया है। राज्यों से यह भी अनुरोध किया गया है कि वे इस आवंटन से दवा प्राप्त करने के लिए राज्य में निजी और सरकारी अस्पतालों के लिए 'संपर्क बिंदु' का प्रचार करें। इसके अलावा, राज्यों से अनुरोध किया गया है कि पहले से आपूर्ति किए जा चुके स्टॉक और साथ ही आवंटित किए गए स्टॉक का विवेकपूर्ण तरीके से इस्तेमाल किया जाए। राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) आपूर्ति व्यवस्था की निगरानी करेगा।

देश महामारी की गंभीर लहर का सामना कर रहा है और इसने देश के विभिन्न हिस्सों को प्रभावित किया है। भारत सरकार आवश्यक कोविड दवाओं की आपूर्ति बढ़ाने और उन्हें एक समान एवं पारदर्शी तरीके से राज्य सरकारों तथा केंद्रशासित प्रदेशों के लिए उपलब्ध कराने की खातिर लगातार काम कर रही है। 

क्या यह भी सम्भव है कि नीचे वाले फ्लोर पर संक्रमित शख्स के टॉयलेट से भी आपके घर आ सकता है कोरोना वायरस? पढ़े पूरी खबर

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नई दिल्ली. पिछले साल तक वैज्ञानिक कह रहे थे कि कोविड वायरस का व्यवहार स्प्रे बोतल से निकले पानी की फुहार की तरह होता है. अब उनका कहना है कि वायरस डियो की तरह व्यवहार करता है. इसका मतलब ये हुआ कि पहले अगर ड्रॉपलेट के ज़रिये वायरस रोगी से बाहर निकलता है तो वो पानी की फुहार की तरह थोड़ी ही दूरी तक सीमित रहता था, अब वैज्ञानिकों का मानना है कि दरअसल वायरस जब ड्रॉपलेट के ज़रिये बाहर आता है तो वो किसी डियो की तरह व्यवहार करता है यानि उसकी बूंदें तो पानी के बराबर ही होती हैं लेकिन जिस तरह डियो की खुशबू पूरे कमरे में फैल जाती है ठीक उसी तरह वायरस भी एक जगह सीमित रहने के बजाए पूरे कमरे में फैल जाता है. इसका मतलब ये हुआ कि अपार्टमेंट में रहने वाले लोगों के लिए खतरा बढ़ जाता है. हालांकि अभी तक इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं. लेकिन अब वायरस अपने फैलने के लिए एक नया रास्ता तैयार कर रहा है. वो है शौचालय.

ऐसा क्यों लग रहा है?

इस बार कोविड के लक्षणों में डायरिया एक आम लक्षण के तौर पर उभरा. यही नहीं मरीज के मल में वायरस का RNA और जेनेटिक कोड भी पाया गया. अगर मल में वायरस जिंदा रहता है और संक्रामक हो जाता है तो मरीज जब उस मल को बहाता तो उसका क्या अंजाम हो सकता है. हार्वर्ड विश्वविद्यालय के हेल्दी बिल्डिंग प्रोग्राम के निदेशक जोसफ जी एलेन का मानना है, ‘एक बार सामान्य तौर पर मल को बहाने पर, हवा में करीब 10 लाख अतिरिक्त कण ( इनमें सभी वायरस नहीं होते) प्रति क्यूबिक मीटर की दर से हवा में आ जाते हैं.’ अगर किसी रेस्टोरेंट या दफ्तर के शौचालय की बात करें तो खतरे का अंदाजा लगाया जा सकता है लेकिन मल के ज़रिये फैले इन कणों से क्या अपार्टमेंट में भी खतरा हो सकता है?


क्या कहता है पिछला अनुभव


2003 में जब सार्स ने महामारी के रूप में फन फैलाना शुरू किया. उस वक्त एक ऐसा ही मामला सामने आया था. दरअसल हांगकांग में एक 50 मंजिला रिहाइशी इमारत है. जब सार्स फैला तो यहां के एक परिवार को उसने अपने घेरे में ले लिया. आगे चलकर इसी इमारत के 321 लोग सार्स से पीड़ित हो गए जिसमें से 42 लोगों को जान गंवानी पड़ी. वैज्ञानिकों का मानना है कि लोगों के बीच वायरस शायद इमारत में मौजूद प्ल्मबिंग सिस्टम यानि पानी की पाइप लाइन के ज़रिए फैला होगा. दरअसल 2003 में जब सार्स फैला हुआ था तब एक मरीज एमोय गार्डन इमारत में आया. वो इमारत की बीच के मंजिल में जिनसे मिलने पहुंचा था, उसने उनके यहां का शौचालय इस्तेमाल किया, चूंकि उसे डायरिया हुआ था इसलिए उसने दोबारा शौचालय का इस्तेमाल किया. इसके बाद देखा गया कि उस कॉम्पलेक्स में मामले बढ़ते गए.

क्या कहती है रिसर्च


न्यू इंग्लैंड जरनल ऑफ मेडिसिन में छपे एक लेख के मुताबिक 187 में से 99 मरीज उसी इमारत में से थे जिसके शौचालय का इस्तेमाल पहले से सार्स पीड़ित मरीज ने किया था. दिलचस्प बात ये है कि जितने लोग बीमार पड़े वो सभी इस्तेमाल किए गए शौचालय के ऊपर की मंजिल पर रहते थे, इससे भी हैरान करने वाली बात ये थी कि प्रबंधन और सुरक्षा करने वाला स्टाफ जो 24 घंटे ग्राउंड फ्लोर पर मौजूद रहता है, उनमें से किसी को कुछ भी नहीं हुआ था. इसी तरह का मामला गुआंगज़ोउ में मौजूद ऊंची इमारत में भी देखने को मिला जब वहां की 15वीं मंजिल में रहने वाला एक परिवार वुहान से लौटने के बाद कोविड की गिरफ्त में आ गया और कुछ दिनों बाद ही 25वीं और 27वीं मंजिल पर मौजूद कुछ लोग कोरोना से पीड़ित हो गए. खास बात ये है कि ये लोग चाइन में लगे सख्त लॉकडाउन की वजह से घऱ से बाहर तक नहीं निकले थे लेकिन उनके घर तक 15वीं मंजिल की पाइपलाइन सीधी जाती थी. इस बात की जांच करने के लिए वैज्ञानिकों ने 15वीं मंजिल के ड्रेनपाइप से एक ट्रेसर गैस को छोड़ा और उन्होंने देखा की वो गैस 25वीं और 27वीं मंजिल के अपार्टमेंट में मौजूद थी.

क्या कहती है थ्योरी?
शौचालय में मौजूद ड्रेन पाइप यू के आकार में मुड़ा होता है. जो पानी को रोक कर उससे निकली गैस को घर के अंदर जाने से रोकता है. जब ये मुड़ी हुई जगह जहां पानी रुकता है वो सूख जाती है तो घर के अंदर सड़े हुए अंडों की तरह की बदबू फैल जाती है. 2003 में एमोय गार्डन में जिस इमारत में सार्स के मामले सामने आए थे वहां का ड्रेन पाइप सूखा हुआ था. इसी वजह से बदबू और जर्म्स निचली मंजिल से अंदर घुस गए थे.

तो अब क्या किया जा सकता है?
कुछ छोटी -छोटी बातों को अगर अमल में लाया जाए तो वैज्ञानिक जो कह रहे हैं, अगर वो सही है तो उससे बचा जा सकता है. जैसे कभी भी बाथरूम में आ रही बदबू को नज़रअंदाज़ ना करें. हो सकता है पाइप में लीक की वजह से ऐसा हो रहा है. कमोड की लिड को फ्लश करने के दौरान नीचे कर देना चाहिए, इस तरह से अगर किसी घर में कोविड मरीज होगा तो वहां से वायरस हवा के ज़रिये पड़ोसियों तक नहीं पहुंचेगा. अपने टॉयलेट की खिड़की को खुला रखें या एक्जॉस्ट फैन चालू रखें. बाथरूम की सतह को रोज़ाना अच्छे से साफ करना चाहिए. ऐसे कई तरीके हैं जिससे लोग मल के ज़रिये फैल रहे एयरोसोल से बचाव कर सकते हैं. कुल मिलाकर ये बात भी इस ओर इशारा करती है कि हमें सफाई रखने की बहुत ज्यादा ज़रूरत है.

वायरस फैल सकता है...
इसका ये मतलब भी नहीं है कि बाथरूम के पाइप वायरस के फैलने के मुख्य स्रोत हैं, अभी तक ऐसा माना जा रहा है कि कोविड मरीज के मल के ज़रिए शायद वायरस फैल सकता है. इसमें भी ये बात अहम है कि जिस कोविड मरीज के मल के ज़रिये वायरस फैल सकता है उसका वायरस लोड भी ज्यादा होना चाहिए. तो कुल मिलाकर कोविड को लेकर अभी तक वैज्ञानिक लगातार शोध कर रहे हैं और लगातार नए तथ्य सामने आ रहे हैं. ऐसे में ज़रूरी है कि हम लगातार नई जानकारियों पर नज़र रखें, ( लेकिन अत्यधिक और गैरज़रूरी जानकारी से बचें) लेकिन उन्हें लेकर परेशान नहीं हों बस सावधान रहें. घबराने से बेहतर बचाव है.